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Thursday, 24 July 2014

राजनीति की गांठें खोलती 'देश कठपुतलियों के हाथ में'



हां एक ओर दौड़-भाग भरी जिंदगी और तमाम इच्छाओं की त्वरित पूर्ति के लिए दिन-रात खपती युवा पीढ़ी के लिए साहित्य, समाज, देश और राजनीति के विषय में सोचना, लिखना, पढ़ना जैसे दूर की कौड़ी हो गया है। वहीं, ग्वालियर-चंबल की धरती पर जन्मे लोकेन्द्र सिंह राष्ट्र प्रेम की लौ अपने हृदय में शैशवकाल से जलाए आ रहे हैं, इसी की तड़प है कि वे कम उम्र में ही आज देश के प्रख्यात-ख्यातिलब्ध साहित्यकारों, पत्रकारों, ब्लॉगर्स की कतार में खड़े हो गए हैं।
    
पत्रकारिता की पाठशाला दैनिक स्वदेश, ग्वालियर से पत्रकारिता का क, ख, ग सीखने वाले लोकेन्द्र सिंह ने नईदुनिया, पत्रिका और  दैनिक भास्कर जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में लम्बे समय तक अपनी सेवाएं देकर पहचान बनाई। उनके समसामायिक विषयों पर आलेख, कविता, कहानी और यात्रा वृतांत देशभर के पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशित होते रहते हैं। इस युवा पत्रकार और साहित्यकार ने लेखन जगत में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी किताब 'देश कठपुतलियों के हाथ में' अभी हाल ही में प्रकाशित हुयी है।
    
सामाजिक, सांस्कृतिक, मीडिया और राजनैतिक मसलों पर लिखने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, चिंतक, विचारक और ख्यातिलब्ध पत्रकार लोकेन्द्र सिंह की यह प्रथम कृति पठनीय साबित हो रही है। 'देश कठपुतलियों के हाथ में' लेखक के चुनिंदा आलेखों का संग्रह है। लोकसभा निर्वाचन- 2014 के पूर्व की सामाजिक, राजनैतिक परिस्थियों की यथार्थता पर बेबाक टिप्पणियों से भरे-पूरे छयालीस आलेखों का संकलन स्वागत योग्य प्रयत्न है। लेखक ने वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य को बेहद सुंदर और भावपूर्ण अर्थ में समझाते हुए 'अपनी बात' में लिखा है कि ''राजनीति कोई स्वर्णरेखा नाला जैसी है'' (ग्वालियर शहर के बीचों-बीच से निकला हुआ सबसे बड़ा नाला, जो कभी स्वर्णरेखा नदी हुआ करता था।) नाम अच्छा लेकिन चरित्र खराब। ऐसा इसलिए क्योंकि समाज के खास तबके द्वारा राजनीति को गन्दा बताया जाता है।'
    
लेखक की कथा एवं भाषा शैली विचारोत्तेजक, प्रभावपूर्ण और आंदोलित करने वाली है। मुख्यत: आतंकवाद, भ्रष्टाचार, मौजूदा सियासत को आधार बनाकर रचित इस संग्रहणीय कृति में पाठक के मानस को झकझोरने वाली बातों का समावेश किया गया है। तमाम तथ्यों और तर्कों के आधार पर लिखी गईं प्रभावशाली बातें लेखक की विश्वसनीयता और उच्च बौद्धिकता की परिचायक हैं।
    
लेखक की चिंतन शैली इस कदर जबरदस्त है कि उन्होंने अपने एक लेख में पहले ही पूर्वानुमान लगा लिया था कि अगर भाजपा नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करती है तो संभावना है कि मोदी के प्रधानमंत्री पद की घोषणा होते ही नीतीश कुमार राजग (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) से नाता तोड़ लेंगे। उक्त बात महज़ कुछ दिनों के बाद अक्षरश: सत्य सिद्ध हुई। लेखक की वैचारिक गहराई और राष्ट्र प्रेम की जो तड़प हृदय से उपजी है, उसे लेखक ने अपने शब्दों के रूप में इस सारगर्भित कृति में उड़ेल दिया है।
    
