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Wednesday, 10 September 2014

आसाधारण मैरी कॉम की अद्वितीय फिल्म


हम अगर किसी अपने के साथ नदी में नहाने जाएं और डुबकी लेते वक़्त वही हमारा सिर पकड़कर बड़ी ताक़त से बहुत देर तक पानी में डुबाए रखे, तो उस समय बाहर निकलने की जो तड़प होती है न, वही दुनिया की महान बॉक्सर बनने के लिए मैरी कॉम में उनकी बायोपिक फिल्म में देखने को मिली...। इसी तड़प, लगन, उत्साह, मेहनत का सुफल मैरी कॉम को एक जीवन आधरित बॉलीबुड फिल्म व उससे बड़ा कहें तो दनियाभर से मिले पुरस्कारों के रूप में मिला है। 

फिल्म का वो दृश्य जिसमें मैरी जब बॉक्सिंग सीखने के लिए प्रशिक्षक (सुनील थापा) के पास जाती है तो वह पूछता है कि पांच कारण बताओ कि तुम बॉक्सिंग क्यों सीखना चाहती हो? वह जबाव में चार बार ''आई लव बॉक्सिंग'' कहते हुए पूछती है,- पांचवां कारण भी बताना जरूरी है क्या ? कोच सर ने मैरी को रोज-रोज बुला-बुला कर उसकी तड़प का परीक्षण किया उसके बाद उसे ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं। मैरी कॉम फिल्म ने अब तक की अनेक महान नायक-नायिकाओं पर बनीं बायोपिक फिल्मों में ऊंचे स्थान पर जगह बना ली है। 

                                                    


भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले ओमंग कुमार के निर्देशन में बनी मैरी कॉम फिल्म अन्य फिल्मों की तरह व्यर्थ की मिर्च- मासाले भरी सामग्री से दूर एक सधी हुई फिल्म है। फिल्म में ख्यात बॉक्सर मैरी कॉम के पात्र को अदाकारा प्रियंका चोपड़ा ने बखूबी जिया है। प्रियंका द्वारा निभाए गए किरदारों से पता चलता है कि मैरी कॉम एक शरीर होते हुए वो बेटी भी है, मां भी है, बहू भी है, पत्नी भी है और एक सफल बॉक्सर भी है। शादी के पहले और शादी के बाद भी। इस चर्चित फिल्म में प्रियंका द्वारा की गई कुशल अदाकारी के लिए उन्हें आजीवन याद किया जाता रहेगा। धांसू स्क्रीनप्ले, संवाद अदायगी व उम्दा गीतों को देख-सुनकर दशकों में एक अज़ीब उत्साह, उमंग, जुनून पैदा किया। मैरी कॉम के पति ऑनलर के किरदार को ख्यात कलाकार दर्शन कुमार ने बेहतरीन ढंग से निभाया है। ऑनलर (दर्शन कुमार) ने एक अच्छे पति की परिभाषा इस चलचित्र के माध्यम से स्पष्ट की है कि किस तरह विषम परिस्थितियों में पति ने मैरी को आगे बढ़ने की ओर प्रोत्साहित किया।

...और हां, फिल्म के शुरूआती क्षणों में हट्टे-कट्टे सौष्ठव शरीर वाले ''लाल'' सांड को देखकर गांव के उन नौजवान पहलवानों की याद आ जाती है जो ताक़त का प्रदर्शन करने के लिए पार्ट टाइम दंगलों में खूब लड़ा करते हैं व समय आने पर ग़लत कार्यों को भी अंज़ाम देते हैं लेकिन देश के लिए उनसे कभी नहीं लड़ा जाता।।
सही मायानों में कहा जाए तो मणिपुर राज्य के कांगथेई गांव की पगडंडियों की पथरीली व कटीली राहों का रास्ता तय करके सात समंदर पार से पांच दफा स्वर्ण मैडल वाली विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली Mangte Chungneijang Mary Kom (MC Mary Kom) के जीवन पर आधरित फिल्म देश-दुनिया के नवोदित बॉक्सरों - खिलाडियों व कुछ बनने की चाहत रखने वाले नागरिकों को एक संदेश देती है। .....शायद ही कोई ऐसा दर्शक हो जो फिल्म को छविगृह से अपने साथ दिलो-दिमाग में बसाकर घर तक न ले गया हो...हालाकि इस फिल्म में ''मुन्नी बदनाम'' नहीं हुई और ''शीला जवान'' नहीं हुई, इसीलिए हो सकता है कि मजनू संप्रदाय को ये फिल्म पसंद न आए....पर फिल्म पैसा वसूल है ।।


