''कार्यकर्ता, कोष और कार्यालय'' किसी भी संगठन का मुख्य आधार होते हैं. केंद्र में सत्तारूढ़ दल बीजेपी के पास अथाह-अपार कोष भी है. एक से एक लग्जरी कार्यालय भी हैं और कार्यकर्ता भी हैं. मग़र वे होते हुए भी नहीं हैं, क्योंकि वे संतुष्ट नहीं हैं. इसके चलते बीजेपी किसी भी क़ीमत पर यूपी में फ़तह हासिल नहीं कर सकेगी. जब तक सपा से बीजेपी के दिग्गज नेता गलबहियां करते रहेंगे, तब तक कुछ संभव नहीं. दरअसल, भयंकर वाली प्रतिद्वंदता राजनीति में दिखनी चाहिए, वरना कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है. हालांकि, कांग्रेस और भाजपा जैसी राजनैतिक पार्टियों का तुर्रा यह है कि 'सियासत में मतभेद होने चाहिए, मनभेद नहीं.' राजनैतिक शुचिता ज़रूरी है.
तुम शुचिता और सदाशयता में उलझे रहो. उधर बसपा सुप्रीमो मायावती की सोशल इंजीनियरिंग फिर शुरू हो गई. वे ब्राम्हण, बनिया, दलित, वंचित सबको साध कर चल रहीं हैं. सबसे ख़ास बात यह है कि, वो विपक्षियों से कट्टर दुश्मनी बनाकर रखती हैं और इसी से उनके कार्यकर्ताओं और जनता का जोश बढ़ता है. उसी जोश-खरोश में लोग वोट भी डाल आते हैं. अब बीजेपी वाले मुलायम के नाती-पोते की शादी में जाएंगे, मथुराकांड पर सीबीआई जांच नहीं बिठाएंगे, लखनऊ में मिलजुल कर मौज़ मनाएंगे, तो मायावती पक्की में बाज़ी मार रही हैं. मारेंगीं भी क्यों न ? आख़िर, कड़क मिज़ाज में भाषण जो देती हैं. सीधे टारगेट वाले. गुंडों को जेल भिजवाएंगे. लॉ एंड ऑर्डर सही तरीके से चलेगा. बाहुबलियों को जेल में ठुकवा देंगे.
एक बार सपा की टोपी पहनकर एके-47 घर में रखने वाले संजय दत्त उर्फ मुन्नाभाई ने बोल दिया था कि, ''मैं मायवती को जादू की झप्पी देने आया हूं.'' संजू के बयान को ज़मीन पर गिरने में देरी नहीं हुई और इससे पहले मायावती ने बयान (लिखा हुआ पढ़कर) दे डाला कि, ''हम झप्पी-सप्पी नहीं देते, सीधे जेल में ठोक देते हैं.'' उसके बाद से कांग्रेसी नेता के पुत्र संजू बाबा ने मायानगरी खिसकने में ही भलाई समझी. ख़ैर, अब तो वह थोड़ा-सा 'रंग दे तू मोहे गेरूआ (भगवा)' गाने की लाइन पर चलने लगे हैं. उसी समय मुंह-ज़ुबान से शोलेयुक्त शब्द उगलने वाले आज़म खान ने जयाप्रदा, संजय दत्त समेत सपा में कुछ देर के लिए शामिल होने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों के बारे में कहा था कि, ''ये पूरी भांडों की नाटक मंडली है, जो हमेशा साथ चलती है.''
