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Saturday, 6 September 2014

भगवान को समर्पित 'मुहब्बत बरसा देना तू'

नीरज


पास की झुग्गी बस्ती के नुक्कड़ पर शाम होते ही राजू, बंटी, गोलू, सोनू की मित्र मंडली ने फुल वॉल्यूम लाउडस्पीकर पर गणेश जी की आरती शुरू कर दी। आखिर चंदे से किराए पर लिया तो पैसे वसूल करना तो बनता है..। अब आरती कब ख़त्म हो, शायद ऐसे ही इंतज़ार में मित्र मंडली पूजा की थाली पकड़कर लगातार जल्दी-जल्दी घुमाए जा रही थी। शाम की आरती में शामिल होने आईं केवल अंगूरी और पुष्पा आंटी ही बड़े ही विधान से आरती गुनगुनाते हुए पूजा में मग्न थीं। आरती ख़त्म होते ही लड्डू बटे और मित्र मंडली पांडाल में रह गई....और फिर शुरू हुआ '' Mohabbat Barsa Dena Tu Sawan Aaya Hai, तेरे और मेरे मिलने का मौसम आया है।'' अपने बगल के रिटायर्ड बाबू लज्जाशंकर से नहीं रहा गया और वहां पहुंच कर बोले - ''अरे !!!! कम्बख़्तों, कम से कम यहां तो ऐसे गाने इतनी कर्कश आवाज़ में न बजाओ। भगवान सब देख रहा है।'' इतने में पांडाल में फिल्मी भजनों का आनंद ले रहे परम भक्त कल्लू गणेश् जी के चरणों में से उठकर आते हैं...और शोर के बीच पूछते हैं- ''बाबा, क्या...क्या..परेशानी है....??? तुम..तुम.. हर गाने को एक ही जगह क्यों ले जाते हो। पिक्चर में भले ही हीरो ने बिपासा के लिए ये गाना गाया हो....पर यहां हम सभी भक्त अपनी ओर से भगवान को डेडिकेट (समर्पित) कर रहे हैं....बाबा, सोच बदलो-देश बदलो।'' इतना कहकर परम भक्त जोर का अट्टाहास करने लगे। अब बाबा लज्जाशंकर भी क्या करते.... परम भक्तों की तपस्या में बाधा डालकर भला पाप के भागी क्यों बनें... उन्होंने वहां से घर को निकल आने में ही भलाई समझी।।

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