      अमूमन देखने को आता है कि समसामयिक विषयों पर लिखे गए लेखों की उन्हीं दिवसों के लिए प्रांसगिकता होती है किन्तु 'देश कुठपु‍तलियों के हाथ में' पुस्तक को पढ़कर समझ में आता है कि इसमें संकलित लेख भविष्य के लिए ही लिखे गए हों। लेखक ने शायद इन्हें भारत के भविष्य के पाठकों के लिए ही लिखा हो। गोयाकि लेखक ने राजनीति के 'मोदी, मोदी और मोदी', 'इमेज सेट करने का खालिस षड्यंत्र', 'दामिनी कह गई-अब सोना नहीं', 'कुछ सवाल केजरीवाल से', 'तुष्टीकरण पर सुप्रीम कोर्ट की चोट', 'कांग्रेस को लगी मिर्ची' जैसे छयालीस लेखों में राजनीति के लगभग सभी पहलुओं को छुआ है, जिसमें सर्वप्रथम राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद की झलक स्पष्टत: परिलक्षित होती प्रतीत होती है किन्तु लेखक ने 'भाजपा के सेक्स लीडर' जैसे विचारोत्तेजक लेख लिखकर पुस्तक को किसी दल या विचारधारा विशेष का अभिनन्दन ग्रन्थ होने से बचा लिया है।
    
      तत्कालीन चर्चित विषयों पर लेखक ने अपने तरीके से विचार कर उसे तीखी अभिव्यक्ति प्रदान की है उनकी शैली में आकर्षण है। शीर्षकों में दृश्यात्मकता, सकारात्मकता, विश्लेषणात्मकता और काव्यात्मकता झलकती है। उनके शीर्षक पाठकों को पूरा लेख पढने को आमंत्रित करते हैं, यह भी कहा जा सकता है कि वे पढने को मजबूर करते हैं। चतुर्दिक जो परिदृश्य है, वो हताशा और निराशा को बढ़ाने वाले हैं। इनमें बदलाव आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। बात जब तथ्यों के आधार पर पूरे विश्लेषण के साथ रखी जाती है तो उसमें वजन होता है। इन लेखों की यही विशेषता है। राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्थाओं पर लेखक ने जमकर चोटें भी हैं। तटस्थ समीक्षक की दृष्टि से लेखन में राष्ट्रवाद की झलक दिखलाई पड़ती है। विषयों के चयन में विशेष दृष्टि रही है। जो विषयों की मौलिकता ला पाई है। वहीं, इसकी आवरण सज्जा ही मौन रूप से बहुत कुछ संदेश देती हुई प्रतीत होती है। तथ्यात्मक सधी हुई भावुकता जो तर्क संगत एवं वैचारिक विरलता लिए हुए है, पाठकों पर पर्याप्त प्रभाव डाल रही है।
    
अंत में, पथ भ्रष्ट राजनीति को पटरी पर लाने के लिए समाज की चेतना को जागृत कर उसे बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए चेताना ही साहित्यकार और पत्रकार का सर्वोपरि संकल्प होता है। इस दृष्टि से पुस्तक के सभी आलेख उम्दा सिद्ध हो रहे हैं। उम्मीद ही वरन् यकीन है कि पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' पाठकों के मानस पटल पर गहरा प्रभाव डालेगी, राजनीति को नजदीक से समझाने और उसके गंदे वातावरण से सचेत करने की दृष्टि से बेहद उपयोगी सिद्ध होगी। लेखक लोकेन्द्र सिंह को बधाईयां ! इस समय चर्चा का विषय बन चुकी पुस्तक के पाठकों के बीच पहुंचने के बाद उनकी भविष्य में आने वाली कृति और रचना की प्रतीक्षा रहेगी।

