नीरज
दर्शकों की नब्ज़ के जानकार फिल्म के निर्देशक, निर्माता और लेखक नीरज पांडेय की 'बेबी' ने लंबे अरसे बाद दर्शकों को फिल्म के अंत तक सिनेमाघर की कुर्सियों पर थमे रहने को मज़बूर कर दिया । 'ए वेडनस-डे' और 'स्पेशल-26' जैसी धांसू फिल्मों से बॉलीवुड में अपना लोहा मनवा चुके नीरज ने एक बार फिर आतंकवाद के विरुद्ध छिपे हुए हिस्से को बेहतरीन ढंग से उजागर कर अपने निर्देशन कौशल को बख़ूबी से प्रदर्शित किया है। देश के जांबाज़ों की कहानी पर बनी 'बेबी' फिल्म में सीक्रेट मिशन है, एक्शन है, जुनून है, नफरत है और नापाक साजिश है। बीच-बीच में हंसी के फुहारे भी हैं, पर गाने दमदार नहीं ।
फिल्म 'बेबी' को आलोचक भले ही 'डी-डे' सिक्वल कह रहे हों, पर इसमें कलाकार, स्क्रिप्ट और संवाद अदायगी का चयन बहुत उम्दा तरीके से किया है। मसलन फिल्म वह सीन जिसमें गृहमंत्री से 'बेबी' टीम के ऑफिसर फिरोज (डैनी) अपनी पूछने के लिए आता है कि दूसरे देश से आतंकवादी को गुपचुप तरीके से पकड़ने के लिए अंडरकवर ऑफिसर अजय सिंह राजपूत (अक्षय कुमार) को परमिशन दी जाए। मंत्री पूछते हैं कि यदि अजय पकड़ा गया तो? फिरोज अपनी दमदार आवाज़ में कहता है ''हम बोल देंगे कि हम इसे जानते ही नहीं है। फिर मंत्री पूछता है कि, तुम इसके मुंह पर ऐसा क्यों कहते हो। तब फिरोज़ (डैनी) का ज़बाव- मंत्री जी, मिल जाते हैं कुछ ऑफिसर्स हमें, थोड़े पागल, थोड़े अडि़यल। जिनके दिमाग में सिर्फ देश और देशभक्ति गूंजती रहती है., ये देश के लिए मरना नहीं चाहते बल्कि जीना चाहते हैं, ताकि आख़िरी सांस तक देश की रक्षा कर सकें।'' ऐसी संवाद अदायगी कहीं न कहीं हर दर्शक वर्ग में देश भक्ति का जोश और जूनून पैदा करती है। इसके अलावा हंसी की बौछारों की बात करें तो मंत्री का सचिव गुप्ता के थप्पड़ वाला सीन दर्शकों को गुदगुदाने में कोई क़सर नहीं छोड़ता एवं संदेश भी देता है कि, जांबाज़ जवानों की शहीदी को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। वहीं, फिल्म में नायक अजय (अक्षय कुमार) की पत्नी अंजली (मधुरिमा तुली) का वह संवाद जिसमें वह बार-बार कॉल करने पर अपने पति से कहती है-'बस, मरना मत।', श्रंगार और हास्य रस का मिला-जुला साक्षात उदाहरण है।
कहानी :-
चुनिंदा ऑफिसरों ने मिलकर पांच वर्ष का एक मिशन बनाया गया है जिसका नाम है 'बेबी'। ये लोग आतंकवादियों को ढूंढ उन्हें मार गिराते हैं। 'बेबी' फिल्म उनके अंतिम मिशन के बारे में हैं। इस यूनिट का हेड फिरोज (डैनी) के नेतृत्व में अजय सिंह राजपूत और उसके साथी ओम प्रकार शुक्ला (अनुपम खेर), जय सिंह राठौर (राणा दग्गुबाती), प्रिया सूर्यवंशी (तापसी पन्नू) इस मिशन के मुख्य सदस्य हैं। 'बेबी' टीम इंडियन मुजाहिदीन का खास बिलाल खान (केके मेनन) का पीछा करती है, जो मुंबई से भाग सऊदी अरब पहुंच गया है। बिलाल भारत के बड़े शहरों में दीवाली के मौके पर खतरनाक घटनाओं को अंजाम देना चाहता है। एक सीक्रेट मिशन के तहत बेबी की टीम उसके पीछे सऊदी अरब पहुंच जाती है और बिलाल को मारने के साथ ही उसके आका सईद रहमान (रशीद नाज़) को भी कठिन परिस्थ्िातियों में भारत ले लाती है।
किरदार :-
फिल्म के आलोचकों का मानना है कि वास्तविक घटनाओं से प्रेरणा लेकर वे थ्रिलर गढ़ने वाले निर्देशक और फिल्म के लेखक नीरज पांडेय ने 'डी-डे' फिल्म की भांति 'बेबी' में भी इस समय के कुख्यात आतंकी हाफिज़ सईद को लेकर फिल्म बनाई है। विदित हो कि बॉलीवुड की एक और फिल्म 'डी-डे' में भी दाऊद को पकड़ने की योजना को लेकर बनाई गई फिल्म थी। इसमें पाकिस्तानी कलाकार रशीद नाज़ का किरदार सईद से प्रेरित था। वहीं, फिल्म के मुख्य अभिनेता अक्षय कुमार ने अपने किरदार को बख़ूबी निभाया है। 