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Wednesday, 19 November 2014

‘किल-दिल’ ने नहीं किया दिल को किल


                                                                  नीरज चौधरी



फ़िल्म: किल दिल

निर्देशक: शाद अली

कलाकार: रणवीर सिंह, गोविंदा, अली ज़फ़र, परिणीति चोपड़ा

निर्माता :- यश राज फिल्मस्

                                                                       



सात दिनों पहले ही सिनेमा के पर्दे पर उतरी फिल्म ‘किल-दिल’ दर्शकों के दिल को किल नहीं सकी। ‘कोईमोई’ वेबसाइट के अनुसार, 55 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म ने बुधवार तक करीब 24 करोड़ रुपए का धीमा करोबार कर लिया है। फिल्म की कहानी भले ही कमजोर है, लेकिन फिल्म के नायक रणवीर सिंह (देव) ने अपने किरदार में जान डाली है, लेकिन अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा (दिशा)और अली जफर (टूटू)खासा प्रभाव नहीं छोड़ पाए। हालांकि गोविंदा (भाईजी)ने अपने पुराने किरदारों के विपरीत खलनायक का किरदार निभाया है, जिसमें उनकी एक्टिंग को दर्शक जगत पचा नहीं पाया। फिल्म दर्शकों को  फिल्म कहानी शुरूआत में दर्शकों काफी गुदगुदाते हुए आगे बढ़ती है। खलनायक भाईजी का वह डायलॉग जिसमें वे कहते हैं कि, ‘लौंडिया में नखरे और मुंगफली में छिलके न होते, तो जिंदगी बड़े आराम से कटती’, और देव (रणवीर सिंह)का एक संवाद जिसमें वे फिल्म के एक पात्र को धमकाते हुए कहता हैं कि ‘हम तब से गन चला रहे हैं.. जब से तू अपनी मां के अंदर नहीं, अपने बाप के अंदर था।’ दर्शकों को सीट से हंसी के मारे उछलने को मजबूर कर देता है। 

बंटी और बबली’ और ‘झूम बराबर झूम’ जैसी फिल्में दे चुके शाद अली के निर्देशन में बनी यह फिल्म उनकी पुरानी फिल्मों की तरह ही उत्तर भारत के माहौल को बयां कर रहीं हैं।  फिल्म की कहानी को देखें तो इसमें भईयाजी(गोविंदा) नाम के आदतन अपराधी को दो लावारिश बच्चे (रणवीर सिंह और अली जफर) कचरे के ढेर में मिलते हैं। जिनकी परवरिश खून-खराबे और गोली के शारे-शराबे के बीच की जाती है और उनकों नाम दिया जाता है - देव (रणवीर)और अली जफर (टूटू)। देव और टूटू को भईयाजी परिपक्व हिस्ट्रीशीटर बना देते हैं, जो भईयाजी के कारिंदे के रूप में भाड़े पर मर्डर और लूट जैसी वारदातों को अंजाम देते हैं। इनकी मुलाकात एक अमीर समाजसेविका दिशा(परिणीति चौपड़ा)से होती है, जिसको देव से प्यार हो जाता है । फिल्म के पात्र देव और दिशा में चुहलबाजी का दौर रहता चलता रहता है, लेकिन दिशा को देव के बैकग्राउंड के बारे में पता नहीं होता है। और उसके इस प्यार की भनक भईयाजी को लग जाती है, तो वे अपनी शातिर चाल से दिशा को देव के बैकग्राउंड प्रोफेशन के बारे में पता लगवा देते हैं क्योंकि भईयाजी देव को अपनी गैंग से दूर नहीं जाने देना चाहते थे। शाद अली पटकथा में आसान रास्ते चुनते हैं। रणवीर सिंह की स्वाभाविक ऊर्जा का सही इस्तेमाल नहीं हो पाया है।  पहली बार खलनायक का किरदार निभा रहे गोविंदा ने अपने किरदार को समझा और सही ढंग से पेश जरूर किया है, किन्तु दर्शक उनको इस पात्र में पचा नहीं पाए। अगर वे कम नाचते और गाते तो अधिक प्रभावशाली लगते। पाकिस्तान से आए कलाकार अली जफर रणवीर सिंह को बराबरी का साथ नहीं दे पाए हैं। किलर की भूमिका में वे कमजोर हैं। बॉडी लैंग्वेज और आवाज में रफनेस लाने की उन्होंने कोशिश जरूर की है, लेकिन बात बनी नहीं है। परिणीति चोपड़ा दिशा के किरदार में नहीं ढल सकी हैं। फिल्म के गानों की बात करें तो गाने ऑडियेंश के दिल को किल नहीं कर पाए, हालांकि फिल्म का एंडिग सोंग जरूर अपना स्वर व शब्दों का प्रभाव छोड़ता है।