फिल्म का वो दृश्य जिसमें मैरी जब बॉक्सिंग सीखने के लिए प्रशिक्षक (सुनील थापा) के पास जाती है तो वह पूछता है कि पांच कारण बताओ कि तुम बॉक्सिंग क्यों सीखना चाहती हो? वह जबाव में चार बार ''आई लव बॉक्सिंग'' कहते हुए पूछती है,- पांचवां कारण भी बताना जरूरी है क्या ? कोच सर ने मैरी को रोज-रोज बुला-बुला कर उसकी तड़प का परीक्षण किया उसके बाद उसे ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं। मैरी कॉम फिल्म ने अब तक की अनेक महान नायक-नायिकाओं पर बनीं बायोपिक फिल्मों में ऊंचे स्थान पर जगह बना ली है।

भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले ओमंग कुमार के निर्देशन में बनी मैरी कॉम फिल्म अन्य फिल्मों की तरह व्यर्थ की मिर्च- मासाले भरी सामग्री से दूर एक सधी हुई फिल्म है। फिल्म में ख्यात बॉक्सर मैरी कॉम के पात्र को अदाकारा प्रियंका चोपड़ा ने बखूबी जिया है। प्रियंका द्वारा निभाए गए किरदारों से पता चलता है कि मैरी कॉम एक शरीर होते हुए वो बेटी भी है, मां भी है, बहू भी है, पत्नी भी है और एक सफल बॉक्सर भी है। शादी के पहले और शादी के बाद भी। इस चर्चित फिल्म में प्रियंका द्वारा की गई कुशल अदाकारी के लिए उन्हें आजीवन याद किया जाता रहेगा। धांसू स्क्रीनप्ले, संवाद अदायगी व उम्दा गीतों को देख-सुनकर दशकों में एक अज़ीब उत्साह, उमंग, जुनून पैदा किया। मैरी कॉम के पति ऑनलर के किरदार को ख्यात कलाकार दर्शन कुमार ने बेहतरीन ढंग से निभाया है।

...और हां, फिल्म के शुरूआती क्षणों में हट्टे-कट्टे सौष्ठव शरीर वाले ''लाल'' सांड को देखकर गांव के उन नौजवान पहलवानों की याद आ जाती है जो ताक़त का प्रदर्शन करने के लिए पार्ट टाइम दंगलों में खूब लड़ा करते हैं व समय आने पर ग़लत कार्यों को भी अंज़ाम देते हैं लेकिन देश के लिए उनसे कभी नहीं लड़ा जाता।।

सही मायानों में कहा जाए तो मणिपुर राज्य के कांगथेई गांव की पगडंडियों की पथरीली व कटीली राहों का रास्ता तय करके सात समंदर पार से पांच दफा स्वर्ण मैडल वाली विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली Mangte Chungneijang Mary Kom (MC Mary Kom) के जीवन पर आधरित फिल्म देश-दुनिया के नवोदित बॉक्सरों - खिलाडियों व कुछ बनने की चाहत रखने वाले नागरिकों को एक संदेश देती है। .....शायद ही कोई ऐसा दर्शक हो जो फिल्म को छविगृह से अपने साथ दिलो-दिमाग में बसाकर घर तक न ले गया हो...हालाकि इस फिल्म में ''मुन्नी बदनाम'' नहीं हुई और ''शीला जवान'' नहीं हुई, इसीलिए हो सकता है कि मजनू संप्रदाय को ये फिल्म पसंद न आए....पर फिल्म पैसा वसूल है ।।