- नीरज चौधरी (समीक्षक युवा पत्रकार और लेखक हैं।


पुस्तक : देश कठपुतलियों के हाथ में
लेखक : लाकेन्द्र  सिंह
संपर्क : lokendra777@gmail.com
मूल्य : 150 रुपये
प्रकाशक : स्पंदन 
ई-31, 45 बंगले, भोपाल (मध्यप्रदेश)
-462003
दूरभाष : 0755-2765472
फोन : 09893072930
ईमेल : spandanbhopal@gmail.com
फेसबुक पेज :-https://www.facebook.com/pages/Desh-kathputliyon-ke-hath-mein/470271649770572

Monday, 21 July 2014

राजनीति की गांठें खोलती 'देश कठपुतलियों के हाथ में'


                                            






                      हां एक ओर दौड़-भाग भरी जिंदगी और तमाम इच्छाओं की त्वरित पूर्ति के लिए दिन-रात खपती युवा पीढ़ी के लिए साहित्य, समाज, देश और राजनीति के विषय में सोचना, लिखना, पढ़ना जैसे दूर की कौड़ी हो गया है। वहीं, ग्वालियर-चंबल की धरती पर जन्मे लोकेन्द्र सिंह राष्ट्र प्रेम की लौ अपने हृदय में शैशवकाल से जलाए आ रहे हैं, इसी की तड़प है कि वे कम उम्र में ही आज देश के प्रख्यात-ख्यातिलब्ध साहित्यकारों, पत्रकारों, ब्लॉगर्स की कतार में खड़े हो गए हैं।
   
पत्रकारिता की पाठशाला दैनिक स्वदेश, ग्वालियर से पत्रकारिता का क, ख, ग सीखने वाले लोकेन्द्र सिंह ने नईदुनिया, पत्रिका और  दैनिक भास्कर जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में लम्बे समय तक अपनी सेवाएं देकर पहचान बनाई। उनके समसामायिक विषयों पर आलेख, कविता, कहानी और यात्रा वृतांत देशभर के पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशित होते रहते हैं। इस युवा पत्रकार और साहित्यकार ने लेखन जगत में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी किताब 'देश कठपुतलियों के हाथ में' अभी हाल ही में प्रकाशित हुयी है।
   
सामाजिक, सांस्कृतिक, मीडिया और राजनैतिक मसलों पर लिखने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, चिंतक, विचारक और ख्यातिलब्ध पत्रकार लोकेन्द्र सिंह की यह प्रथम कृति पठनीय साबित हो रही है। 'देश कठपुतलियों के हाथ में' लेखक के चुनिंदा आलेखों का संग्रह है। लोकसभा निर्वाचन- 2014 के पूर्व की सामाजिक, राजनैतिक परिस्थियों की यथार्थता पर बेबाक टिप्पणियों से भरे-पूरे छयालीस आलेखों का संकलन स्वागत योग्य प्रयत्न है। लेखक ने वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य को बेहद सुंदर और भावपूर्ण अर्थ में समझाते हुए 'अपनी बात' में लिखा है कि ''राजनीति कोई स्वर्णरेखा नाला जैसी है'' (ग्वालियर शहर के बीचों-बीच से निकला हुआ सबसे बड़ा नाला, जो कभी स्वर्णरेखा नदी हुआ करता था।) नाम अच्छा लेकिन चरित्र खराब। ऐसा इसलिए क्योंकि समाज के खास तबके द्वारा राजनीति को गन्दा बताया जाता है।'
   
लेखक की कथा एवं भाषा शैली विचारोत्तेजक, प्रभावपूर्ण और आंदोलित करने वाली है। मुख्यत: आतंकवाद, भ्रष्टाचार, मौजूदा सियासत को आधार बनाकर रचित इस संग्रहणीय कृति में पाठक के मानस को झकझोरने वाली बातों का समावेश किया गया है। तमाम तथ्यों और तर्कों के आधार पर लिखी गईं प्रभावशाली बातें लेखक की विश्वसनीयता और उच्च बौद्धिकता की परिचायक हैं।
   