                                                                                      


फिल्म का संदेश एक संवाद में नायक देव दे ही देते हैं, बकौल देव (रणवीर),-‘बच्चा पैदा कहीं भी हो, बनता वैसा ही है..जहां बड़ा होता है।’ इसी बात को भारतीय समाज में बताया जाता है कि मनुष्य के स्वभाव और सोच पर परवरिश और संगत का असर होता है। जन्म से कोई अच्छा-बुरा नहीं होता। शायद इसी धारणा को फिल्म रूपहले पर्दे पर व्यक्त करती नजर आती है।  एक वाक्य में समीक्षा की जाए तो, ‘किल-दिल’ फिल्म अंत तक दर्शकों को सीट पर बैठे रहने को मजबूर कर देती है।

Tuesday, 7 October 2014

अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे



भोर होते ही पंछियों का मधुर कलरव किसी लयबद्ध संगीत के सुरों सा वातावरण में मिठास घोल रहा था। शहर से सटे उस गंवई इलाके के एक छोटे से शांत मोहल्ले में राधेश्याम बाबू और उनकी पत्नी सुनीता रोजाना की तरह आज भी जल्दी उठकर अपने काम-काज निपटाने में लगे थे। सुनीता गाय-भैंस की सेवा व मेवा से छुटकारा पाते ही छुटकू को स्कूल के लिए जल्दी-पल्दी तैयार करने लगी क्योंकि स्कूल की बस वाला पांच मिनिट भी इंतजार नहीं करता। काम के बोझ से दबी सुनीता मशीन की तरह काम में लगी है.. और पतिदेव हैं कि चायपीते-पीते अख़बार के शाब्दिक सागर में डूबे हैं। पति राधेश्याम बाबू का ध्यान खींचते हुए सुनीता,-''सुनिए, छुटकू की बस निकल जाएगी...मैं इसे छोड़कर आती हूं। ऐसा करना दूध गरम करने रख दो और आज ज़रा आंगन में झाडू भी लगा देना ।'' राधेश्याम बाबू अपने ही जिले में कलेक्टर के निजी सचिव हैं, और गांव में ही रहते हैं। गांव में रहने का कारण है कि शहर से ही सटा हुआ है और कलेक्टर के पीए होने के नाते ग्रामीण उन्हें ही कलेक्टर मानते हैं। रुतबा ऐसा कि अच्छे-अच्छे पानी भरें। पत्नी सुनीता के ऊंचे आर्डर सुनते ही राधे बाबू-''बोलने से पहले सोच लिया कर, इतना भी काम नाय ..जितना तू दिखा रही। तू सोच ज़रा मुझे कोई झाडू लगाते देख लेवे न, तो मेरी तो धुल गई। हमसे न होय ऐसे जनाने काम।...छुटकू को छोड़ के आ..और जो करना है, सो कर।। '' इतना सुनते ही सुनीता बुरे से मन से साड़ी का पल्ला लेकर छुटकू को बस में बिठाने चल दी..वापस आकर काम-धाम निपटाने लगी क्योंकि पति देव को कार्यालय जो जाना था। पता ही नहीं चला कि दिन के 1 बज गए। छुटकू भी अन्य बच्चों के साथ फुदकता हुआ घर आ पहुंचा और बैग, कपड़े, जूते कमरे की चारों दिशाओं में उड़ाते हुए फेंक दिए। फिर क्या..रोज़ाना की तरह लग गया मां के सीने से। बड़ा ही लाड़-प्यार करते हुए मां उसको टीवी पर कार्टून दिखाने के बहाने बड़ी ही न-नुकुर के बाद खाना खिलाने लगी....कि एकाएक चैनल बदला..न्यूज़ लग गई और छुटकू एकदम से,-''मां...मां..देखो पापा...मां देखो पापा'' अपनी उंगली टीवी की तरफ देखकर कहने लगा, कुछ सोचने में व्यस्त सुनीता को लगा कि छुटकू की आदत है। टीवी में वो किसी भी मर्द को देखकर पापा..पापा कहने लगता है। लेकिन जब सुनीता ने भी देखा तो पाया कि राधेश्याम बाबू कलेक्टर महोदय के साथ-साथ ''सफाई अभियान'' के तहत खूब मुस्कुराते ही झाडू मारे जा रहे हैं..। यह देख बच्चे की मां सुनीता मंद-मंद मुस्काई जा रही है...और काम की मशीन का मन तो कर रहा है कि पतिदेव के घर आते ही उनके लत्ते-पत्ते ले लूं, लेकिन वो उस ना समझ नन्हें छुटकू से ही बातें कह-कहकर भड़ास निकाल रही है-''देख..बेटा, अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे।।'' पर छुटकू अपने पापा को नज़दीक देखकर बहुत ही उछल रहा है......।

