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Saturday, 6 September 2014

क्या मतलब निकला 17 किताबें पढ़ने का...

 नीरज

म्र के क़रीब अस्सी बसंत देख चुके रामदयाल बाबा अपनी भैंसों की रखवाली के वक़्त तबेले के बाहर चारपाई डाल कर हुक्का गुड़गुड़ाने में लगे रहते थे। गौ-धुली की बेला के समय गांव वाले इधर- उधर से निकलते वक़्त बाबा को राम-राम, श्याम-श्याम करके ही निकलते थे। बहुत दिनों पश्चात़ दीपावली की छुटि्टयों में अपने घर पहुंचे गांव का सबसे अधिक प्रौढ़ युवा रवि घूमते हुए वहां जा पहुंचा। रवि ने पैर छूते हुए रामदयाल बाबा से नमस्कार-चमत्कार किया और बाबा ने भी उससे कुशलक्षेम पूछा। बातें शुरू हुईं और फिर ''बेटा, कितनी किताब पढ़ चुके हो ?'' बाबा ने रवि से पूछा। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) की डिग्री हासिल कर रहे रवि ने जबाव देते हुए कहा- ''बाबा, 17वीं किताब पढ़ रहा हूं।'' ये सुनते ही बाबा ने बड़ी ही ज़ोर से रवि की पीठ थपथपाई, और आर्शीवचन दिया कि, 'बेटा, तुझे बहुत ही ''खबरसूरत'' पत्नी मिले।' इतना सुनते ही गदगद रवि ने एक बार फिर बाबा के चरणों में अपना सिर रख दिया। तमाम बातें दोनों की बीच जारी थीं कि एकदम से बाबा की भैंसें पता नहीं कैसे तबेले में से कूदते हुए भागने लगीं....एकदम चारपाई से उठते हुए बाबा रवि से-'बेटा रोक...रोक...' काफी मशक्कत के बाद भी रवि उन्हें नहीं रोक पाया। लेकिन भैंसों का भागता देख गांव का नन्हे बड़ी ही चालाकी से उन्हें घेर लाया। विचलित बाबा से रहा नहीं गया और उन्होंने निंदा प्रस्ताव पारित करते हुए रवि से कह ही दिया- ''क्या मतलब निकला 17 किताबें पढ़ने का...कम्बख़त तू भैंसें भी न रोक पाया। अपना नन्हें देख पांचवी भी पास नहीं कर पाया और भैंसे ले आया। तेरी उम्र में वो दो बच्चों का बाप है...तू है कि.....।'' तारीफ़ सुनकर बगल में खड़ा नन्हें मंद-मंद मुस्काए जा रहा था। 


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