भोर होते ही पंछियों का मधुर कलरव किसी लयबद्ध संगीत के सुरों सा वातावरण में मिठास घोल रहा था। शहर से सटे उस गंवई इलाके के एक छोटे से शांत मोहल्ले में राधेश्याम बाबू और उनकी पत्नी सुनीता रोजाना की तरह आज भी जल्दी उठकर अपने काम-काज निपटाने में लगे थे। सुनीता गाय-भैंस की सेवा व मेवा से छुटकारा पाते ही छुटकू को स्कूल के लिए जल्दी-पल्दी तैयार करने लगी क्योंकि स्कूल की बस वाला पांच मिनिट भी इंतजार नहीं करता। काम के बोझ से दबी सुनीता मशीन की तरह काम में लगी है.. और पतिदेव हैं कि चायपीते-पीते अख़बार के शाब्दिक सागर में डूबे हैं। पति राधेश्याम बाबू का ध्यान खींचते हुए सुनीता,-''सुनिए, छुटकू की बस निकल जाएगी...मैं इसे छोड़कर आती हूं। ऐसा करना दूध गरम करने रख दो और आज ज़रा आंगन में झाडू भी लगा देना ।'' राधेश्याम बाबू अपने ही जिले में कलेक्टर के निजी सचिव हैं, और गांव में ही रहते हैं। गांव में रहने का कारण है कि शहर से ही सटा हुआ है और कलेक्टर के पीए होने के नाते ग्रामीण उन्हें ही कलेक्टर मानते हैं। रुतबा ऐसा कि अच्छे-अच्छे पानी भरें। पत्नी सुनीता के ऊंचे आर्डर सुनते ही राधे बाबू-''बोलने से पहले सोच लिया कर, इतना भी काम नाय ..जितना तू दिखा रही। तू सोच ज़रा मुझे कोई झाडू लगाते देख लेवे न, तो मेरी तो धुल गई। हमसे न होय ऐसे जनाने काम।...छुटकू को छोड़ के आ..और जो करना है, सो कर।। '' इतना सुनते ही सुनीता बुरे से मन से साड़ी का पल्ला लेकर छुटकू को बस में बिठाने चल दी..वापस आकर काम-धाम निपटाने लगी क्योंकि पति देव को कार्यालय जो जाना था। पता ही नहीं चला कि दिन के 1 बज गए। छुटकू भी अन्य बच्चों के साथ फुदकता हुआ घर आ पहुंचा और बैग, कपड़े, जूते कमरे की चारों दिशाओं में उड़ाते हुए फेंक दिए। फिर क्या..रोज़ाना की तरह लग गया मां के सीने से। बड़ा ही लाड़-प्यार करते हुए मां उसको टीवी पर कार्टून दिखाने के बहाने बड़ी ही न-नुकुर के बाद खाना खिलाने लगी....कि एकाएक चैनल बदला..न्यूज़ लग गई और छुटकू एकदम से,-''मां...मां..देखो पापा...मां देखो पापा'' अपनी उंगली टीवी की तरफ देखकर कहने लगा, कुछ सोचने में व्यस्त सुनीता को लगा कि छुटकू की आदत है। टीवी में वो किसी भी मर्द को देखकर पापा..पापा कहने लगता है। लेकिन जब सुनीता ने भी देखा तो पाया कि राधेश्याम बाबू कलेक्टर महोदय के साथ-साथ ''सफाई अभियान'' के तहत खूब मुस्कुराते ही झाडू मारे जा रहे हैं..। यह देख बच्चे की मां सुनीता मंद-मंद मुस्काई जा रही है...और काम की मशीन का मन तो कर रहा है कि पतिदेव के घर आते ही उनके लत्ते-पत्ते ले लूं, लेकिन वो उस ना समझ नन्हें छुटकू से ही बातें कह-कहकर भड़ास निकाल रही है-''देख..बेटा, अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे।।'' पर छुटकू अपने पापा को नज़दीक देखकर बहुत ही उछल रहा है......।
Tuesday, 7 October 2014
पटना में भगदड़
पटना में भगदड़...चित्रकूट में भगदड़....इलाहाबाद में भगदड़...यहां भगदड़..वहां भगदड़। कौन कराता है ये भगदड़ ? कैसे होती है ये भगदड़ ? भगदड़ से हमारी सल्तनतें क्या सबक लेतीं हैं ? आज तक कितने भगदड़ कराने वालों..अफवाह फैलाने वालों काे हिरासत में लिया गया ? ..न जाने कितने ही सवाल इन ख़बरों को सुनने वाली आवाम के जेहन में उठते होंगे..लेकिन सियासतदां अपनी चतुर चालें चलकर मामले का ठंडा करने में माहिर जो है। पटना में घटी घटना के बाद चहुं ओर रुदन, क्रंदन, हाहाकार..सुनाई दे रहा है......।
बुरा करने के लिए लिए जगत में कुख्यात वो मनहूस रावण, आज अपने साथ न जाने कितनों को ले जा रहा है। अब रावण को ही दोष देना सही होगा, क्योंकि पटना में सरकार तो ठेके पर चल रही है। प्रशासन धोके पर चल रहा है। इस समय तो लग रहा है..वहां किसी का किसी पर कंट्रोल ही नहीं बचा। अब सुनिए न इन तमाम रविशंकर प्रसादों..पासवानों...समेत दिग्गज कहलाने वालों की। इसमें में भी ये माननीय थोड़ा-बहुत सियासत का तड़का लगाने से नहीं चूके।
