नीरज
उस दोपहर धूप में वो कड़कपन नहीं बचा था। पितृपक्षों का आखिरी दिन था। बाज़ार में चहल-पहल काफी थी। पकवानों की खुशबू उस कस्बाई इलाके के घरों से बिना पूछे नथुनों में समा रही थी। क़रीब 3 बजे का समय होगा, मैं उस कस्बाई इलाके की प्रसिद्ध किराना दुकान पर कुछ सामान लेने पहुंचा। सेठ जी नौकरों को हमेशा की तरह अपनी सेठगिरी दिखा रहे थे। मैंने सामान का पर्चा सेठजी के हाथ में थमाया कि, अचानक एक छोटी- सी बच्ची मटमैले से कपड़ों में फुदकती हुई वहां आ पहुंची, और तपाक से दुकानदार से बोली,-''अंकल, पांच रुपए का घी देना।'' सेठ अपने मोटापे के आधार पर पूरी ताक़त से साथ उस बच्ची को दुत्कारते हुए,-''तुम्हारे बाप ने खाया पांच रुपए घी, चल जा।'' धूप में तो कड़कपन नहीं था पर उस सेठ की बातों में ज़रूर था। रावण की तरह अट्टाहास करते हुए बोला-'' पांच रुपए में घी तो क्या घी की खुशबू भी न मिले ।'' सेठ के दुत्कारते ही उस बच्ची की न जाने कितनी उम्मीदें टूट चुकीं थी।

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