बहरहाल, इस मामले में बीजेपी में नितिन गड़करी ज़रूर दमदार हैं. उनकी तारीफ़ की जानी चाहिए. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से उनकी ऐसी ठनी कि आज तक दोनों में जबरदस्त ठनी ही है. बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी के बेटे की शादी में इंदौर के हलवाई बुलाने पर दिग्विजय ने चुटकी लेते हुए कहा था कि, गड़करी ने तीन दिन तक शादी समारोह आयोजित किया. हज़ारों लोग पहुंचे. वहीं, इंदौर के हलवाई ने प्रति व्यक्ति 800 रुपए प्लेट खाने के वसूले. गड़करी के पास इतना पैसा कहां से आया. इसके बाद उन्होंने गड़करी के आपूर्ति ग्रुप पर हमला बोला था. गड़करी सबसे ज़्यादा विवादास्पद बयानों के चलते ही विवादों में आए थे. उन्होंने भी दिग्गी राजा को ''दौ कौड़ी'' का आदमी कह दिया था. इसके जबाव में दिग्गी ने भी कहा- मैं दो कौड़ी का ही हूं, आख़िर मेरे पास नितिन गड़करी के बराबर माल कहां ? तभी से दोनों में अनबन है. इसके अलावा बीजेपी में मौज़ूदा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और तत्कालीन मध्य प्रदेश बीजेपी के मुखिया प्रभात झा जी ने भी आक्रामक राजनीति शुरू की। सीधे विपक्षी नेताओं पर कटाक्ष किये और तगड़े-तगड़े ज़ुबानी हमले भी बोले, लेकिन मिल-बाँट कर खाने वालों ने उन्हें भी किनारे लगा दिया। उधर, गडकरी भी दूसरी बार राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते-बनते रुक गए। यानी बीजेपी ने ऐसे नेताओं को कुछ करने न दिया।
उधर, कांग्रेसी दिग्गी राजा भी कार्यकर्ताओं के लिए भोपाल में सुरक्षाकर्मियों से भिड़ गए थे. वे भी व्यक्तिगत व सीधे टारगेट वाली खूंखार राजनीति करते हैं. दिग्विजय सिंह ने एक कार्यक्रम में यहां तक कह दिया कि, मध्य प्रदेश में एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं पर भाजपा सरकार ने जितने भी केस दर्ज किए हैं, वो केस कांग्रेस की सरकार बढ़ाने पर हटा लिए जाएंगे. ये होती है ज़मीन पर पकड़ बनाने की स्टाइल.
गुजरात दंगों के वक़्त मुख्यमंत्री मोदी ने पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के तत्कालीन सीएम दिग्गी राजा से पुलिस बल की मांग की थी, लेकिन कोइ मदद नहीं मिली. इस बात को ख़ुद मोदी जी ने वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला और दिग्विजय सिंह के सामने एक चैनल के कार्यक्रम में बोला था. एक बीजेपी कार्यकर्ता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि, जब ऐसा हो चुका था तो पीएम मोदी को दिग्विजय सिंह के बेटे की शादी में नहीं जाना था. इससे ज़मीनी कार्यकर्ताओं पर ग़लत असर पड़ता है. वे विचारधारा और पार्टी को लेकर पड़ोसियों से, ट्रेन में बैठे यात्रियों से लड़ पड़ते हैं, उधर पार्टी का नेतृत्व विपक्षियों से यारना प्रदर्शित करने का एक भी मौक़ा नहीं छोड़ता.
शायद ! इसीलिए अब उत्तप्रदेश मौजूदा पुत्तरप्रदेश सूबे की मुख्य गद्दी पर हवाई जहाज से सैंडिल मंगाने वाली मायावती के क़ाबिज़ होने की फिर से आहट सुनाई पड़ रही है. माया का सबसे मस्त फॉर्मूला यह है कि वो उपचुनाव नहीं लड़ती, क्योंकि भलीभंति जानती हैं कि सत्तारूढ़ दल ही उन चुनावों को जीतते हैं और इससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बहुत ज़्यादा ही गिरता है. अब बसपा के सोशल इंजीनियर तैयार हैं. सीधे टारगेट वाले भाषण तैयार किए जा रहे हैं. गोलीमार बयान मायावती जी से दिलवाए जा रहे हैं. गांव-गली-कूचों और पान की गुमटियों पर पुराने शासनकाल की तरह लॉ एंड ऑर्डर को दुरुस्त करने की बातें करवाईं जा रही हैं.
अब कांग्रेस भी वैशाखी लेने यानी गठबंधन और हठबंधन मायावती से करने को तैयार है. सपा के दिन लद गए. बची बीजेपी. जो सबसे अलग खड़ी है विकल्प बनकर. मग़र फिलहाल तो हालत ये है कि घर में ही किचकिच मची है. गिनीज बुक ऐसे रिकॉर्ड दर्ज कर नहीं करती, वरना इतिहास में पहली बार किसी राज्य में मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा की तरफ से सबसे ज़्यादा लोगों की दावेदारी का एक अनोखा रिकॉर्ड भी क़ायम हो जाता.
 |
| सोशल मीडिया कैंपेनर प्रशांत किशोर |
ख़ैर, अंत में भी यही कि देश के सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाले यानी समझो हर साल ऑस्ट्रेलिया जैसे देश की बराबर जनता पैदा करने वाला सूबा तब तक बीजेपी के कब्जे में नहीं आने वाला, जब तक कोई अच्छा चेहरा मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाया जाता और कार्यकर्ताओं को संतुष्ट नहीं किया जाता. हां, बीजेपी यहां हरियाणा जैसी इच्छा कतई न पाले, वरना बिहार जैसा हश्र होगा. हालांकि, वातावरण देखकर वोट देने वाले सबसे ज़्यादा वोटर तो अभी ‛तेल देखो-तेल की धार देखो’ वाली स्थिति में हैं।
- नीरज