लेखक की चिंतन शैली इस कदर जबरदस्त है कि उन्होंने अपने एक लेख में पहले ही पूर्वानुमान लगा लिया था कि अगर भाजपा नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करती है तो संभावना है कि मोदी के प्रधानमंत्री पद की घोषणा होते ही नीतीश कुमार राजग (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) से नाता तोड़ लेंगे। उक्त बात महज़ कुछ दिनों के बाद अक्षरश: सत्य सिद्ध हुई। लेखक की वैचारिक गहराई और राष्ट्र प्रेम की जो तड़प हृदय से उपजी है, उसे लेखक ने अपने शब्दों के रूप में इस सारगर्भित कृति में उड़ेल दिया है।
   
      अमूमन देखने को आता है कि समसामयिक विषयों पर लिखे गए लेखों की उन्हीं दिवसों के लिए प्रांसगिकता होती है किन्तु 'देश कुठपु‍तलियों के हाथ में' पुस्तक को पढ़कर समझ में आता है कि इसमें संकलित लेख भविष्य के लिए ही लिखे गए हों। लेखक ने शायद इन्हें भारत के भविष्य के पाठकों के लिए ही लिखा हो। गोयाकि लेखक ने राजनीति के 'मोदी, मोदी और मोदी', 'इमेज सेट करने का खालिस षड्यंत्र', 'दामिनी कह गई-अब सोना नहीं', 'कुछ सवाल केजरीवाल से', 'तुष्टीकरण पर सुप्रीम कोर्ट की चोट', 'कांग्रेस को लगी मिर्ची' जैसे छयालीस लेखों में राजनीति के लगभग सभी पहलुओं को छुआ है, जिसमें सर्वप्रथम राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद की झलक स्पष्टत: परिलक्षित होती प्रतीत होती है किन्तु लेखक ने 'भाजपा के सेक्स लीडर' जैसे विचारोत्तेजक लेख लिखकर पुस्तक को किसी दल या विचारधारा विशेष का अभिनन्दन ग्रन्थ होने से बचा लिया है।
   
      तत्कालीन चर्चित विषयों पर लेखक ने अपने तरीके से विचार कर उसे तीखी अभिव्यक्ति प्रदान की है उनकी शैली में आकर्षण है। शीर्षकों में दृश्यात्मकता, सकारात्मकता, विश्लेषणात्मकता और काव्यात्मकता झलकती है। उनके शीर्षक पाठकों को पूरा लेख पढने को आमंत्रित करते हैं, यह भी कहा जा सकता है कि वे पढने को मजबूर करते हैं। चतुर्दिक जो परिदृश्य है, वो हताशा और निराशा को बढ़ाने वाले हैं। इनमें बदलाव आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। बात जब तथ्यों के आधार पर पूरे विश्लेषण के साथ रखी जाती है तो उसमें वजन होता है। इन लेखों की यही विशेषता है। राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्थाओं पर लेखक ने जमकर चोटें भी हैं। तटस्थ समीक्षक की दृष्टि से लेखन में राष्ट्रवाद की झलक दिखलाई पड़ती है। विषयों के चयन में विशेष दृष्टि रही है। जो विषयों की मौलिकता ला पाई है। वहीं, इसकी आवरण सज्जा ही मौन रूप से बहुत कुछ संदेश देती हुई प्रतीत होती है। तथ्यात्मक सधी हुई भावुकता जो तर्क संगत एवं वैचारिक विरलता लिए हुए है, पाठकों पर पर्याप्त प्रभाव डाल रही है।
   
अंत में, पथ भ्रष्ट राजनीति को पटरी पर लाने के लिए समाज की चेतना को जागृत कर उसे बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए चेताना ही साहित्यकार और पत्रकार का सर्वोपरि संकल्प होता है। इस दृष्टि से पुस्तक के सभी आलेख उम्दा सिद्ध हो रहे हैं। उम्मीद ही वरन् यकीन है कि पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' पाठकों के मानस पटल पर गहरा प्रभाव डालेगी, राजनीति को नजदीक से समझाने और उसके गंदे वातावरण से सचेत करने की दृष्टि से बेहद उपयोगी सिद्ध होगी। लेखक लोकेन्द्र सिंह को बधाईयां ! इस समय चर्चा का विषय बन चुकी पुस्तक के पाठकों के बीच पहुंचने के बाद उनकी भविष्य में आने वाली कृति और रचना की प्रतीक्षा रहेगी।