पटना में भगदड़



पटना में भगदड़...चित्रकूट में भगदड़....इलाहाबाद में भगदड़...यहां भगदड़..वहां भगदड़। कौन कराता है ये भगदड़ ? कैसे होती है ये भगदड़ ? भगदड़ से हमारी सल्तनतें क्या सबक लेतीं हैं ? आज तक कितने भगदड़ कराने वालों..अफवाह फैलाने वालों काे हिरासत में लिया गया ? ..न जाने कितने ही सवाल इन ख़बरों को सुनने वाली आवाम के जेहन में उठते होंगे..लेकिन सियासतदां अपनी चतुर चालें चलकर मामले का ठंडा करने में माहिर जो है। पटना में घटी घटना के बाद चहुं ओर रुदन, क्रंदन, हाहाकार..सुनाई दे रहा है......।


बुरा करने के लिए लिए जगत में कुख्यात वो मनहूस रावण, आज अपने साथ न जाने कितनों को ले जा रहा है। अब रावण को ही दोष देना सही होगा, क्योंकि पटना में सरकार तो ठेके पर चल रही है। प्रशासन धोके पर चल रहा है। इस समय तो लग रहा है..वहां किसी का किसी पर कंट्रोल ही नहीं बचा। अब सुनिए न इन तमाम रविशंकर प्रसादों..पासवानों...समेत दिग्गज कहलाने वालों की। इसमें में भी ये माननीय थोड़ा-बहुत सियासत का तड़का लगाने से नहीं चूके।

