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Saturday, 6 September 2014

बच्चा, अगर हम पढ़ा-लिखा होता तो सन्यासी क्यों बनता

नीरज


झीलों के शहर भोपाल में हॉकर्स की ख्याति व व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए नगर निगम द्वारा तालाब के किनारे सुहाने मौसम में चौपाटी का विशेष आयोजन किया गया। तमाम लज़ीज, चटपटे, स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ ठेले वाले गंदगी के साम्राज्य से दूर स्वच्छ वातावरण में ख्याति के चक्कर में बेहतरीन ढंग से चाइनीज़, साउथ इंडियन डिश, उत्तर भारतीय व्यंजन ग्राहकों को परोसे जा रहे थे। तभी कर-कमलों में कमंडल थामे जटाधारी गेरुआ वस्त्रों से लिपटा फक्कड़ सन्यासी चाइनीज़ ठेले पर पहुंचता है और कोथे-मंचूरिअन की ओर इशारा करके खाने के लिए मांगता है। दिल से सच्चा ठेले वाला जब सन्यासी को कोथे की प्लेट देने वाला होता है तभी पास में खड़ा बैजू मसखरा बोला, -'बाबा, इसको मत खाना, ये मांसाहारी है।' बाबा खाने की मना कर देता है। तो कोथे की प्लेट पकड़कर खड़ा ठेले वाला बोलता है कि बाबा, बैजू मज़ाक कर रहा है, आप खा लीजिए। क्या आप पढ़े-लिखे नहीं हो, इतना सुनते ही बाबा तपाक से बोला, -'बच्चा, अगर हम पढ़ा-लिखा होता तो सन्यासी क्यों बनता।।'

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