- नीरज चौधरी (समीक्षक युवा पत्रकार और लेखक हैं।


                             
पुस्तक : देश कठपुतलियों के हाथ में
लेखक : लाकेन्द्र  सिंह
संपर्क : lokendra777@gmail.com
मूल्य : 150 रुपये
प्रकाशक : स्पंदन 
ई-31, 45 बंगले, भोपाल (मध्यप्रदेश)
-462003
दूरभाष : 0755-2765472
फोन : 09893072930
ईमेल : spandanbhopal@gmail.com
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Thursday, 17 July 2014

अब न रहे वो नारे, जिनको लगाते थे दल सारे :-
************
  1. -इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं।
  2. -जली झोपड़ी भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल।
  3. -बेटा कार बनाता है, मां बेकार बनाती है।
  4. -एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर चिकमंगलूर।
  5. -स्वर्ग से नेहरू रहे पुकार, अबकी बिटिया जहियो हार।
  6. -आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को लाएंगे।
  7. -इंदिरा जी की बात पर मुहर लगेगी हाथ पर।
  8. -सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे।
  9. -जिसने कभी न झुकना सीखा, उसका नाम मुलायम है।
  10. -अबकी बारी अटल बिहारी।
  11. -जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा।
  12. -सोशलिस्टों ने बांधी गांठ पिछड़े पावैं सौ में साठ।

Wednesday, 16 July 2014

रोमांस कम, कॉमेडी ज़्यादा करती है 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया'
(नीरज चौधरी)

फिल्म :- हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया

निर्देशक :- 'शशांक खेतान'

निर्माता :- धर्मा प्रोडक्शन

कलाकार :- वरुण धवन, आलिया भट्ट, आशुतोष राणा, सिद्धार्थ शुक्ला, गौरव पांडेय, साहिल वैद व अन्य।


बॉक्स आॅफिस पर  44 करोड़ बटोर चुक‍ी 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' दर्शकों को अपनी तरफ खींचने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। धर्मा प्रोडक्शन के बैनर तले बनी 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' में अपनी कला का जौहर दिखा चुके नवोदित अदाकार वरुण धवन व अदाकारा आलिया भट्ट ने उसी बैनर तले शशांक खेतान के निर्देशन में अपने किरदारों को बखूबी जिया है। गुदगुदी, मार्डन रोमांस व थोड़ी सी ट्रेजडी का तड़का लगाने वाली इस फिल्म में दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे से इतर मार्डन रोमांस दिखा है।आखिर हो भी क्यों न, उसी प्रोडक्शन हाउस की निर्मित जो है और फिल्म का हीरो हम्प्टी शर्मा (वरुण धवन) डीडीएलजे के प्रति अपना प्रेम फिल्म की शुरूआत में ही जो प्रकट कर चुका होता है। फिल्म की कहानी डीडीएलजे का आधुनिक रूप लगती है। 


कहानी में दिल्ली निवासी राकेश शर्मा उर्फ हम्प्टी शर्मा अपने दो खुरापाती कूल डूड टाइप दोस्तों पपलू और शॉन्टी  के साथ कॉलेज लाइफ में इन्जॉय करता है। दूसरी आेर अंबाला की रहने वाली काव्या प्रताप सिंह जो फिल्म की अदाकारा है, मिस्टर सिंह (आशुतोष राणा) की लड़की है। काव्या अपने जिद्दी स्वभाव व घर में छोटे हाने का फायदा उठाते हुए अपनी मनमानी मांगे मनवती रहती है, इन्हीं दो महीनों के भीतर उसकी शादी है और वो अपनी सहेली गुरप्रती के देखी-देखा मंहगा लहंगा खरीदने दिल्ली अपने मामा के पास निकल पड़ती है,जहां घटना-दुर्घटनावश उसकी मुलाकात उसके मामा की हुज्जत-हिफाज़त करने आए हम्प्टी से होती है और वहीं से शरु होती है रोना, गाना, हंसना। शुरूआत में कहानी में बहुत गुदगुदी, रोमांस, कुछेक संवाद हैं लेकिन अंत तक आते-आते कथा ढीली पड़ जाती है। माडर्न डीडीएलजे की नकल में फिल्म कुछ नए संवादों (डायलॉग्स) , नई स्टोरी के बिना अधूरी रह जाती है ।