प्रसाद कह रहे हैं-'' यह न केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण और अफसोसजनक घटना है बल्कि शर्मनाक भी है. हर साल गांधी मैदान में दशहरा समारोह का आयोजन किया जाता है. इसके बावजूद कोई उचित प्रबंध नहीं किए गए...हाल ही में वहां छठ पूजा के दौरान हादसा हुआ था. पिछले वर्ष अक्तूबर में नरेन्द्र मोदी की रैली के दौरान घटना हुई थी.’’ वहीं, केन्द्रीय मंत्री पासवान भी यही राग अलाप रहे हैं। ख़ैर ये तो इतना भी बोल रहे हैं लेकिन बिहार सरकार तो लगता है जु़र्म करके फरारी काटने चली गई है। वहां तो कोई कुछ बोल ही नहीं रहा। मंत्रियों के फोन बंद...कान बंद..। अब भला रात में भी क्या करेंगे वो आकर। जिन्हें जाना था.. वो चले गए..। जिन्हें मरने वालों की बिछड़न में रोना हैं..वे रो रहे हैं..। अब सब मामला सुबह ही देखा जाएगा..।
वो तो भला हो इस मुल्क़ के निज़ाम का, जिसने आधी रात को ही सूबे की सरकार से पहले काल के गाल में समा गए लोगो के परिवारों को मुआवज़ा रूपी मरहम लगा दी.. और करते भी तो क्या...उनका तो यही फर्ज़ बनता है।
अब फिर वहीं पुराना राग शुरू होगा..जो हर बार होता है..। सूबे से घटना की रिपोर्ट मांगी जाएगी...फिर किसी को बलि का बकरा बनाया जाएगा...फिर वोटों की गाेटियां बिठाई जाएंगी। सत्ता के साधकों के द्वारा इस मामले को फिर ''चर्चा करके, चिंता करके..चलता'' करने में देर नहीं की जाएगी। करें भी तो क्या ?? पुरानी आदत जो पड़ गई है।
आगे की कार्रवाही भी जान लीजिए..। जहां घटना हुई वहां का करोडा़ें का दौरा होगा..उड़नखटोले उतरेंगे..हैलीपैड बनेंगे...फोटोग्राफी होगी...ज़रा सी सियासत भी होगी। फिर आगे की सुनिए ...। एंबेसडर गाडि़यों के आगे-पीछे हमारे अफसरान दौड़ेंगे...गुफ्तगू होगी..एक-दूसरे निज़ामों को दोषी ठहराने की फाइलें तैयार होंगी.. और फिर तैयार हाेगा दुर्घटनास्थल की दुरूस्त व्यवस्था के लिए भारी -भरकम पैकेज...जिससे कभी उस जगह ऐसी घटना न घट सके। ..जिसमें सबका सार निहित है।.. फिर जैसा कि आप सब को पता है....

''चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग'' को हर वर्ग ने सराहा







लब्धप्रतिष्ठित पत्रकार व एबीपी न्यूज़ मध्यप्रदेश के ब्यूरो प्रमुख श्री ब्रजेश राजपूत की किताब (Chunav, rajneeti aur reporting) मीडिया के विद्यार्थियों, राजनीतिक विचारकों, विश्लेषकों के लिए यह पुस्तक एक उपयोगी दस्तावेज दस्तावेज़ बन गई है। बेहद सरल और सहज भाषा शैली में लिखी गई इस चर्चित ''चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग'' पुस्तक की समीक्षा को प्रदेश की नवोदित पत्रिका ''प्रदेश संवाददाता'' ने अपने सितंबर माह के अंक में जगह दी है।

ख़ास बात यह है कि जल्द ही इस पुस्तक का दूसरा संस्करण भी बाज़ार में आने वाला है। हर पाठक वर्ग में सराहे जाने वाली इस पुस्तक की समीक्षा इस नाचीज़ ने लिखी है।  

पांच रुपए का घी


नीरज

स दोपहर धूप में वो कड़कपन नहीं बचा था। पितृपक्षों का आखिरी दिन था। बाज़ार में चहल-पहल काफी थी। पकवानों की खुशबू उस कस्बाई इलाके के घरों से बिना पूछे नथुनों में समा रही थी। क़रीब 3 बजे का समय होगा, मैं उस कस्बाई इलाके की प्रसिद्ध किराना दुकान पर कुछ सामान लेने पहुंचा। सेठ जी नौकरों को हमेशा की तरह अपनी सेठगिरी दिखा रहे थे। मैंने सामान का पर्चा सेठजी के हाथ में थमाया कि, अचानक एक छोटी- सी बच्ची मटमैले से कपड़ों में फुदकती हुई वहां आ पहुंची, और तपाक से दुकानदार से बोली,-''अंकल, पांच रुपए का घी देना।'' सेठ अपने मोटापे के आधार पर पूरी ताक़त से साथ उस बच्ची को दुत्कारते हुए,-''तुम्हारे बाप ने खाया पांच रुपए घी, चल जा।'' धूप में तो कड़कपन नहीं था पर उस सेठ की बातों में ज़रूर था। रावण की तरह अट्टाहास करते हुए बोला-'' पांच रुपए में घी तो क्या घी की खुशबू भी न मिले ।'' सेठ के दुत्कारते ही उस बच्ची की न जाने कितनी उम्मीदें टूट चुकीं थी।

