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Wednesday, 19 November 2014

‘किल-दिल’ ने नहीं किया दिल को किल


                                                                  नीरज चौधरी



फ़िल्म: किल दिल

निर्देशक: शाद अली

कलाकार: रणवीर सिंह, गोविंदा, अली ज़फ़र, परिणीति चोपड़ा

निर्माता :- यश राज फिल्मस्

                                                                       



सात दिनों पहले ही सिनेमा के पर्दे पर उतरी फिल्म ‘किल-दिल’ दर्शकों के दिल को किल नहीं सकी। ‘कोईमोई’ वेबसाइट के अनुसार, 55 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म ने बुधवार तक करीब 24 करोड़ रुपए का धीमा करोबार कर लिया है। फिल्म की कहानी भले ही कमजोर है, लेकिन फिल्म के नायक रणवीर सिंह (देव) ने अपने किरदार में जान डाली है, लेकिन अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा (दिशा)और अली जफर (टूटू)खासा प्रभाव नहीं छोड़ पाए। हालांकि गोविंदा (भाईजी)ने अपने पुराने किरदारों के विपरीत खलनायक का किरदार निभाया है, जिसमें उनकी एक्टिंग को दर्शक जगत पचा नहीं पाया। फिल्म दर्शकों को  फिल्म कहानी शुरूआत में दर्शकों काफी गुदगुदाते हुए आगे बढ़ती है। खलनायक भाईजी का वह डायलॉग जिसमें वे कहते हैं कि, ‘लौंडिया में नखरे और मुंगफली में छिलके न होते, तो जिंदगी बड़े आराम से कटती’, और देव (रणवीर सिंह)का एक संवाद जिसमें वे फिल्म के एक पात्र को धमकाते हुए कहता हैं कि ‘हम तब से गन चला रहे हैं.. जब से तू अपनी मां के अंदर नहीं, अपने बाप के अंदर था।’ दर्शकों को सीट से हंसी के मारे उछलने को मजबूर कर देता है। 

बंटी और बबली’ और ‘झूम बराबर झूम’ जैसी फिल्में दे चुके शाद अली के निर्देशन में बनी यह फिल्म उनकी पुरानी फिल्मों की तरह ही उत्तर भारत के माहौल को बयां कर रहीं हैं।  फिल्म की कहानी को देखें तो इसमें भईयाजी(गोविंदा) नाम के आदतन अपराधी को दो लावारिश बच्चे (रणवीर सिंह और अली जफर) कचरे के ढेर में मिलते हैं। जिनकी परवरिश खून-खराबे और गोली के शारे-शराबे के बीच की जाती है और उनकों नाम दिया जाता है - देव (रणवीर)और अली जफर (टूटू)। देव और टूटू को भईयाजी परिपक्व हिस्ट्रीशीटर बना देते हैं, जो भईयाजी के कारिंदे के रूप में भाड़े पर मर्डर और लूट जैसी वारदातों को अंजाम देते हैं। इनकी मुलाकात एक अमीर समाजसेविका दिशा(परिणीति चौपड़ा)से होती है, जिसको देव से प्यार हो जाता है । फिल्म के पात्र देव और दिशा में चुहलबाजी का दौर रहता चलता रहता है, लेकिन दिशा को देव के बैकग्राउंड के बारे में पता नहीं होता है। और उसके इस प्यार की भनक भईयाजी को लग जाती है, तो वे अपनी शातिर चाल से दिशा को देव के बैकग्राउंड प्रोफेशन के बारे में पता लगवा देते हैं क्योंकि भईयाजी देव को अपनी गैंग से दूर नहीं जाने देना चाहते थे। शाद अली पटकथा में आसान रास्ते चुनते हैं। रणवीर सिंह की स्वाभाविक ऊर्जा का सही इस्तेमाल नहीं हो पाया है।  पहली बार खलनायक का किरदार निभा रहे गोविंदा ने अपने किरदार को समझा और सही ढंग से पेश जरूर किया है, किन्तु दर्शक उनको इस पात्र में पचा नहीं पाए। अगर वे कम नाचते और गाते तो अधिक प्रभावशाली लगते। पाकिस्तान से आए कलाकार अली जफर रणवीर सिंह को बराबरी का साथ नहीं दे पाए हैं। किलर की भूमिका में वे कमजोर हैं। बॉडी लैंग्वेज और आवाज में रफनेस लाने की उन्होंने कोशिश जरूर की है, लेकिन बात बनी नहीं है। परिणीति चोपड़ा दिशा के किरदार में नहीं ढल सकी हैं। फिल्म के गानों की बात करें तो गाने ऑडियेंश के दिल को किल नहीं कर पाए, हालांकि फिल्म का एंडिग सोंग जरूर अपना स्वर व शब्दों का प्रभाव छोड़ता है।

                                                                                      


फिल्म का संदेश एक संवाद में नायक देव दे ही देते हैं, बकौल देव (रणवीर),-‘बच्चा पैदा कहीं भी हो, बनता वैसा ही है..जहां बड़ा होता है।’ इसी बात को भारतीय समाज में बताया जाता है कि मनुष्य के स्वभाव और सोच पर परवरिश और संगत का असर होता है। जन्म से कोई अच्छा-बुरा नहीं होता। शायद इसी धारणा को फिल्म रूपहले पर्दे पर व्यक्त करती नजर आती है।  एक वाक्य में समीक्षा की जाए तो, ‘किल-दिल’ फिल्म अंत तक दर्शकों को सीट पर बैठे रहने को मजबूर कर देती है।

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