 हालाकि सीन बाकायदा नए हैं, केवल अंत में ट्रेन और रेलवे स्टेशन का सीन छोड़कर। वहीं, छोटे पर्दे से बड़े पर्दे पर पहली बार पदार्पण करने वाले  कलाकार  सिद्धार्थ शुक्ला फिल्म में काव्य के बहुप्रतीक्षित  एनआरआई दूल्हा को फिल्में जगह देते हुए भी जगह नहीं दी गई क्योंकि उनके रोल के मुताबिक स्टोरी दर्शकों को गच्चा दे जाती है। अंगद को कब लाकर हटा दिया जाता है, दर्शकों को इसका पता ही नहीं चलता। फिल्म के अंत में दुल्हन बनीं  अदाकारा काव्या (आलिया) डीडीलएजे का पूरा डायलॉग नहीं बोल पातीं, जिससे बारातियों व सिनेमा हॉल में बैठे दर्शकों में हंसी का फव्वारा छूट पड़ता है। यही कारण है रील लाइफ से इतर रियल लाइफ में कमसिन-क्यूटी आलिया भट्ट के  सोशल मीडिया में चुटकुले ट्रेंड हाने लगते है। 

कलाकार अंगद (सिद्धार्थ शुक्ला) के अलावा हम्प्टी के दोनों दोस्तों ने दर्शकों द्वारा बार-बार सराही जाने वाली बेहतरीन व उम्दा एक्टिंग की है। दो गानों को छोड़ दें तो फिल्म के शेष गानों में कोई रस नहीं है। 'मैं तेनु समझावां की' और 'सैटरडे-सैटरडे' इन दो गानों ने मूवी में जान डाल दी।  

 बहरहाल,  कुछ दिनों से सुस्त पड़े बॉक्स ऑफिस पर फिल्म 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' बड़ी कमाऊ और दिखाऊ साबित हो रही है। महज़ 29 करोड़ के बजट से बनी इस मूवी ने 6 दिन में 44 करोड़ बटोर लिए हैं। वीक ऑफ के दिनों में फिल्म के प्रशंसकों व दर्शकों की संख्या में इज़ाफा होने की जबरदस्त संभावना है। भटकती हुई अंत की कहानी को छोड़ दें तो फिल्म पैसा वसूल है। 

Tuesday, 8 July 2014


रेलवे गई पगारी में 



मुगलिया गई तगारी में, पेशवाई गई रगारी में, 
और सरकार (यहां ) रेलवे गई पगारी में।!
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ध्यप्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह की बहुचर्चित यह उक्ति भारतीय रेलवे पर सटीक बैठती है। इसका तात्पर्य यह है कि मुगलिया सल्तनत का ख़जाना किलों और महलों के निर्माण में खाली होता रहा, राग रंग ने पेशवाओं के ख़जाने को खाली कर दिया और अब की सरकारों या ''भारतीय रेलवे'' का खजाना पगार या पेंशन में खाली हो रहा है। ऐसे में रेलवे का विकास कैसे हो ? 


