नीरज
हनुमानगंज थाने के दरोगा ठा. रामसजग सिंह के सेलफोन की गुनगुनाती हुई घंटी बजती है। गहरी नींद में सोए पिता को न जगाते हुए देर रात को अध्ययन कर रही बेटी फोन रिसीव करती है, तभी दूसरी ओर से आवाज़ आती है, 'हेलाे ! सीएसपी मीणा बोल रहा हूं, तुम कहां हो ??' सकपकाती हुई बेटी अपने पिता को जगाते हुए, -'पापा..पापा..सीएसपी सर का कॉल आया है !' एकदम हड़बड़ी में मोबाइल पकड़ते हुए एनर्जेटिक आवाज़ में ठा. रामसजग, 'जी...जी..सर, चौकी पर हूं ?' ज़रा अकड़ते हुए सीएसपी, 'कौन सी चौकी पर ?' 'साबजी, काली छावनी चौकी पर', दरोगा रामसजग ने भयंकर आत्मविश्वास वाली आवाज़ में उत्तर दिया, आवाज़ में बिल्कुल अलसापन सीएसपी साब को महसूस नहीं होने दिया । सीएसपी, -' बातें मत बनाओ ! मैं खुद काली छावनी चौकी पर खड़ा हूं, मिनिटों में यहां पहुंचो।। अब तो मानों शामत आ गई। हड़बड़ी में वर्दी को शरीर पर ओड़ कड़ाके की सर्दी में उठाकर अपनी मोटरसाइकिल चंद सेकेंडों में जब ठा. रामसजग सजगता के साथ रात के 3 बजे चौकी पर पहुंचता है तो देखता है कि सन्नाटा पसरा हुआ है। हाड़ गला देने वाली ठंड में पास की दुकान के बाहर सो रहे चौकीदार से पूछता है-, - 'ओए !!, यहां कोई बत्ती वाली गाड़ी से आया था क्या ?? 'जी, नहीं साहेब, हम तो पूरी रात जगता है, कोई गाड़ी नहीं आई।, चौकीदार ने जवाब दिया। दरोगा रामसजग पूरा माज़रा समझ गया और भयंकर ठंड में चौकी की कुर्सी पर बैठते हुए रामसजग मन ही मन हल्की-सी चेहरे गुस्से वाली मुस्कान लिए सोचता है, मेरी टीआई साब झूठी तरीफ करते हैं कि थाने में तुम सबसे चतुर, चपल और चालाक हो। कम्बख्त, यहां तो चतुरों की कमी नहीं।।
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