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Tuesday, 7 October 2014

पांच रुपए का घी


नीरज

स दोपहर धूप में वो कड़कपन नहीं बचा था। पितृपक्षों का आखिरी दिन था। बाज़ार में चहल-पहल काफी थी। पकवानों की खुशबू उस कस्बाई इलाके के घरों से बिना पूछे नथुनों में समा रही थी। क़रीब 3 बजे का समय होगा, मैं उस कस्बाई इलाके की प्रसिद्ध किराना दुकान पर कुछ सामान लेने पहुंचा। सेठ जी नौकरों को हमेशा की तरह अपनी सेठगिरी दिखा रहे थे। मैंने सामान का पर्चा सेठजी के हाथ में थमाया कि, अचानक एक छोटी- सी बच्ची मटमैले से कपड़ों में फुदकती हुई वहां आ पहुंची, और तपाक से दुकानदार से बोली,-''अंकल, पांच रुपए का घी देना।'' सेठ अपने मोटापे के आधार पर पूरी ताक़त से साथ उस बच्ची को दुत्कारते हुए,-''तुम्हारे बाप ने खाया पांच रुपए घी, चल जा।'' धूप में तो कड़कपन नहीं था पर उस सेठ की बातों में ज़रूर था। रावण की तरह अट्टाहास करते हुए बोला-'' पांच रुपए में घी तो क्या घी की खुशबू भी न मिले ।'' सेठ के दुत्कारते ही उस बच्ची की न जाने कितनी उम्मीदें टूट चुकीं थी।

घर से फुदकते हुए पांच रुपए का घी लेने निकली उस भोली-सी सूरत वाली अभागी के सारे सपने मानों छन्न से टूट गए थे। दुकान की देहरी पर थम-सी गई थी। दुकान की तरफ पीठ करके मिर्ची के बारे के पास में खड़ी ढंग से रो भी नहीं पा रही थी। आंखों में आंसू ज़रूर भर लिए थे उसने। घर में न जाने क्या-क्या बोल कर आई होगी वो.. भाई-बहिनों को ''पांच रुपए के घी '' से बने न जाने क्या-क्या पकवान परोसने वाली होगी वो ..! पर कर भी क्या सकती थी..रुंआसी आंखों से ज़मीन की ओर देखती हुई रास्ते में पड़े कंकड़-पत्थरों को चप्पल से ठोकर मारती हुई चल दी अपने छोटे-से आशियाने की ओर.....। पता नहीं वहां तक पहुंची कि नहीं.....।



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