आज रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने बताया  कि 9 साल में 99 योजनाओं का एलान किया गया, लेकिन सिर्फ एक योजना पूरी हुई। चार परियोजनाएं 30 साल से लंबित हैं। कुल 359 परियोजनाएं लंबित हैं। इन्‍हें पूरा करने के लिए एक लाख 82 हजार करोड़ रुपए चाहिए। लेकिन, रेलवे को सौ रुपए में सिर्फ छह रुपए की बचत होती है।  सौ रुपए की आमदनी और 94 रुपया खर्च। वर्ष 2013-14 में सकल यातायात आमदनी 1,39,558 करोड़ रुपए हुई, जबकि कुल संचालन व्‍यय 1,30,321 करोड़ रुपए था। यानी केवल 6 फीसदी की बचत हुई।  मात्र चालू परियोजनाओं को पूरा करने के लिए ही पांच लाख करोड़ रुपए, यानी हर साल लगभग 50 हजार करोड़ रुपए चाहिए।


सरकारों को दोष देना यहां उचित नहीं है क्योंकि सरकार चाहे यूपीए की हो या एनडीए की, अफसरशाही वही रहती है और वे ही तय करते हैं भारत की धमनियों के संचालन को। धमनियां या नसें रेल की पटरियों या रेलों को इसलिए कह सकते हैं क‍ि इसी से तय होती है देश की दिशा व दशा।  इसी से जि़दा है देश। सरकारें एसी में, स्लीपर में तमाम सुविधाएं मुहैया करातीं हैं लेकिन सामान्य बोगी के बारे में बिल्कुल ग़ौर नही फरमातीं। जब दिल्ली से झांसी या दिल्ली से बेगूसराय की यात्रा किसी अफसर या नेता ने सामान्य बोगी में आम मुसाफिर बनकर कर ली तो शायद ही अपनी मंजि़ल पर पहुंचे।। ठसा-ठस भरी भीड़ और उसमें आने वाले वेंडर, चोर, उचक्के व छक्के जब मनमाफिक वसूली कर ले जाते हैं तो लगता है कि, शायद भारतीय रेलवे इनकी रखैल बन गई हो। दलाल जब आईआरसीटीसी की वेबसाइट अपने अंदाज़ में चलाते हैं तो भी लगता है शायद ये भी दामाद हैं।। आज अगर किसी को रेलवे में नौकरी पानी है तो उसे रेलवे की परीक्षा की तैयारी कराने वाले शिक्षकों से ज्यादा दलालों से संपर्क में रहना पड़ता है। इसका उदाहरण हम स्वयं देख चुके हैं कि भारतीय रेलवे भ्रष्टाचार की गंगा में गोते लगा रहा है क्योंकि जब पूर्व रेल मंत्री ही रिश्वतखोरी के इल्ज़ाम में इस्तीफा देता है तो सोच सकते हो रेलवे की दशा क्या है। रेलवे द्वारा यात्री किराए में बढ़ोत्तरी करने के बावजूद भी आज रेलवे की बहुत बुरी या कह सकते हैं पुराने समय से चली आ रही बेपटरी रेल व्यवस्था चालू है। रेलवे को चाहिए कि वो अपने लावारिस पड़ी बेशकीमती संपत्तियों को बेचकर मुनाफा कमाए, जिससे रेलवे के विकास कार्य हो सकें लेकिन इन सब बातों से उन्हें केवल अमीरों की जेब ढ़ीली करने में मज़ा आता है। रही बात जनरल की तो बकौल पूर्व मंत्री, 'वे भेड़-बकरियों के डिब्बे है।'
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रेलवे को जापान जैसे छोटे देश से प्रेरणा लेनी चाहिए कि पिछले 50 सालों से एक भी व्यक्ति रेल दुर्घटना में नहीं मारा गया।
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कई शोधों के बाद निष्कर्ष निकला है कि उपर्युक्त परेशानियों के लिए जिम्मेदार है भारतीय रेलवे का कुप्रबंधन ।
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Wednesday, 2 July 2014




न कुछ करेंगे आैर न सुधरेंगे

नीरज





*पेट्रोल-डीज़ल मंहगा* 


र के पास की चक्की पर जाएंगे तो बाइक से, बच्चों को घुम्मी कराएंगे तो बाइक से, हज़ामत बनवाने जाएंगे तो बाइक से, फर्राटे भरेंगे तो बाइक से, लांग ड्राइव जाएंगे तो कार से......।। न जाने कितने ग़ैरवाजि़ब काम करेंगे वो भी बाइक-कार से, जो पेट्रोल-डीज़ल से चलते हैं फिर कोसेंगे सरकारों को यूपीए ने सही शासन नहीं चलाया, भाजपा वाले अच्छे दिन नहीं ला रहे...।। अरे !! महानुभावों जो जिस साधन जिस काम के लिए बनाया गया है, उसका उसी हिसाब से इस्तेमाल करो फिर देखना चमत्कार।।