- नीरज

फिल्म की स्टोरी


फिल्म की मुख्य किरदार मैरी कॉम भारत के उस हिस्से की रहने वाली है। जहां आजादी के वर्षों बाद भी लोगों को यह बताना पड़ता है कि वे भारतीय हैं। मैरी कॉम ने एक ऐसा खेल चुना है जिसमें पुरुषों का दबदबा है। भारत में बॉक्सिंग में महिला खिलाड़ी ढूंढे नहीं मिलती हैं। मैरी कॉम के परिवार की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि उन्हें तमाम सुविधाएं मिलती। मैरी के पिता इस खेल के खिलाफ थे। मैरी कॉम को अपने स्तर पर इस खेल में काफी संघर्ष करना पड़ा। फेडरेशन मुक्केबाजों को डाइट में एक केला और चाय दिया जाता है। मैरी अपनी पहली फाइट भूखे पेट लड़ती है। उनका कोच पूछता है कि क्या वह लड़ लेगी तो वह कहती है कि सर, खुशी से ही पेट भर गया। तमाम बाधाओं को पार करते हुए मैरी ने विश्व चैम्पियन का खिताब एक-दो बार नहीं बल्कि पूरे पांच बार अपने नाम किया।   


मैरी का संघर्ष दोहरा है। पहला तो वे तमाम बाधाओं को पार कर विश्व चैम्पियन बनती है। इसके बाद शादी करती है और दो बच्चों की मां बनती है। भारत में एक क्रिकेट खिलाड़ी आईपीएल के कुछ मैच खेल कर ही करोड़पति बन जाता है, लेकिन मैरी कॉम तीन बार विश्व विजेता बनने के बावजूद परिवार के बढ़ते खर्च को लेकर चिंतित हो जाती है। वह नौकरी करने का फैसला करती है तो सरकार उन्हें हवलदार की नौकरी देती है जिसे वे ठुकरा देती है। मैरी को कोई पहचानता नहीं है जिसका उन्हें बुरा लगता है। विश्व विजेता खिलाड़ी को फेडरेशन का अदना ऑफिसर ऑफिस के बाहर घंटों इंतजार करवाता है।

मैरी कॉम की वापसी को लेकर रूकावटें खड़ी की जाती हैं। उनसे माफीनामा मांगा जाता है। एक चैम्पियन खिलाड़ी के लिए यह सब अपमानजक है, लेकिन खेल के प्रति प्रेम के चलते मैरी कॉम यह सब सहन करती है और फिर बॉक्सिंग रिंग में उतरती है। और फिर विश्व चैम्पियन का खिताब अपने नाम करती हैं। फिल्म के क्लाइमैक्स में दिखाया गया है कि जब मैरी कॉम विश्व कप फाइनल का मैच खेल रही होती है तब उनके बच्चे के दिल का ऑपरेशन चल रहा होता है। पता नहीं यह हकीकत है या फसाना, लेकिन अगर यह सच है तो इससे बड़ा आश्चर्यजनक बात और नहीं हो सकती है कि वह इतने बड़े दर्द को दिल में बिठाकर मैच खेलती हैं और जीतती भी है। ये सारे प्रसंग दर्शक को बांधकर रखते हैं।



(: फिल्म की स्टोरी साभार)

