- नीरज
थमी हुई बरसात की काली घटा के नीचे बैठे गिरीश बाबू अपने हमउम्र पड़ोसी रामदयाल जी के घर के बगीचे में गर्मा-गरम चाय की चुस्कियां ले रहे थे। गिरीश बाबू शिक्षा विभाग से रिटायर्ड थे और रामदयाल जी वन विभाग से। रोजा़ना की चाय पे चर्चा में राजनैतिक-सामाजिक बातें छिड़ा करतीं थी। वही आज हुआ, मेज पर अख़बार रखते हुए एकदम उखड़े स्वभाव में गिरीश बाबू बोलते हैं, -'सत्यानाश हो गया देश का, रामदयाल जी ये देखो कितने नग्नता पसर गई है समाज में।' रामदयाल जी ने जैसे ही अख़बार पर नज़र डाली तो वाटरपार्क में हमउम्र युवक-युवतियों के साथ नहाते व गलबहियां करते हुए चित्र छपे थे। रामदयाल जी भी अख़बार रखते हुए हल्की-सी मुस्कुराहट लिए बोले, क्या करें इस नई पीढ़ी का ?, ज़माना ही ऐसा है।' गिरीश बाबू,-'घर वालों की छूट है, उन्होंने संस्कार दिए ही नहीं।' दूसरे दिन की देर रात रामदयाल जी के घर की घंटी बजती है, दरवाज़ा खोला कि बाहर गिरीश बाबू हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए खड़े हैं। गिरीश बाबू,-'लो, रामदयाल मिठाई खाओ...' रामदयाल जी,-'किस बात की ख़शी मन रही है गिरीश बाबू ? ' गिरीश बाबू बोला,-'' मूनसिटी में आयोजित फैशन शो मे मेरी पोती रैम्प पर कैटवॉक करते हुए फर्स्ट आई है। मैंने सोचा कॉलोनी में मिठाई बांट दूं क्योंकि उसके मां-बाप तो इस खुशी में वहीं पार्टी कर रहे हैं।'' रामदयाल जी सुनकर गिरीश बाबू की ओर मंद-मंद मुस्काने लगे और मन में सोचने लगे शायद इनके संस्कार अलग हैं।
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