नीरज
श्रेयांश.....यस सर। गौरव ......प्रजेंट सर। हेमेन्द्र ......जी सर। कॉलेज की कक्षा में प्रवेश करते ही प्रोफेसर गुरुदत्त राम सबसे पहले छात्र-छात्रओं की हाजि़री लगाते थे। रोज़ाना की तरह इस दिन भी हाजि़री लगा रहे प्रोफेसर ने रीना कुमारी का नाम बोला..लेकिन कोई जबाव नहीं आया। क़लम को रोकते हुए सिर को ऊपर उठाकर प्रोफेसर महोदय ने प्रथम बैंच पर बैठे नियमित रहने वाले आकाश की ओर देखकर पूछा, -'आज रीना नहीं आई।' 'वो तो सर हमेशा क्लास के लास्ट टाइम में आती है ताकि आपकी क्लास की अटेंडेंस भी हो जाए और शुरू होने वाली क्लास की भी', आकाश ने तपाक से जबाव दिया। इतना सुनते ही गुरूदत्त जी ने तत्काल प्रभाव से रीना कुमारी की अनुपस्थिति दर्शा दी। हाजि़री पूरी होते ही प्रोफेसर ने रजिस्टर को एक तरफ रख कल का शेष टॉपिक पढ़ाना शुरू कर दिया। सर भले ही पढ़ा रहे थे लेकिन आकाश का मन ही मन फूला नहीं समा रहा था क्योंकि आज उसने अप्रत्यक्ष रूप से रीना से बदला जो ले लिया। हमेशा रीना के चिढैल स्वभाव, अपमान और उसके विरुद्ध कुछ न कर पाने की बेबसी हमेशा कुंठित कर देती थी आकाश को। स्कूल लाइफ से कॉलेज तक उसको चाहता रहा पर संसकारवानों की अम्मा ने आज उसे भाव न दिया। .....
इतने में हुआ वही, अचानक से क्लास के अंत में इक्कीस वर्षीय रीना कॉपी-किताबें दिल से चिपकाएं हौले-हौले से संकोची स्वभाव का आभामंडल बनाए डरावने अंदाज़ में कक्षा के दरवाजे पर ''मे आई कम इन सर...'' बोलती है,... रीना की ओर देखते हुए प्रोफेसर साहब, ''अब आकर क्या करोगी...., रजिस्टर में तुम्हारी अनुपस्थिति दर्शा चुका हूं। रोज-रोज क्यों देर से आती हो ??'' सीने से किताब चिपकाए खड़ी रीना नीचे फर्श की ओर देखते हुए रुंआसे स्वर में बोली, -''सर, मम्मी को पैरालिसिस है, पापा सुबह-शाम एक प्राइवेट कंपनी में ओवरटाइम नौकरी के चलते बाहर ही रहते हैं जिससे दो छोटी बहिनों के स्कूल का टिफिन तैयार करने में देरी हो जाती है .....और..और...'' बस इतनी बात निकलते ही उस अभागी रीना के चक्षुओं से आंसुओं की धार निकल पड़ी। अपनी इस प्यार वाली रंजिश के चलते रीना को कक्षा में ग़ैर हाजि़र कराने वाला आकाश न मानो कैसे ख़ुद को रोने से रोक पाया। अपराधबोध से घिरे आकाश को मन ही मन ख़ुद से इतनी ग्लानि हो रही थी कि, एक बारगी रीना उसमें ज़ोर से दो-चार थप्पड़ भी मार दे तो वे भी कम हों।।
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