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Monday, 19 January 2015

बॉलीवुड के 'तेवर' में चंबल की गज़क








तेवर फिल्म के 'मैडमिया' गीत में ही हैं बोल- अरे स्माईल मलाई है तेरी, स्टाईल है गज़क....नरमी भी गरमी भी तू बड़ी गज़ब'










'तेवर' फिल्म के एक गीत के बोल "'अरे स्माईल मलाई है तेरी, स्टाईल है गज़क....नरमी भी गरमी भी तू बड़ी गज़ब'' से याद आया कि, शायद ! उसी गज़क की गर्मी और नरमी की बात हो रही है जो चम्बल के पानी से तैयार होती है। उस पानी की तासीर ही ऐसी है कि, जिसने भी पीया उसने पानी की गर्मी का असर कही न कहीं दिखा दिया। चाहे वह स्वतंत्रता का आंदोलन हो या बीहडों में बागियों की दहाड़। इसीलिए बॉलीवुड ने भी चम्बल के नकारात्मक पहलू को दिखाकर वाहवाही लूटी। इसी मायानगरी ने अब, मुरैना की गजक का जिक्र तेवर फिल्म के गाने में कर चम्बल की सकारात्मकता को देश में प्रदर्शित करने का कार्य किया है। 


मुरैना की ख़स्ता, ताज़ा गज़क
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बात अब छिड़ ही गई है तो बता दें कि, चम्बल के पानी से बनने वाली गजक सर्दियों में गर्म तासीर के कारण कुरकुरी खस्ता होती है। चम्बल की गज़क विदेशों तक अपनी पहचान स्थापित करने में कई दशकों से कामयाब हुई है। चम्बल के पानी की तासीर कितनी गर्म है इसे फिल्मी पर्दे पर 6 दशकों सें देशवासी देख रहे हैं। इस नकारात्मक पहलू को अन्तर्राष्ट्रीय धावक पानसिंह तोमर जो बाद में बागी हो गया, कि फिल्म में सकारात्मक रूप से दिखाया गया। इसी पानी से बनी गज़क दशकों से विदेशों तक अपने खस्तापन से यादगार बनी रहती है।
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तस्वीर में गज़क बनाते हुए कारीगर                                             फोटो : साभार
गज़क के विभ‍िन्न प्रकार                                             फोटो : साभार
गजक बनाने वाले पुराने कारीगर लखन का कहना है कि, चम्बल के पानी से ही इसकी गुणवत्ता बेहतर होती है। देश में अन्य किसी स्थान पर गज़क की गुणवत्ता चम्बल जैसी नहीं बन पाती। यहां क्वालिटी की गजक बनाने वाला भी देश के अन्य राज्यों में निर्मित करने पर गजक की गुणवत्ता नहीं दे पाता। पानी की गर्मी इतनी अधिक गजक में होती है कि, 'गर्मी के दिनों में यह गजक पिघल जाती है।' चंबल नदी के किनारे बसे मुरैना शहर में बनने वाली गजक का इतिहास लगभग 80 साल पुराना है। आज गजक का व्यापार बडे़ पैमाने पर किया जा रहा है, मुरैना में ही लगभग छोटे बड़े 200 से अधिक लोग हैं जो गजक बनाने का काम करते हैं, और औसतन 100 किलो गजक हरेक व्यापारी एक दिन में तैयार कर बेच देता है। वहीं, मुरैना के अलावा उप्र, मप्र के कई जिलों में मुरैना के नाम से ही गज़क बेच कर व्यापारी कमाई कर रहे हैं। मुरैना की गजक न सिर्फ़ अंचल में बल्कि पूरे देश भर में यहाँ से तैयार होकर जाती है। देश-विदेशों में बसे लोग गज़क को मुरैना से भारी मात्रा में मंगवाते हैं। अगर, यह कहें की मुरैना शहर ने बंदूक, बोली और बीहड़ों के अलावा किसी और बात में नाम कमाया है तो वह गज़क उद्योग ही होगा। अनुमानत: मुरैना में एक दिन 25 लाख की गजक बिक जाती है। इन तथ्यों को गजक के कई वर्षों से व्यवसाय में लगे कमल भी स्वीकार करते हैं। गजक की महत्ता को अब फिल्मनगरी ने भी स्वीकार कर लिया है। इसीलिए हाल ही में आई फिल्म तेवर में ''मैडमिया'' आइटम सोंग में गज़क की गर्मी और नरमी का जिक्र किया है। इस फिल्म के गाने में गज़क को महत्व देकर चम्बल की सकारात्मक एवं गजक के कुटीर उद्योग को प्रसिद्धी दिलाने का कार्य किया है। 
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आज से 8 दशक पूर्व संक्राति पर्व से आरम्भ हुई गज़क गरीबों की मिठाई के रूप में विख्यात थी। तिल -गुड से कूट-कूट कर बनने वाली यह मिठाई अब गरीबों से दूर होती जा रही है। मंहगाई की मार तिल गुड, शक्कर, कोयला पर हो रही है। इसी से इसके निर्माता कारीगर प्रभावित हैं। यही कारण है कि मिलावट से दूर शुद्ध मिठाई के रूप में यह अमीरों की पसन्द बन गई है। बड़े-बड़े डिब्बे और कार्टूनों में यह अमीरों के घर पहुचने लगी है। हालांकि, यह देखना अभी बाकी है कि, आख़िर कब तक गज़क को भी मिठाईयों और मावा की तरह 'कैडबरी सैलीब्रेशन पैक' की नज़र नहीं लगती।

2 comments:

  1. मुरैना की गजक के स्वाद के क्या कहने... कहीं और की गजक खाने में वो बात नहीं है, वो स्वाद नहीं आता जो चम्बल की गजक खाने में आता है.... बहुत ही बढ़िया लिखा है नीरज भाई

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    1. लोकेन्द्र भैया, हालांकि, इसमें कुछ समंकों (डाटा) की कमी है, लेकिन जितना समझ में आया उतना लिख डाला।
      आप इसी तरह हौंसला अफ़ज़ाई करते रहिएगा....

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