नीरज
बदन में अंदर तक असर करने वाली उस मद्धम बरसात में गुमटीनुमा दुकान के बाहर गाडि़यां सुधारने वाला मैकेनिक हलकू काम को जल्दी-जल्दी निपटाने में लगा था। उम्र के करीब बीस-बाईस बसंत देख चुके हलकू का ढांचानुमा शरीर पसीने और पानी की मिलावट से लथपथ था। मोबाइल में जैसे ही शाम के छह बजे, वैसे ही उसने औजारों को समेटते हुए दुकान में जा पटके। मालिक ने उसे रोज के हिसाब से पैसे देने चाहे तो हलकू बोला,-'चच्चा, कल की मजदूरी एडवांस दे दो, घर पर ज़रूरत है।' चच्चा ने उसकी दयनीय शक़्ल देखते हुए दो दिन के 300 रुपए थमा दिए। रुपए मिलते ही हलकू ने झट से पर्स में बीबी की फोटो के नीचे दबा लिए और तेज़ गति से साइकिल के पैडल मारते हुए वह अपने साथी फैज़ल के साथ टिफिन को लटकाकर अपने गंतव्य की ओर चल दिया।
जिज्ञासावश साथी फैज़ल ने पूछ ही लिया, -'यार, तुझे आज कैसी जरूरत आ पड़ी, जो एक दिन का एडवांस हिसाब ले लिया।' हलकू,-'साले, तू बहुत बड़ा मूर्ख है..तुझे भी ले लेने थे।' फैज़ल,-'क्यों ? ' हलकू,-''अबे, 15 अगस्त को ड्राय-डे रहेगा न, इसलिए पहले से ही हिसाब बना लिया ताकि अपना कंठ सूखा न रहे। घर की क्या टेंशन है, वहां तो मेरी लुगाई छह घरों में बर्तन मांजने की पग़ार पाती ही है ।''
No comments:
Post a Comment