घर से फुदकते हुए पांच रुपए का घी लेने निकली उस भोली-सी सूरत वाली अभागी के सारे सपने मानों छन्न से टूट गए थे। दुकान की देहरी पर थम-सी गई थी। दुकान की तरफ पीठ करके मिर्ची के बारे के पास में खड़ी ढंग से रो भी नहीं पा रही थी। आंखों में आंसू ज़रूर भर लिए थे उसने। घर में न जाने क्या-क्या बोल कर आई होगी वो.. भाई-बहिनों को ''पांच रुपए के घी '' से बने न जाने क्या-क्या पकवान परोसने वाली होगी वो ..! पर कर भी क्या सकती थी..रुंआसी आंखों से ज़मीन की ओर देखती हुई रास्ते में पड़े कंकड़-पत्थरों को चप्पल से ठोकर मारती हुई चल दी अपने छोटे-से आशियाने की ओर.....। पता नहीं वहां तक पहुंची कि नहीं.....।



Wednesday, 10 September 2014

आसाधारण मैरी कॉम की अद्वितीय फिल्म


हम अगर किसी अपने के साथ नदी में नहाने जाएं और डुबकी लेते वक़्त वही हमारा सिर पकड़कर बड़ी ताक़त से बहुत देर तक पानी में डुबाए रखे, तो उस समय बाहर निकलने की जो तड़प होती है न, वही दुनिया की महान बॉक्सर बनने के लिए मैरी कॉम में उनकी बायोपिक फिल्म में देखने को मिली...। इसी तड़प, लगन, उत्साह, मेहनत का सुफल मैरी कॉम को एक जीवन आधरित बॉलीबुड फिल्म व उससे बड़ा कहें तो दनियाभर से मिले पुरस्कारों के रूप में मिला है। 

फिल्म का वो दृश्य जिसमें मैरी जब बॉक्सिंग सीखने के लिए प्रशिक्षक (सुनील थापा) के पास जाती है तो वह पूछता है कि पांच कारण बताओ कि तुम बॉक्सिंग क्यों सीखना चाहती हो? वह जबाव में चार बार ''आई लव बॉक्सिंग'' कहते हुए पूछती है,- पांचवां कारण भी बताना जरूरी है क्या ? कोच सर ने मैरी को रोज-रोज बुला-बुला कर उसकी तड़प का परीक्षण किया उसके बाद उसे ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं। मैरी कॉम फिल्म ने अब तक की अनेक महान नायक-नायिकाओं पर बनीं बायोपिक फिल्मों में ऊंचे स्थान पर जगह बना ली है। 

                                                    


भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले ओमंग कुमार के निर्देशन में बनी मैरी कॉम फिल्म अन्य फिल्मों की तरह व्यर्थ की मिर्च- मासाले भरी सामग्री से दूर एक सधी हुई फिल्म है। फिल्म में ख्यात बॉक्सर मैरी कॉम के पात्र को अदाकारा प्रियंका चोपड़ा ने बखूबी जिया है। प्रियंका द्वारा निभाए गए किरदारों से पता चलता है कि मैरी कॉम एक शरीर होते हुए वो बेटी भी है, मां भी है, बहू भी है, पत्नी भी है और एक सफल बॉक्सर भी है। शादी के पहले और शादी के बाद भी। इस चर्चित फिल्म में प्रियंका द्वारा की गई कुशल अदाकारी के लिए उन्हें आजीवन याद किया जाता रहेगा। धांसू स्क्रीनप्ले, संवाद अदायगी व उम्दा गीतों को देख-सुनकर दशकों में एक अज़ीब उत्साह, उमंग, जुनून पैदा किया। मैरी कॉम के पति ऑनलर के किरदार को ख्यात कलाकार दर्शन कुमार ने बेहतरीन ढंग से निभाया है। ऑनलर (दर्शन कुमार) ने एक अच्छे पति की परिभाषा इस चलचित्र के माध्यम से स्पष्ट की है कि किस तरह विषम परिस्थितियों में पति ने मैरी को आगे बढ़ने की ओर प्रोत्साहित किया।

