रेलवे गई पगारी में
मुगलिया गई तगारी में, पेशवाई गई रगारी में,
और सरकार (यहां ) रेलवे गई पगारी में।!
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मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह की बहुचर्चित यह उक्ति भारतीय रेलवे पर सटीक बैठती है। इसका तात्पर्य यह है कि मुगलिया सल्तनत का ख़जाना किलों और महलों के निर्माण में खाली होता रहा, राग रंग ने पेशवाओं के ख़जाने को खाली कर दिया और अब की सरकारों या ''भारतीय रेलवे'' का खजाना पगार या पेंशन में खाली हो रहा है। ऐसे में रेलवे का विकास कैसे हो ?
आज रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने बताया कि 9 साल में 99 योजनाओं का एलान किया गया, लेकिन सिर्फ एक योजना पूरी हुई। चार परियोजनाएं 30 साल से लंबित हैं। कुल 359 परियोजनाएं लंबित हैं। इन्हें पूरा करने के लिए एक लाख 82 हजार करोड़ रुपए चाहिए। लेकिन, रेलवे को सौ रुपए में सिर्फ छह रुपए की बचत होती है। सौ रुपए की आमदनी और 94 रुपया खर्च। वर्ष 2013-14 में सकल यातायात आमदनी 1,39,558 करोड़ रुपए हुई, जबकि कुल संचालन व्यय 1,30,321 करोड़ रुपए था। यानी केवल 6 फीसदी की बचत हुई। मात्र चालू परियोजनाओं को पूरा करने के लिए ही पांच लाख करोड़ रुपए, यानी हर साल लगभग 50 हजार करोड़ रुपए चाहिए।
सरकारों को दोष देना यहां उचित नहीं है क्योंकि सरकार चाहे यूपीए की हो या एनडीए की, अफसरशाही वही रहती है और वे ही तय करते हैं भारत की धमनियों के संचालन को। धमनियां या नसें रेल की पटरियों या रेलों को इसलिए कह सकते हैं कि इसी से तय होती है देश की दिशा व दशा। इसी से जि़दा है देश। सरकारें एसी में, स्लीपर में तमाम सुविधाएं मुहैया करातीं हैं लेकिन सामान्य बोगी के बारे में बिल्कुल ग़ौर नही फरमातीं। जब दिल्ली से झांसी या दिल्ली से बेगूसराय की यात्रा किसी अफसर या नेता ने सामान्य बोगी में आम मुसाफिर बनकर कर ली तो शायद ही अपनी मंजि़ल पर पहुंचे।। ठसा-ठस भरी भीड़ और उसमें आने वाले वेंडर, चोर, उचक्के व छक्के जब मनमाफिक वसूली कर ले जाते हैं तो लगता है कि, शायद भारतीय रेलवे इनकी रखैल बन गई हो। दलाल जब आईआरसीटीसी की वेबसाइट अपने अंदाज़ में चलाते हैं तो भी लगता है शायद ये भी दामाद हैं।। आज अगर किसी को रेलवे में नौकरी पानी है तो उसे रेलवे की परीक्षा की तैयारी कराने वाले शिक्षकों से ज्यादा दलालों से संपर्क में रहना पड़ता है। इसका उदाहरण हम स्वयं देख चुके हैं कि भारतीय रेलवे भ्रष्टाचार की गंगा में गोते लगा रहा है क्योंकि जब पूर्व रेल मंत्री ही रिश्वतखोरी के इल्ज़ाम में इस्तीफा देता है तो सोच सकते हो रेलवे की दशा क्या है। रेलवे द्वारा यात्री किराए में बढ़ोत्तरी करने के बावजूद भी आज रेलवे की बहुत बुरी या कह सकते हैं पुराने समय से चली आ रही बेपटरी रेल व्यवस्था चालू है। रेलवे को चाहिए कि वो अपने लावारिस पड़ी बेशकीमती संपत्तियों को बेचकर मुनाफा कमाए, जिससे रेलवे के विकास कार्य हो सकें लेकिन इन सब बातों से उन्हें केवल अमीरों की जेब ढ़ीली करने में मज़ा आता है। रही बात जनरल की तो बकौल पूर्व मंत्री, 'वे भेड़-बकरियों के डिब्बे है।'
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रेलवे को जापान जैसे छोटे देश से प्रेरणा लेनी चाहिए कि पिछले 50 सालों से एक भी व्यक्ति रेल दुर्घटना में नहीं मारा गया।
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कई शोधों के बाद निष्कर्ष निकला है कि उपर्युक्त परेशानियों के लिए जिम्मेदार है भारतीय रेलवे का कुप्रबंधन ।
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