प्रसाद कह रहे हैं-'' यह न केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण और अफसोसजनक घटना है बल्कि शर्मनाक भी है. हर साल गांधी मैदान में दशहरा समारोह का आयोजन किया जाता है. इसके बावजूद कोई उचित प्रबंध नहीं किए गए...हाल ही में वहां छठ पूजा के दौरान हादसा हुआ था. पिछले वर्ष अक्तूबर में नरेन्द्र मोदी की रैली के दौरान घटना हुई थी.’’ वहीं, केन्द्रीय मंत्री पासवान भी यही राग अलाप रहे हैं। ख़ैर ये तो इतना भी बोल रहे हैं लेकिन बिहार सरकार तो लगता है जु़र्म करके फरारी काटने चली गई है। वहां तो कोई कुछ बोल ही नहीं रहा। मंत्रियों के फोन बंद...कान बंद..। अब भला रात में भी क्या करेंगे वो आकर। जिन्हें जाना था.. वो चले गए..। जिन्हें मरने वालों की बिछड़न में रोना हैं..वे रो रहे हैं..। अब सब मामला सुबह ही देखा जाएगा..।
वो तो भला हो इस मुल्क़ के निज़ाम का, जिसने आधी रात को ही सूबे की सरकार से पहले काल के गाल में समा गए लोगो के परिवारों को मुआवज़ा रूपी मरहम लगा दी.. और करते भी तो क्या...उनका तो यही फर्ज़ बनता है।
अब फिर वहीं पुराना राग शुरू होगा..जो हर बार होता है..। सूबे से घटना की रिपोर्ट मांगी जाएगी...फिर किसी को बलि का बकरा बनाया जाएगा...फिर वोटों की गाेटियां बिठाई जाएंगी। सत्ता के साधकों के द्वारा इस मामले को फिर ''चर्चा करके, चिंता करके..चलता'' करने में देर नहीं की जाएगी। करें भी तो क्या ?? पुरानी आदत जो पड़ गई है।
आगे की कार्रवाही भी जान लीजिए..। जहां घटना हुई वहां का करोडा़ें का दौरा होगा..उड़नखटोले उतरेंगे..हैलीपैड बनेंगे...फोटोग्राफी होगी...ज़रा सी सियासत भी होगी। फिर आगे की सुनिए ...। एंबेसडर गाडि़यों के आगे-पीछे हमारे अफसरान दौड़ेंगे...गुफ्तगू होगी..एक-दूसरे निज़ामों को दोषी ठहराने की फाइलें तैयार होंगी.. और फिर तैयार हाेगा दुर्घटनास्थल की दुरूस्त व्यवस्था के लिए भारी -भरकम पैकेज...जिससे कभी उस जगह ऐसी घटना न घट सके। ..जिसमें सबका सार निहित है।.. फिर जैसा कि आप सब को पता है....
''चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग'' को हर वर्ग ने सराहा
लब्धप्रतिष्ठित पत्रकार व एबीपी न्यूज़ मध्यप्रदेश के ब्यूरो प्रमुख श्री ब्रजेश राजपूत की किताब (Chunav, rajneeti aur reporting) मीडिया के विद्यार्थियों, राजनीतिक विचारकों, विश्लेषकों के लिए यह पुस्तक एक उपयोगी दस्तावेज दस्तावेज़ बन गई है। बेहद सरल और सहज भाषा शैली में लिखी गई इस चर्चित ''चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग'' पुस्तक की समीक्षा को प्रदेश की नवोदित पत्रिका ''प्रदेश संवाददाता'' ने अपने सितंबर माह के अंक में जगह दी है।
ख़ास बात यह है कि जल्द ही इस पुस्तक का दूसरा संस्करण भी बाज़ार में आने वाला है। हर पाठक वर्ग में सराहे जाने वाली इस पुस्तक की समीक्षा इस नाचीज़ ने लिखी है।
पांच रुपए का घी
नीरज
उस दोपहर धूप में वो कड़कपन नहीं बचा था। पितृपक्षों का आखिरी दिन था। बाज़ार में चहल-पहल काफी थी। पकवानों की खुशबू उस कस्बाई इलाके के घरों से बिना पूछे नथुनों में समा रही थी। क़रीब 3 बजे का समय होगा, मैं उस कस्बाई इलाके की प्रसिद्ध किराना दुकान पर कुछ सामान लेने पहुंचा। सेठ जी नौकरों को हमेशा की तरह अपनी सेठगिरी दिखा रहे थे। मैंने सामान का पर्चा सेठजी के हाथ में थमाया कि, अचानक एक छोटी- सी बच्ची मटमैले से कपड़ों में फुदकती हुई वहां आ पहुंची, और तपाक से दुकानदार से बोली,-''अंकल, पांच रुपए का घी देना।'' सेठ अपने मोटापे के आधार पर पूरी ताक़त से साथ उस बच्ची को दुत्कारते हुए,-''तुम्हारे बाप ने खाया पांच रुपए घी, चल जा।'' धूप में तो कड़कपन नहीं था पर उस सेठ की बातों में ज़रूर था। रावण की तरह अट्टाहास करते हुए बोला-'' पांच रुपए में घी तो क्या घी की खुशबू भी न मिले ।'' सेठ के दुत्कारते ही उस बच्ची की न जाने कितनी उम्मीदें टूट चुकीं थी।
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