...और हां, फिल्म के शुरूआती क्षणों में हट्टे-कट्टे सौष्ठव शरीर वाले ''लाल'' सांड को देखकर गांव के उन नौजवान पहलवानों की याद आ जाती है जो ताक़त का प्रदर्शन करने के लिए पार्ट टाइम दंगलों में खूब लड़ा करते हैं व समय आने पर ग़लत कार्यों को भी अंज़ाम देते हैं लेकिन देश के लिए उनसे कभी नहीं लड़ा जाता।।
सही मायानों में कहा जाए तो मणिपुर राज्य के कांगथेई गांव की पगडंडियों की पथरीली व कटीली राहों का रास्ता तय करके सात समंदर पार से पांच दफा स्वर्ण मैडल वाली विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली Mangte Chungneijang Mary Kom (MC Mary Kom) के जीवन पर आधरित फिल्म देश-दुनिया के नवोदित बॉक्सरों - खिलाडियों व कुछ बनने की चाहत रखने वाले नागरिकों को एक संदेश देती है। .....शायद ही कोई ऐसा दर्शक हो जो फिल्म को छविगृह से अपने साथ दिलो-दिमाग में बसाकर घर तक न ले गया हो...हालाकि इस फिल्म में ''मुन्नी बदनाम'' नहीं हुई और ''शीला जवान'' नहीं हुई, इसीलिए हो सकता है कि मजनू संप्रदाय को ये फिल्म पसंद न आए....पर फिल्म पैसा वसूल है ।।


फिल्म का वो दृश्य जिसमें मैरी जब बॉक्सिंग सीखने के लिए प्रशिक्षक (सुनील थापा) के पास जाती है तो वह पूछता है कि पांच कारण बताओ कि तुम बॉक्सिंग क्यों सीखना चाहती हो? वह जबाव में चार बार ''आई लव बॉक्सिंग'' कहते हुए पूछती है,- पांचवां कारण भी बताना जरूरी है क्या ? कोच सर ने मैरी को रोज-रोज बुला-बुला कर उसकी तड़प का परीक्षण किया उसके बाद उसे ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं। मैरी कॉम फिल्म ने अब तक की अनेक महान नायक-नायिकाओं पर बनीं बायोपिक फिल्मों में ऊंचे स्थान पर जगह बना ली है।

भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले ओमंग कुमार के निर्देशन में बनी मैरी कॉम फिल्म अन्य फिल्मों की तरह व्यर्थ की मिर्च- मासाले भरी सामग्री से दूर एक सधी हुई फिल्म है। फिल्म में ख्यात बॉक्सर मैरी कॉम के पात्र को अदाकारा प्रियंका चोपड़ा ने बखूबी जिया है। प्रियंका द्वारा निभाए गए किरदारों से पता चलता है कि मैरी कॉम एक शरीर होते हुए वो बेटी भी है, मां भी है, बहू भी है, पत्नी भी है और एक सफल बॉक्सर भी है। शादी के पहले और शादी के बाद भी। इस चर्चित फिल्म में प्रियंका द्वारा की गई कुशल अदाकारी के लिए उन्हें आजीवन याद किया जाता रहेगा। धांसू स्क्रीनप्ले, संवाद अदायगी व उम्दा गीतों को देख-सुनकर दशकों में एक अज़ीब उत्साह, उमंग, जुनून पैदा किया। मैरी कॉम के पति ऑनलर के किरदार को ख्यात कलाकार दर्शन कुमार ने बेहतरीन ढंग से निभाया है।