Saturday, 6 September 2014

अपराधबोध से घिरा आकाश


नीरज


श्रेयांश.....यस सर। गौरव ......प्रजेंट सर। हेमेन्द्र ......जी सर। कॉलेज की कक्षा में प्रवेश करते ही प्रोफेसर गुरुदत्त राम सबसे पहले छात्र-छात्रओं की हाजि़री लगाते थे। रोज़ाना की तरह इस दिन भी हाजि़री लगा रहे प्रोफेसर ने रीना कुमारी का नाम बोला..लेकिन कोई जबाव नहीं आया। क़लम को रोकते हुए सिर को ऊपर उठाकर प्रोफेसर महोदय ने प्रथम बैंच पर बैठे नियमित रहने वाले आकाश की ओर देखकर पूछा, -'आज रीना नहीं आई।' 'वो तो सर हमेशा क्लास के लास्ट टाइम में आती है ताकि आपकी क्लास की अटेंडेंस भी हो जाए और शुरू होने वाली क्लास की भी', आकाश ने तपाक से जबाव दिया। इतना सुनते ही गुरूदत्त जी ने तत्काल प्रभाव से रीना कुमारी की अनुपस्थिति दर्शा दी। हाजि़री पूरी होते ही प्रोफेसर ने रजिस्टर को एक तरफ रख कल का शेष टॉपिक पढ़ाना शुरू कर दिया। सर भले ही पढ़ा रहे थे लेकिन आकाश का मन ही मन फूला नहीं समा रहा था क्योंकि आज उसने अप्रत्यक्ष रूप से रीना से बदला जो ले लिया। हमेशा रीना के चिढैल स्वभाव, अपमान और उसके विरुद्ध कुछ न कर पाने की बेबसी हमेशा कुंठित कर देती थी आकाश को। स्कूल लाइफ से कॉलेज तक उसको चाहता रहा पर संसकारवानों की अम्मा ने आज उसे भाव न दिया। .....

इतने में हुआ वही, अचानक से क्लास के अंत में इक्कीस वर्षीय रीना कॉपी-किताबें दिल से चिपकाएं हौले-हौले से संकोची स्वभाव का आभामंडल बनाए डरावने अंदाज़ में कक्षा के दरवाजे पर ''मे आई कम इन सर...'' बोलती है,... रीना की ओर देखते हुए प्रोफेसर साहब, ''अब आकर क्या करोगी...., रजिस्टर में तुम्हारी अनुपस्थिति दर्शा चुका हूं। रोज-रोज क्यों देर से आती हो ??'' सीने से किताब चिपकाए खड़ी रीना नीचे फर्श की ओर देखते हुए रुंआसे स्वर में बोली, -''सर, मम्मी को पैरालिसिस है, पापा सुबह-शाम एक प्राइवेट कंपनी में ओवरटाइम नौकरी के चलते बाहर ही रहते हैं जिससे दो छोटी बहिनों के स्कूल का टिफिन तैयार करने में देरी हो जाती है .....और..और...'' बस इतनी बात निकलते ही उस अभागी रीना के चक्षुओं से आंसुओं की धार निकल पड़ी। अपनी इस प्यार वाली रंजिश के चलते रीना को कक्षा में ग़ैर हाजि़र कराने वाला आकाश न मानो कैसे ख़ुद को रोने से रोक पाया। अपराधबोध से घिरे आकाश को मन ही मन ख़ुद से इतनी ग्लानि हो रही थी कि, एक बारगी रीना उसमें ज़ोर से दो-चार थप्पड़ भी मार दे तो वे भी कम हों।।

बच्चा, अगर हम पढ़ा-लिखा होता तो सन्यासी क्यों बनता

नीरज


झीलों के शहर भोपाल में हॉकर्स की ख्याति व व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए नगर निगम द्वारा तालाब के किनारे सुहाने मौसम में चौपाटी का विशेष आयोजन किया गया। तमाम लज़ीज, चटपटे, स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ ठेले वाले गंदगी के साम्राज्य से दूर स्वच्छ वातावरण में ख्याति के चक्कर में बेहतरीन ढंग से चाइनीज़, साउथ इंडियन डिश, उत्तर भारतीय व्यंजन ग्राहकों को परोसे जा रहे थे। तभी कर-कमलों में कमंडल थामे जटाधारी गेरुआ वस्त्रों से लिपटा फक्कड़ सन्यासी चाइनीज़ ठेले पर पहुंचता है और कोथे-मंचूरिअन की ओर इशारा करके खाने के लिए मांगता है। दिल से सच्चा ठेले वाला जब सन्यासी को कोथे की प्लेट देने वाला होता है तभी पास में खड़ा बैजू मसखरा बोला, -'बाबा, इसको मत खाना, ये मांसाहारी है।' बाबा खाने की मना कर देता है। तो कोथे की प्लेट पकड़कर खड़ा ठेले वाला बोलता है कि बाबा, बैजू मज़ाक कर रहा है, आप खा लीजिए। क्या आप पढ़े-लिखे नहीं हो, इतना सुनते ही बाबा तपाक से बोला, -'बच्चा, अगर हम पढ़ा-लिखा होता तो सन्यासी क्यों बनता।।'

