नीरज
बहुत ही प्यारा नाम है उसका ''गौरव''! पर गली का ठुल्ले खां उसे ''गोबर'' नाम से बुलाता था। बचपन तो गुजर गया लेकिन जवानी में उससे सहा नहीं गया। आखिर अब दोस्तों के साथ मान-सम्मान की फिक़्र जो थी उसे। गौरव ने एक दिन गुस्से को तनिक भीतर व तनिक बाहर रखकर ठुल्ले खां से कह ही लिया,-'चच्चा, मेरा नाम गौरव है...गौरव, सही से बोलोगे तो बहुत प्यारे लगोगे।अब मैं बच्चा नहीं हूं।' पान की पीक साइड में थूकते हुए ठुल्ले खां,-'बेटा, तू तो बुरा मान रहा है। इसमें मैं क्या करूं ? शुरू से मेरे मुंह से ''गोबर'' ही निकलता है।
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