...और हां, फिल्म के शुरूआती क्षणों में हट्टे-कट्टे सौष्ठव शरीर वाले ''लाल'' सांड को देखकर गांव के उन नौजवान पहलवानों की याद आ जाती है जो ताक़त का प्रदर्शन करने के लिए पार्ट टाइम दंगलों में खूब लड़ा करते हैं व समय आने पर ग़लत कार्यों को भी अंज़ाम देते हैं लेकिन देश के लिए उनसे कभी नहीं लड़ा जाता।।

सही मायानों में कहा जाए तो मणिपुर राज्य के कांगथेई गांव की पगडंडियों की पथरीली व कटीली राहों का रास्ता तय करके सात समंदर पार से पांच दफा स्वर्ण मैडल वाली विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली Mangte Chungneijang Mary Kom (MC Mary Kom) के जीवन पर आधरित फिल्म देश-दुनिया के नवोदित बॉक्सरों - खिलाडियों व कुछ बनने की चाहत रखने वाले नागरिकों को एक संदेश देती है। .....शायद ही कोई ऐसा दर्शक हो जो फिल्म को छविगृह से अपने साथ दिलो-दिमाग में बसाकर घर तक न ले गया हो...हालाकि इस फिल्म में ''मुन्नी बदनाम'' नहीं हुई और ''शीला जवान'' नहीं हुई, इसीलिए हो सकता है कि मजनू संप्रदाय को ये फिल्म पसंद न आए....पर फिल्म पैसा वसूल है ।।


- नीरज

फिल्म की स्टोरी


फिल्म की मुख्य किरदार मैरी कॉम भारत के उस हिस्से की रहने वाली है। जहां आजादी के वर्षों बाद भी लोगों को यह बताना पड़ता है कि वे भारतीय हैं। मैरी कॉम ने एक ऐसा खेल चुना है जिसमें पुरुषों का दबदबा है। भारत में बॉक्सिंग में महिला खिलाड़ी ढूंढे नहीं मिलती हैं। मैरी कॉम के परिवार की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि उन्हें तमाम सुविधाएं मिलती। मैरी के पिता इस खेल के खिलाफ थे। मैरी कॉम को अपने स्तर पर इस खेल में काफी संघर्ष करना पड़ा। फेडरेशन मुक्केबाजों को डाइट में एक केला और चाय दिया जाता है। मैरी अपनी पहली फाइट भूखे पेट लड़ती है। उनका कोच पूछता है कि क्या वह लड़ लेगी तो वह कहती है कि सर, खुशी से ही पेट भर गया। तमाम बाधाओं को पार करते हुए मैरी ने विश्व चैम्पियन का खिताब एक-दो बार नहीं बल्कि पूरे पांच बार अपने नाम किया।   


मैरी का संघर्ष दोहरा है। पहला तो वे तमाम बाधाओं को पार कर विश्व चैम्पियन बनती है। इसके बाद शादी करती है और दो बच्चों की मां बनती है। भारत में एक क्रिकेट खिलाड़ी आईपीएल के कुछ मैच खेल कर ही करोड़पति बन जाता है, लेकिन मैरी कॉम तीन बार विश्व विजेता बनने के बावजूद परिवार के बढ़ते खर्च को लेकर चिंतित हो जाती है। वह नौकरी करने का फैसला करती है तो सरकार उन्हें हवलदार की नौकरी देती है जिसे वे ठुकरा देती है। मैरी को कोई पहचानता नहीं है जिसका उन्हें बुरा लगता है। विश्व विजेता खिलाड़ी को फेडरेशन का अदना ऑफिसर ऑफिस के बाहर घंटों इंतजार करवाता है।

मैरी कॉम की वापसी को लेकर रूकावटें खड़ी की जाती हैं। उनसे माफीनामा मांगा जाता है। एक चैम्पियन खिलाड़ी के लिए यह सब अपमानजक है, लेकिन खेल के प्रति प्रेम के चलते मैरी कॉम यह सब सहन करती है और फिर बॉक्सिंग रिंग में उतरती है। और फिर विश्व चैम्पियन का खिताब अपने नाम करती हैं। फिल्म के क्लाइमैक्स में दिखाया गया है कि जब मैरी कॉम विश्व कप फाइनल का मैच खेल रही होती है तब उनके बच्चे के दिल का ऑपरेशन चल रहा होता है। पता नहीं यह हकीकत है या फसाना, लेकिन अगर यह सच है तो इससे बड़ा आश्चर्यजनक बात और नहीं हो सकती है कि वह इतने बड़े दर्द को दिल में बिठाकर मैच खेलती हैं और जीतती भी है। ये सारे प्रसंग दर्शक को बांधकर रखते हैं।