*खान-पान में मंहगाई*

नसंख्या का विस्फोट बदस्तूर जारी है, अस्पतालों में दिन-प्रतिदिन लाखों की संख्या में मनुष्य उत्पादन जोराें पर है, देशभर की उपजाऊ ज़मीनों पर विदेशी पैसों से रियल स्टेट जैसे विशालकाय दैत्य ने पैर पसार लिए हैं, ग्लोबल बार्मिंग के चलते ज़मीनों की उर्वरकता क्षमता कम हो रही है, रसायनिक बीजों ने पैदावार ज्यादा के चक्कर मिट्टी को कहीं का नहीं छोड़ा, छोटी-छोटी नदियां दम तोड़ती जा रही हैं, सालों से देश में बड़े बांध बन नहीं पा रहे हैं, मनरेगा की पैसे से बनने वाले स्टॉप डैम चंद दिनों बाद ढह जाते हैं......आदि आदि। अब कहते हैं कि मंहगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है। अरे, विचारवानों जब सब कारण जानते हो, फिर भी ऐसी हरकतों से जो प्रक्ति को नुकसान पहुंचाए, बाज नहीं आओगे तो कोई अर्थशास्त्री तो क्या स्वयं कौटिल्य या भगवान अवतार ले लें तो शायद ही कुछ कर पाएं।।

*अपराध की तो पूछो ही मत*

जकल दिन-ब-दिन क्राइम तो बढ़ता ही जा रहा है, आज पतली गली में करोड़ों की लूट हुई...., कल हैरान मोहल्ले में हाईटेक तस्कर -डकैतों ने लाखों उड़ाए...., परसों परेशान चौक पर दबंगों ने एक व्यापारी को घसीटकर मारा, जिससे दंगे भड़के........ आतंकवादी कम डकैत ज्यादा हाईटेक बंग्लादेशी गिरोह को दुखीगंज से गिरफ्त मे लिया.... ।। ने जाने कितनी क्राइम कांड देखने व सुनने को मिल रहे हैं, सरकार है कि कुछ करती नहीं।। हम नेता चुनते समय जातिवाद का पूरा ध्यान रखेेंगे, उसके चरित्र को यह कहकर साफ कर देंगे कि आजकल दूध का धुला कौन है, क्रिकेट की छोटी-सी बहस में भी खेल भावना का ध्यान न रखते हुए सांप्रदायिकता का पूरा ध्यान रखेंगे.....। अब ऐसी करामातों से अपराध का बोलबाला नहीं होगा तो क्या शांति का वातावरण बनेगा..।।

पान की दुकान पर खड़े होकर पान की पीक थूकते हुए सचिन तेंदुलकर के एक फैल्युअर पर उसे गाली देने वाले, बड़े-बड़े पढ़े-लिखे महानुभाव जो नेताओं के पूर्व में किए गए नकारात्क-बुरे कृत्येां को नज़रंदाज़ कर जातिवाद के हिसाब से उसे चुनने वाले, गली-नुक्कड़ पर खड़े होकर सरकार व अफसरशाही के रवैए को गालियां देकर माफ करने वाले जमूरे जब तक ख़द नहीं सुधरेंगे तब तक अगर देश तो मोहल्ला भी नहीं सुधर सकता..।। 


अंत में, अगर सब कुछ अच्छा होने लगा तो वेद-पुराणों के मुताबिक वो बुरा समय कब आएगा जब भगवान कल्कि कब अवतार लेंगे।। आख़िर, मुसलसल उक्त परेशानियों के बढ़ने से ही बुरे दिन दिनों की शुरूआत होगी.।।