नीरज चौधरी
इसे संयोग कह लीजिए या मज़बूरी। जहां तक मुझे याद है कि, मैं उमर के बाइस बरस में अगर कहीं घूमने गया हूं तो वो जगह धर्मिक स्थल ही रही होगी। बीते मंगलवार की रात को ही मित्र अमरेन्द्र का संदेश आया कि, तुझे कल हमारे साथ सलकनपुर के देवी मंदिर चलना है, वो भी सुबह 7 बजे घर से निकलना है। अब बात संदेश कम आदेश ज़्यादा हुई, इसलिए भोपाल से 70 किमी दूर सलकनपुर में देवी मंदिर जाने का कार्यक्रम तय करना पड़ा। बुधवार सुबह 6 बजे ही मेरे बहुमुखी प्रतिभा के धनी दूरभाष ने मुझे जगाने के लिए कंपन्न करना और गाने गाना शुरू कर दिया, लेकिन रज़ाई की गर्मागरम दुनिया से बाहर की सर्दीले संसार में क़दम रखने का भी मन नहीं कर रहा था। फिर भी मुझे इतना पता था कि जिन आठ जवानों को यात्रा पर जाना है, वे कदापि पौ फटने के पहले नहीं जाग सकते। उसके बावज़ूद भी मैं उठ ही गया। निकलते-निकलते हम आठों साथी चार मोटरसाइकिलों पर सवार होकर साढ़े नौ बजे मध्यप्रदेश की राजधानी से निकल सके..जैसा कि पहले से विदित था। वो तो अच्छा हुआ कि सुबह सात बजे जाने का कार्यक्रम तैयार किया, अगर नौ बजे का किया होता तो शायद ही भोपाल से निकल पाते, क्योंकि तब तक शाम हो चुकी होती।
खै़र, लंबे समय पश्चात् उस युवा तरुणाई ने अपनी उमंगों के साथ-साथ् गाडि़यों को भी तेज़ रफ़्तार देना शुरू कर डालीं। चंद मिनिटों में दूसरे जि़ले रायसेन की सीमा के मंडीदीप में पहुंच गए और कुछ ही पल में सीहोर जिले की सीमा में प्रवेश कर गए। सूनी रोड, उस पर हवा से बातें करतीं चार माटरसाईकिलें और चौतरफा प्रकृति का सौंदर्य अपने आप में अनोखा था। नागिन की तरह काली और लहराती हुईं सडकें सवार और सवारियों के मन को मोहने में कोई क़सर नहीं छोड़ रही थी और उन सड़कों पर स्वागत की मुद्रा में झुके हुए पेड़। वाह !!
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| मां बिजासेन देवी, सलकनुपर फोटो-नीरज |
सलकनपुर गांव की बात करें तो यह मध्यप्रदेश के सीहाेर जिले की बुधनी विधानसभा के अंतर्गत एक गांव हैं। बुधनी विधानसभा से ही प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान विधायक हैं। सलकनपुर में 800 फीट ऊंची पहाड़ी पर एक मंदिर स्थित है, इस मंदिर में मां बिजासन देवी विराजमान हैं।सलकनपुर में विराजी सिद्धेश्वरी मां विजयासन की ये स्वयंभू प्रतिमा माता पार्वती की है जो वात्सल्य भाव से अपनी गोद में भगवान गणेश को लिए हुए बैठी हैं. इसी मंदिर में महालक्ष्मी, महासरस्वती और भगवान भैरव भी विराजमान हैं यानी इस एक मंदिर में कई देवी-देवताओं के आशीर्वाद का सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है.
पुराणों के अनुसार देवी विजयासन माता पार्वती का ही अवतार हैं, जिन्होंने देवताओं के आग्रह पर रक्तबीज नामक राक्षस का वध कर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की थी. देवी विजयासन को कई भक्त कुल देवी के रूप में पूजते हैं. मां जहां एक तरफ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे जीवनसाथी का आशीर्वाद देती हैं. वहीं संतान का वरदान देकर भक्तों की सूनी गोद भर देती हैं. तभी तो देवी के इस धाम का महत्व किसी शक्तिपीठ से कम नहीं हैं.मां के इस दरबार में भक्त की कोई पुकार कभी अनसुनी नहीं रहती, राजा हो या रंक, मां सभी पर एक समान कृपा बरसाती हैं. भक्तों के बढ़ते हुए कदम जैसे ही इस धाम की परिधि को छूते हैं पूरा शरीर मानो मां भगवती की शक्ति से भर उठता है, क्योंकि ये वो जगह है जहां मां विजयासन सुंदर पहाड़ पर अपने परम दिव्य रूप में आसिन हैं. जगत जननी का ये वो धाम है जो जगत भर में सलकनपुर वाली मां विजयासन के नाम से प्रसिद्ध है.