यहां तो चतुरों की कमी नहीं


नीरज


नुमानगंज थाने के दरोगा ठा. रामसजग सिंह के सेलफोन की गुनगुनाती हुई घंटी बजती है। गहरी नींद में सोए पिता को न जगाते हुए देर रात को अध्ययन कर रही बेटी फोन रिसीव करती है, तभी दूसरी ओर से आवाज़ आती है, 'हेलाे ! सीएसपी मीणा बोल रहा हूं, तुम कहां हो ??' सकपकाती हुई बेटी अपने पिता को जगाते हुए, -'पापा..पापा..सीएसपी सर का कॉल आया है !' एकदम हड़बड़ी में मोबाइल पकड़ते हुए एनर्जेटिक आवाज़ में ठा. रामसजग, 'जी...जी..सर, चौकी पर हूं ?' ज़रा अकड़ते हुए सीएसपी, 'कौन सी चौकी पर ?' 'साबजी, काली छावनी चौकी पर', दरोगा रामसजग ने भयंकर आत्मविश्वास वाली आवाज़ में उत्तर दिया, आवाज़ में बिल्कुल अलसापन सीएसपी साब को महसूस नहीं होने दिया । सीएसपी, -' बातें मत बनाओ ! मैं खुद काली छावनी चौकी पर खड़ा हूं, मिनिटों में यहां पहुंचो।। अब तो मानों शामत आ गई। हड़बड़ी में वर्दी को शरीर पर ओड़ कड़ाके की सर्दी में उठाकर अपनी मोटरसाइकिल चंद सेकेंडों में जब ठा. रामसजग सजगता के साथ रात के 3 बजे चौकी पर पहुंचता है तो देखता है कि सन्नाटा पसरा हुआ है। हाड़ गला देने वाली ठंड में पास की दुकान के बाहर सो रहे चौकीदार से पूछता है-, - 'ओए !!, यहां कोई बत्ती वाली गाड़ी से आया था क्या ?? 'जी, नहीं साहेब, हम तो पूरी रात जगता है, कोई गाड़ी नहीं आई।, चौकीदार ने जवाब दिया। दरोगा रामसजग पूरा माज़रा समझ गया और भयंकर ठंड में चौकी की कुर्सी पर बैठते हुए रामसजग मन ही मन हल्की-सी चेहरे गुस्से वाली मुस्कान लिए सोचता है, मेरी टीआई साब झूठी तरीफ करते हैं कि थाने में तुम सबसे चतुर, चपल और चालाक हो। कम्बख्त, यहां तो चतुरों की कमी नहीं।।