'खिलाड़ी' नाम से ख्यात अक्षय ने इस अंडरकवर ऑफिसर के रोल बड़ी ही गंभीरता के साथ जिआ है। लेकिन देखने में आया कि अक्षय पर ही पूरी फिल्म टिकी रही। उनके मुकाबले अन्य कलाकारों को कम बहुत कम तबज्जों दी गई। राणा दग्गुबाती का रोल तो 'हल्क' यानि बच्चों के ख़तरनाक कार्टून जैसा लगा, जिसे केवल शरीरिक सौष्ठव का प्रदर्शन हेतु रखा जाता है, न कि सवाद अदायगी के लिए। हां, पर इतना है कि फिल्म में छोटे-सा रोल मिलने पर भी नवोदित अभिनेत्री तापसी पन्नू ने अपने किरदार का असर ज़रूर छोड़ा है। तापसी और अक्षय के बीच का नेपाल में वसीम खान को उठाकर लाने वाला घटनाक्रम फिल्म का एक बेहतरीन और एक्शन हिस्सा है। अनुपम खेर की भले ही फिल्म के क्लाइमैक्स में एंट्री हो लेकिन मंजे हुए कलाकार का नाम ही काफी है। अक्षय की पत्नी बनी मधुरिमा तूली के पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था, सिवाय हल्के हंसगुल्ले वाले संवादों के।
देखने में आता है कि ज़्यादातर फिल्मों की सफलता का श्रेय फिल्म के नायक-नायिका और खलनायक ही ले जाते हैं, लेकिन फिल्म के निर्देशक, निर्माता और लेखकों को गिने-चुने आम दर्शक जान पाते हैं। पर बॉलीवुड के एक ऐसे ही फिल्म निर्देशक, निर्माता और लेखक नीरज पांडेय को अपनी नवनिर्देशित फिल्म 'बेबी' के उम्दा, बेहतरीन निर्माण के लिए चहुं ओर से प्रशंसा मिली है।
क्यों देखें 'बेबी ' को
फिल्म दर्शकों को कुर्सी से हिलने न देने के लिए मजबूर कर देती है। इसका ख़ास कारण है कि फिल्म की दमदार पटकथा और कलाकारों का दमदार अभिनय । और इसके अलावा सबसे ख़ासबात है- गानों की कम संख्या, फिल्म में केवल दो ही गाने हैं। हालांकि, बाकी समय की स्क्रिप्ट क़बिलेतारीफ है क्योंकि फिल्म में जो सस्पेंस बना रहता है, वह दर्शकों में तीव्र उत्कंठा, उत्सुकता और व्यग्रता पैदा करने वाला होता है, जिससे दर्शक अपनी*अपनी तशरीफ कुर्सी पर टस सेमस भी नहीं कर पाते। इन सब बातों के अलावा फिल्म के मॉरल की बात करें तो 'बेबी' आतंकवादियों और खुफिया अफसरों के बारे में यह दिखाती है कि किस तरह सीमापार के लोग हमारे देश के नागरिकों को उनका हथियार बना रहे हैं। वे हमारी सरकार के खिलाफ खास समुदाय के लोगों के मन में संदेह पैदा कर रहे हैं ताकि उनका काम आसान हो, और तो और न जाने कितने ही ऐसे जांबाज़ अफसरों के त्याग-तपस्या और बलिदान के कारण हम चैन की नींद ले पाते हैं।
फिल्मी ख़ामियां
फिल्मी आलोचकों और समालोचकों के नज़रिए से देखा जाए तो 'बेबी' की पटकथा कितनी भी ठीक हो लेकिन कुछेक वह जगह ढीली हो जाती है। मसलन, अल-देहरा जैसे अरबी देश में भारतीय अफसरों की टीम को मिलने वाला हर व्यक्ति हिन्दी में बता कर लेता है और मुंबई की जेल में बंद बिलाल, सत्तर-अस्सी के दशक की फिल्मों की भांति आसानी से मुंबई से भाग निकल आता है। वहीं, अल-डेरा जैसे देश में पहुंचते ही प्रेम प्रकाश् शुक्ला आनन-फानन रिसॉर्ट की पूरे बिजली सिस्टम को हैक कर लेता है। 'ए वेडनस-डे' और 'स्पेशल-26' फिल्मों के लेखक नीरज पांडेय ने स्क्रिप्ट को कसा हुआ रखा है, लेकिन थोड़ी-बहुत एडिटिंग में लंबा खिंचाव है। मसलन, फिल्म के शुरूआत में इस्तांबुल पहुंच कर अजय का अपने साथी को आतंकियों से छुड़ाने वाला हिस्सा और क्लाइमेक्स में बिलाल को रिसॉर्ट में उड़ाने का ऑपरेशन फिल्म की कहानी के लिए इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितने फुटेज इसमें दिखाए गए हैं।
व्हीं, सऊदी अरब में जिस तरह से अपने मिशन को 'बेबी' ग्रुप अंजाम देता है उस पर यकीन करना मुश्किल होता है। हालांकि भारत सरकार की ओर से उन्हें पूरी मदद मिलती है और इसके जरिये फिल्म के निर्देशक ने ड्रामे को विश्वसनीय बनाने की पुरजोर कोशिश भी की है। इन खामियों के बावजूद नीरज रोमांच पैदा करने में सफल रहे हैं।
अंत में, फिल्म के सभी पहलुओं पर ग़ौर किया जाए तो 'बेबी' अक्षय कुमार की पिछली कई फिल्मों की तुलना में क़ाबिले-तारीफ है। लंबे समय से अक्सर हास-विनोद की फिल्मों में अक्षय कुमार बहुत दिनों बाद अपने पुराने रूप यानि एक्शन में वापस लौटे तो पर्दे पर छा गए हैं। संक्षेप में कहें तो फिल्म फुल-टू पैसा वसूल है, तभी तो सोमवार तक 36 करोड़ की कमाई कर चुकी है।
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