यहां से नर्मदा मैया का घाट भी महज़ 12 किमी की दूरी पर है। मंदिर की 800 फीट की ऊंचाई तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं। एक रास्ता 1400 सीढि़यों से और दूसरा 4 किमी की दूरी तय करके सड़क मार्ग से होकर मंजि़ल तक पहुंचाता है । हालांकि, भक्तों के लिए रोप-वे भी प्रारंभ किया गया है।
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| मैं टॉवर से नीचे उतरते हुए फोटा- रवि |
बहरहाल, अपने मित्रों रवि, शैलेष, अमरेन्द्र, आकाश, विजेन्द्र, दुर्गेेश और राहुल के साथ जब रायसेन जिले की सीमा को पार करते हुए सीहोर जि़ले की सीमा में प्रवेश किया तो मोटरसाईकिलें चमचमाती सड़कों को देखकर तेज़ से भी तेज़ दौड़ने लगीं। बाइक तेज़ दौड़ाने का भी एक अपना एक कारण था, क्योंकि एक ट्रक हमें चैलेंजित कर रहा था। उस ट्रक पर पीछे लिखा था-''डिपर मत मार ज़ालिम, तमन्ना हम भी रखते हैं-तुम सत्तर चलते हो तो क्या, हम भी अस्सी चलते हैं।।'' फिर क्या...तेज़ गति से मेरी रामप्यारी (बाइक) भी दौड़ने लगी। लेकिन अचानक मैं देखता हूं कि, रास्ते में रेलवे क्रांसिग का फाटक बंद है। रेल के इंतज़ार में फाटक वाहनों को रोकने के लिए आड़ा आ गया था.. मैंने बाइक की रफ्तार धीमी की और एक लाेडिंग गाड़ी के पीछे रोक ली। लग रहा था जैसे बाइक भी रेल को धन्यवाद दे रही हो कि, बहन तेरे कारण मैं थोड़ा सांस भी ले पाई हूं, नहीं तो न जाने आज मेरा क्या हश्र करते ये कम्बखत, भोपाल से दौड़ाते ला रहे हैं। अचानक ही मेरी नज़र लोडिंग के पीछे लिखे अमर वचन पर पड़ गई। जिसे पढ़ने के बाद मैंने गंतव्य स्थल तक बहुत ही औसत गति से बाइक चलाई, क्योंकि उसके पीछे लिखा ही कुछ ऐसा था। वो अमर वचन थे-''धीरे चलोगे तो बार-बार मिलेंगे और तेज़ चलोगे तो हरिद्वार मिलेंगे।'' बस, फिर क्या धीरे चलने पर भी हम आठों रातापानी अभयारण्य के नज़दीक एक पहुंचे जहां एक ऊंचे टॉवर चढ़कर दुनिया को देखने की चेष्टा करने लगे। क़सम से कोहरे से लिपटे सघन, आच्छादित, घने वनों को जब इतनी ऊंचाई से निहारा तो नीचे उतरने का मन ही नहीं कर रहा था।
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| राजेन्द्र माहेश्वरी, फोटो- नीरज |
इतने में राजेन्द्र माहेश्वरी नाम के सज्जन आए और कहने लगे कि आओ ! मेरे पीछे तुम्हें लंगूरों और बंदरों से मिलवाता हूं। जब हम उने साथ उस घने जंगल में पहंचे और देखते हैं कि, सैंकडों बंदर और लंगूर उस मानव से लिपटने को आतुर थे। इतना वात्सल्य, प्रेम, आत्मीयता शायद ही मनुष्य की मनुष्य के प्रति देखने को मिले, लेकिन उन जीवों का उस मानव के प्रति अटूट और अकूत स्नेह है। पूछने पर राजेन्द्र नाम के उस शख़्स ने बताया कि, ''मैं हर शनिवार को करीब 200 रोटियां इन बंदरों और लंगूरों को खिलाता हूं। उन्होंने बताया कि, पिछले रविवार को मैं इन्हें रोटियां खिलाने से चूक गया, क्योंकि इसी जगह (सड़क किनारे) दो बाघ आकर बैठ गए थे और यहां से बाघ का शिकार करके ले गए। इसलिए मैं दूर से देखता रहा।'' राजेन्द्र ने बताया कि, मैं पास में ही टाइगर रिसोर्ट में रहता हूं और आप मुझे फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो कर सकते हो। घने जंगल में जंगली जीवों से प्यार करने वाला यह शख़्स संचार के साधनों से भी बाकायदा अद्यतन रहता है। यात्रा में करते समय हम पत्रकारिता के छात्रों को कुछ नया जानने की भी तीव्र लालसा थी। इसीलिए हमारी नज़र हर उस बात पर थी, जिससे कुछ नया सीखने और देखने को मिले।
इसी कड़ी में हमने सीहोर जि़ले के ही एक गांव केसलवाड़ा में एक झोपड़ी के बाहर सौर ऊर्जा से चलित एक चाइनीज़ यंत्र देखा, जो रात को उजाला भी देता है और मोबाइल भी चार्ज करता है। हम समझ चुके थे कि दुनिया बहुत आगे पहुंच चुकी है, इसलिए हम भी अब ज़्यादा समय बीच राह में व्यतीत न करते हुए आगे की ओर निकल पड़े। आख़िरकार, हम आठों मित्र अपने गंतव्य स्थल सलकनपुर पहुंच चुके थे। पार्किंग में अपनी मोटरसाईकिलें खड़ी करने के बाद एक मित्र ने दुकानदार से पूछा कि भैया, ऊपर चढ़ने के लिए कितनी सीढि़यां हैं।