(: फिल्म की स्टोरी साभार)

Saturday, 6 September 2014

अपराधबोध से घिरा आकाश


नीरज


श्रेयांश.....यस सर। गौरव ......प्रजेंट सर। हेमेन्द्र ......जी सर। कॉलेज की कक्षा में प्रवेश करते ही प्रोफेसर गुरुदत्त राम सबसे पहले छात्र-छात्रओं की हाजि़री लगाते थे। रोज़ाना की तरह इस दिन भी हाजि़री लगा रहे प्रोफेसर ने रीना कुमारी का नाम बोला..लेकिन कोई जबाव नहीं आया। क़लम को रोकते हुए सिर को ऊपर उठाकर प्रोफेसर महोदय ने प्रथम बैंच पर बैठे नियमित रहने वाले आकाश की ओर देखकर पूछा, -'आज रीना नहीं आई।' 'वो तो सर हमेशा क्लास के लास्ट टाइम में आती है ताकि आपकी क्लास की अटेंडेंस भी हो जाए और शुरू होने वाली क्लास की भी', आकाश ने तपाक से जबाव दिया। इतना सुनते ही गुरूदत्त जी ने तत्काल प्रभाव से रीना कुमारी की अनुपस्थिति दर्शा दी। हाजि़री पूरी होते ही प्रोफेसर ने रजिस्टर को एक तरफ रख कल का शेष टॉपिक पढ़ाना शुरू कर दिया। सर भले ही पढ़ा रहे थे लेकिन आकाश का मन ही मन फूला नहीं समा रहा था क्योंकि आज उसने अप्रत्यक्ष रूप से रीना से बदला जो ले लिया। हमेशा रीना के चिढैल स्वभाव, अपमान और उसके विरुद्ध कुछ न कर पाने की बेबसी हमेशा कुंठित कर देती थी आकाश को। स्कूल लाइफ से कॉलेज तक उसको चाहता रहा पर संसकारवानों की अम्मा ने आज उसे भाव न दिया। .....

इतने में हुआ वही, अचानक से क्लास के अंत में इक्कीस वर्षीय रीना कॉपी-किताबें दिल से चिपकाएं हौले-हौले से संकोची स्वभाव का आभामंडल बनाए डरावने अंदाज़ में कक्षा के दरवाजे पर ''मे आई कम इन सर...'' बोलती है,... रीना की ओर देखते हुए प्रोफेसर साहब, ''अब आकर क्या करोगी...., रजिस्टर में तुम्हारी अनुपस्थिति दर्शा चुका हूं। रोज-रोज क्यों देर से आती हो ??'' सीने से किताब चिपकाए खड़ी रीना नीचे फर्श की ओर देखते हुए रुंआसे स्वर में बोली, -''सर, मम्मी को पैरालिसिस है, पापा सुबह-शाम एक प्राइवेट कंपनी में ओवरटाइम नौकरी के चलते बाहर ही रहते हैं जिससे दो छोटी बहिनों के स्कूल का टिफिन तैयार करने में देरी हो जाती है .....और..और...'' बस इतनी बात निकलते ही उस अभागी रीना के चक्षुओं से आंसुओं की धार निकल पड़ी। अपनी इस प्यार वाली रंजिश के चलते रीना को कक्षा में ग़ैर हाजि़र कराने वाला आकाश न मानो कैसे ख़ुद को रोने से रोक पाया। अपराधबोध से घिरे आकाश को मन ही मन ख़ुद से इतनी ग्लानि हो रही थी कि, एक बारगी रीना उसमें ज़ोर से दो-चार थप्पड़ भी मार दे तो वे भी कम हों।।