हम अगर किसी अपने के साथ नदी में नहाने जाएं और डुबकी लेते वक़्त वही हमारा सिर पकड़कर बड़ी ताक़त से बहुत देर तक पानी में डुबाए रखे, तो उस समय बाहर निकलने की जो तड़प होती है न, वही दुनिया की महान बॉक्सर बनने के लिए मैरी कॉम में उनकी बायोपिक फिल्म में देखने को मिली...। इसी तड़प, लगन, उत्साह, मेहनत का सुफल मैरी कॉम को एक जीवन आधरित बॉलीबुड फिल्म व उससे बड़ा कहें तो दनियाभर से मिले पुरस्कारों के रूप में मिला है।
फिल्म का वो दृश्य जिसमें मैरी जब बॉक्सिंग सीखने के लिए प्रशिक्षक (सुनील थापा) के पास जाती है तो वह पूछता है कि पांच कारण बताओ कि तुम बॉक्सिंग क्यों सीखना चाहती हो? वह जबाव में चार बार ''आई लव बॉक्सिंग'' कहते हुए पूछती है,- पांचवां कारण भी बताना जरूरी है क्या ? कोच सर ने मैरी को रोज-रोज बुला-बुला कर उसकी तड़प का परीक्षण किया उसके बाद उसे ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं। मैरी कॉम फिल्म ने अब तक की अनेक महान नायक-नायिकाओं पर बनीं बायोपिक फिल्मों में ऊंचे स्थान पर जगह बना ली है।
भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले ओमंग कुमार के निर्देशन में बनी मैरी कॉम फिल्म अन्य फिल्मों की तरह व्यर्थ की मिर्च- मासाले भरी सामग्री से दूर एक सधी हुई फिल्म है। फिल्म में ख्यात बॉक्सर मैरी कॉम के पात्र को अदाकारा प्रियंका चोपड़ा ने बखूबी जिया है। प्रियंका द्वारा निभाए गए किरदारों से पता चलता है कि मैरी कॉम एक शरीर होते हुए वो बेटी भी है, मां भी है, बहू भी है, पत्नी भी है और एक सफल बॉक्सर भी है। शादी के पहले और शादी के बाद भी। इस चर्चित फिल्म में प्रियंका द्वारा की गई कुशल अदाकारी के लिए उन्हें आजीवन याद किया जाता रहेगा। धांसू स्क्रीनप्ले, संवाद अदायगी व उम्दा गीतों को देख-सुनकर दशकों में एक अज़ीब उत्साह, उमंग, जुनून पैदा किया। मैरी कॉम के पति ऑनलर के किरदार को ख्यात कलाकार दर्शन कुमार ने बेहतरीन ढंग से निभाया है। ऑनलर (दर्शन कुमार) ने एक अच्छे पति की परिभाषा इस चलचित्र के माध्यम से स्पष्ट की है कि किस तरह विषम परिस्थितियों में पति ने मैरी को आगे बढ़ने की ओर प्रोत्साहित किया।
...और हां, फिल्म के शुरूआती क्षणों में हट्टे-कट्टे सौष्ठव शरीर वाले ''लाल'' सांड को देखकर गांव के उन नौजवान पहलवानों की याद आ जाती है जो ताक़त का प्रदर्शन करने के लिए पार्ट टाइम दंगलों में खूब लड़ा करते हैं व समय आने पर ग़लत कार्यों को भी अंज़ाम देते हैं लेकिन देश के लिए उनसे कभी नहीं लड़ा जाता।।
सही मायानों में कहा जाए तो मणिपुर राज्य के कांगथेई गांव की पगडंडियों की पथरीली व कटीली राहों का रास्ता तय करके सात समंदर पार से पांच दफा स्वर्ण मैडल वाली विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली Mangte Chungneijang Mary Kom (MC Mary Kom) के जीवन पर आधरित फिल्म देश-दुनिया के नवोदित बॉक्सरों - खिलाडियों व कुछ बनने की चाहत रखने वाले नागरिकों को एक संदेश देती है। .....शायद ही कोई ऐसा दर्शक हो जो फिल्म को छविगृह से अपने साथ दिलो-दिमाग में बसाकर घर तक न ले गया हो...हालाकि इस फिल्म में ''मुन्नी बदनाम'' नहीं हुई और ''शीला जवान'' नहीं हुई, इसीलिए हो सकता है कि मजनू संप्रदाय को ये फिल्म पसंद न आए....पर फिल्म पैसा वसूल है ।।
फिल्म का वो दृश्य जिसमें मैरी जब बॉक्सिंग सीखने के लिए प्रशिक्षक (सुनील थापा) के पास जाती है तो वह पूछता है कि पांच कारण बताओ कि तुम बॉक्सिंग क्यों सीखना चाहती हो? वह जबाव में चार बार ''आई लव बॉक्सिंग'' कहते हुए पूछती है,- पांचवां कारण भी बताना जरूरी है क्या ? कोच सर ने मैरी को रोज-रोज बुला-बुला कर उसकी तड़प का परीक्षण किया उसके बाद उसे ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं। मैरी कॉम फिल्म ने अब तक की अनेक महान नायक-नायिकाओं पर बनीं बायोपिक फिल्मों में ऊंचे स्थान पर जगह बना ली है।
भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले ओमंग कुमार के निर्देशन में बनी मैरी कॉम फिल्म अन्य फिल्मों की तरह व्यर्थ की मिर्च- मासाले भरी सामग्री से दूर एक सधी हुई फिल्म है। फिल्म में ख्यात बॉक्सर मैरी कॉम के पात्र को अदाकारा प्रियंका चोपड़ा ने बखूबी जिया है। प्रियंका द्वारा निभाए गए किरदारों से पता चलता है कि मैरी कॉम एक शरीर होते हुए वो बेटी भी है, मां भी है, बहू भी है, पत्नी भी है और एक सफल बॉक्सर भी है। शादी के पहले और शादी के बाद भी। इस चर्चित फिल्म में प्रियंका द्वारा की गई कुशल अदाकारी के लिए उन्हें आजीवन याद किया जाता रहेगा। धांसू स्क्रीनप्ले, संवाद अदायगी व उम्दा गीतों को देख-सुनकर दशकों में एक अज़ीब उत्साह, उमंग, जुनून पैदा किया। मैरी कॉम के पति ऑनलर के किरदार को ख्यात कलाकार दर्शन कुमार ने बेहतरीन ढंग से निभाया है।
...और हां, फिल्म के शुरूआती क्षणों में हट्टे-कट्टे सौष्ठव शरीर वाले ''लाल'' सांड को देखकर गांव के उन नौजवान पहलवानों की याद आ जाती है जो ताक़त का प्रदर्शन करने के लिए पार्ट टाइम दंगलों में खूब लड़ा करते हैं व समय आने पर ग़लत कार्यों को भी अंज़ाम देते हैं लेकिन देश के लिए उनसे कभी नहीं लड़ा जाता।।
सही मायानों में कहा जाए तो मणिपुर राज्य के कांगथेई गांव की पगडंडियों की पथरीली व कटीली राहों का रास्ता तय करके सात समंदर पार से पांच दफा स्वर्ण मैडल वाली विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली Mangte Chungneijang Mary Kom (MC Mary Kom) के जीवन पर आधरित फिल्म देश-दुनिया के नवोदित बॉक्सरों - खिलाडियों व कुछ बनने की चाहत रखने वाले नागरिकों को एक संदेश देती है। .....शायद ही कोई ऐसा दर्शक हो जो फिल्म को छविगृह से अपने साथ दिलो-दिमाग में बसाकर घर तक न ले गया हो...हालाकि इस फिल्म में ''मुन्नी बदनाम'' नहीं हुई और ''शीला जवान'' नहीं हुई, इसीलिए हो सकता है कि मजनू संप्रदाय को ये फिल्म पसंद न आए....पर फिल्म पैसा वसूल है ।।
- नीरज
फिल्म की स्टोरी
फिल्म की मुख्य किरदार मैरी कॉम भारत के उस हिस्से की रहने वाली है। जहां आजादी के वर्षों बाद भी लोगों को यह बताना पड़ता है कि वे भारतीय हैं। मैरी कॉम ने एक ऐसा खेल चुना है जिसमें पुरुषों का दबदबा है। भारत में बॉक्सिंग में महिला खिलाड़ी ढूंढे नहीं मिलती हैं। मैरी कॉम के परिवार की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि उन्हें तमाम सुविधाएं मिलती। मैरी के पिता इस खेल के खिलाफ थे। मैरी कॉम को अपने स्तर पर इस खेल में काफी संघर्ष करना पड़ा। फेडरेशन मुक्केबाजों को डाइट में एक केला और चाय दिया जाता है। मैरी अपनी पहली फाइट भूखे पेट लड़ती है। उनका कोच पूछता है कि क्या वह लड़ लेगी तो वह कहती है कि सर, खुशी से ही पेट भर गया। तमाम बाधाओं को पार करते हुए मैरी ने विश्व चैम्पियन का खिताब एक-दो बार नहीं बल्कि पूरे पांच बार अपने नाम किया।
मैरी का संघर्ष दोहरा है। पहला तो वे तमाम बाधाओं को पार कर विश्व चैम्पियन बनती है। इसके बाद शादी करती है और दो बच्चों की मां बनती है। भारत में एक क्रिकेट खिलाड़ी आईपीएल के कुछ मैच खेल कर ही करोड़पति बन जाता है, लेकिन मैरी कॉम तीन बार विश्व विजेता बनने के बावजूद परिवार के बढ़ते खर्च को लेकर चिंतित हो जाती है। वह नौकरी करने का फैसला करती है तो सरकार उन्हें हवलदार की नौकरी देती है जिसे वे ठुकरा देती है। मैरी को कोई पहचानता नहीं है जिसका उन्हें बुरा लगता है। विश्व विजेता खिलाड़ी को फेडरेशन का अदना ऑफिसर ऑफिस के बाहर घंटों इंतजार करवाता है।
मैरी कॉम की वापसी को लेकर रूकावटें खड़ी की जाती हैं। उनसे माफीनामा मांगा जाता है। एक चैम्पियन खिलाड़ी के लिए यह सब अपमानजक है, लेकिन खेल के प्रति प्रेम के चलते मैरी कॉम यह सब सहन करती है और फिर बॉक्सिंग रिंग में उतरती है। और फिर विश्व चैम्पियन का खिताब अपने नाम करती हैं। फिल्म के क्लाइमैक्स में दिखाया गया है कि जब मैरी कॉम विश्व कप फाइनल का मैच खेल रही होती है तब उनके बच्चे के दिल का ऑपरेशन चल रहा होता है। पता नहीं यह हकीकत है या फसाना, लेकिन अगर यह सच है तो इससे बड़ा आश्चर्यजनक बात और नहीं हो सकती है कि वह इतने बड़े दर्द को दिल में बिठाकर मैच खेलती हैं और जीतती भी है। ये सारे प्रसंग दर्शक को बांधकर रखते हैं।
(: फिल्म की स्टोरी साभार)
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