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| मोबाइल चार्ज करने का सौर ऊर्जा चलित यंत्र फोटो-नीरज |
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| अमरेन्द्र, राहुल, विजेन्द्र, आकाश, रवि, नीरज, दुर्गेश फोटो- शैलैष |
दुकानदार,''भैया, चौदह सौ सीढि़यां हैं।'' दुकानदार ने इतना कहा और सब दूसरे की तरफ देखने लगे। सोच रहे थे कि, कोई हिम्मत बंधाएगा या फिर चार किमी के सड़क वाले रास्ते से जाने का बोलेगा, लेकिन सब एक सुर में बोले - चलो, यार माता के मंदिर में तपस्या करके पहुंचेंगे तो मन्नत पूरी होगी। अब सीढि़यां चढ़ना शुरू हुए तो महज़ सौ सीढि़यों में ही सब जवानों की सांस फूल गई, लेकिन स्कूल-कॉलेज वाली प्रतियोगिता वाली भावना ऊपर खींचे जा रही थी। हर किसी में सबसे पहले ऊपर पहुंचने की जि़द। सीढि़यां भी टू-वे थीं। एक तरफ जाने और एक तरफ से आने की। एक-एक सीढ़ी चढ़ते वक्त़ अहसास हो रहा था कि जब इन पत्थर की सीढि़यों को चढ़ने में इतनी ताक़त, ज़ोर और दृढ़ता की ज़रूरत पड़ती है तो जि़दगी की सीढि़यां चढ़ना कितना कठिन होगा। खै़र, तमाम मशक्कत के बाद हम 800 फीट ऊपर पहुंचे और देवीकेअलौकिक, अप्रतिम, अद्वितीय, अतिसुंदर स्थल देखते ही सारी हरारत-थकावट पल में मानो छू हो गई। मां के दर्शन के पश्चात् लंबी-चौड़ी पहाड़ी का मुआयना किया और पहाड़ी के पिछले हिस्से की तराई में हम आठों मित्र उतर गए, जहां भी एक शंकर जी कां मंदिर और सैंकडों लंगूरों की टोली आक्रमे मुद्रा में बैठी थी। वहां कुछ देर तस्वीरगिरी करने के बाद हम फिर उन्हीं सीढि़यों से नीचे उतरते हैं।
| रोप-वे, सलकनपुर फोटो- नीरज |
| रोप-वे, सलकनुपर फोटो- नीरज |
अब तो पैर लड़खड़ाने की मुद्रा में आ गए थे कि अचानक हमारे साथ नीचे उतर रहीं ऐ अनजान मोहतरमा रोप-वे को देखकर बोलतीं हैं कि- देखो ! लिफ्ट जा रही है।'' बस, फिर क्या सब लोग ज़ोर से ठहाका मार के हंसने लगे। रोप-वे नाम के शब्द से अनभिज्ञ मोहतरमा कुछ देर तक के लिए तो झेंप-सी गई पर बेफ्रिकी के अंदाज़ में अपने गति से नीचे उतरने लगी।
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| फोटो- राहुल |
लोगों ने बताया कि, सीढि़यों से चढ़ने में करीब दो घंटे का समय लगता है, तो वहीं रोप-वे से पांच या आठ मिनिट में ऊपर-नीचे आ जाते हैं। भूख से व्याकुल तलाश सभी मित्रों को भोजन की तलाश रहती है। पहाड़ी के नीचे निशुल्क भंडारा लिखा हुआ ढाबेनुमा स्थान दिखता है। पूछने पर पता चलता है कि, यह भंडारा मंदिर के ट्रस्ट की ओर से ही दूर-दराज़ से आने वाले ग़रीब श्रद्धालुओं के लिए है। मंदिर को प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग ने भी पयर्टन स्थल घोषित कर दिया है इसलिए इसका महत्व आप जान ही सकते हैं। निशुल्क भंडारे में आठों भूखे खाने बैठे तो वहां के रसोईयों ने बहुत प्रेमपूर्वक और सहृदयता के साथ भोजन परोसा। अब जैसे ही पेट में वज़न बढ़ा, वैसे ही सबने गाडि़याें को रफ़्तार देना शुरू किया और चंद घंटों में अपने भोपाल आ गए।।
कैसे पहुंचें सलकनपुर:- भोपाल से सलकनपुर की दूरी क़रीब 70 किमी है। यहां से सड़क मार्ग से आसानी से जा सकतेहैं।बताते हैं कि प्रसिद्ध बिजासेन देवी धाम सलकनपुर देश के 11 शक्तिपीठों में से एक पीठ है। यह सीहोर जिले के बुधनी विधानसभा के रेहटी तहसील के सलकनपुर गांव में स्थ्िात है। यहां से 35 किमी दूर होशंगाबाद है और करीब 12 किमी दूर आवली नर्मदा नदी का घाट है।
| सलकनपुर गांव में देवी मां विजयासेन की पहाड़ी का दृश्य |


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