मेरी पोती रैम्प पर कैटवॉक करते हुए फर्स्ट आई है


- नीरज

मी हुई बरसात की काली घटा के नीचे बैठे गिरीश बाबू अपने हमउम्र पड़ोसी रामदयाल जी के घर के बगीचे में गर्मा-गरम चाय की चुस्कियां ले रहे थे। गिरीश बाबू शिक्षा विभाग से रिटायर्ड थे और रामदयाल जी वन विभाग से। रोजा़ना की चाय पे चर्चा में राजनैतिक-सामाजिक बातें छिड़ा करतीं थी। वही आज हुआ, मेज पर अख़बार रखते हुए एकदम उखड़े स्वभाव में गिरीश बाबू बोलते हैं, -'सत्यानाश हो गया देश का, रामदयाल जी ये देखो कितने नग्नता पसर गई है समाज में।' रामदयाल जी ने जैसे ही अख़बार पर नज़र डाली तो वाटरपार्क में हमउम्र युवक-युवतियों के साथ नहाते व गलबहियां करते हुए चित्र छपे थे। रामदयाल जी भी अख़बार रखते हुए हल्की-सी मुस्कुराहट लिए बोले, क्या करें इस नई पीढ़ी का ?, ज़माना ही ऐसा है।' गिरीश बाबू,-'घर वालों की छूट है, उन्होंने संस्कार दिए ही नहीं।' दूसरे दिन की देर रात रामदयाल जी के घर की घंटी बजती है, दरवाज़ा खोला कि बाहर गिरीश बाबू हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए खड़े हैं। गिरीश बाबू,-'लो, रामदयाल मिठाई खाओ...' रामदयाल जी,-'किस बात की ख़शी मन रही है गिरीश बाबू ? ' गिरीश बाबू बोला,-'' मूनसिटी में आयोजित फैशन शो मे मेरी पोती रैम्प पर कैटवॉक करते हुए फर्स्ट आई है। मैंने सोचा कॉलोनी में मिठाई बांट दूं क्योंकि उसके मां-बाप तो इस खुशी में वहीं पार्टी कर रहे हैं।'' रामदयाल जी सुनकर गिरीश बाबू की ओर मंद-मंद मुस्काने लगे और मन में सोचने लगे शायद इनके संस्कार अलग हैं।


मेक्को न तेरी बातें भाषण लगतीं हैं


नीरज


नाेयडा के एक ख्यात मीडिया संस्थान ने इंटर्न करके लौटी सहपाठी मोहतरमा से यूं ही अनौपचारिक मुलाक़ात हुई। पहले से ही उसकी ख़ैर-मक़दम में लगे दो और शुभचिंतकों के बीच में भी पहुंच गया। तमाम हाय-हैलो के बाद उसने अपने अनुभव सुनाए। इस सब के बीच अचानक मैंने अपने जिज्ञासू और ज्ञान पिपासू स्वभाव के चलते उससे पूछ दिया कि, यार, NOIDA की फुल फार्म क्या है ? बस, फिर क्या..ऐसा लगा कि जैसे शहद की तलाश में गए शख़्स ने ग़लती से छत्ते में हाथ मार दिया हो। एकदम उखड़कर डंकशब्दों से प्रहार करते हुए बोली,-''मेक्को न तेरी बातें भाषण लगतीं हैं, तू ध्यान रखा कर इन फालतू बातों का। चल तू बता दे BHOPAL की फुल फोर्म...बात करता है । तू उन लोगों में से है जो बीए पास व हेट स्टोरी जैसी फिल्मों में मैसेज ढ़ूंढ़ते हैं।'' गर्दन समेत समस्त मुखमंडल को आगे कर और दोनों हाथों को पीछे की ओर खी़चते हुए धाराप्रवाह बोली ही जा रही थी एवं पास खड़े दोनों प्राणी हैरान थे। माेहतरमा तेज़ गति से आगे बढ़ गई और कुछ दूर से मुड़कर बोलतीं हैं,-'तुम फुल फोर्म याद करते रहना आेके, बट आई बिकेम बी ए गुड एण्ड बिग एंकर। और हां मुझे भोपाल का पूरा नाम भी बताना।'

अबे, 15 अगस्त को ड्राय-डे रहेगा न


नीरज

बदन में अंदर तक असर करने वाली उस मद्धम बरसात में गुमटीनुमा दुकान के बाहर गाडि़यां सुधारने वाला मैकेनिक हलकू काम को जल्दी-जल्दी निपटाने में लगा था। उम्र के करीब बीस-बाईस बसंत देख चुके हलकू का ढांचानुमा शरीर पसीने और पानी की मिलावट से लथपथ था। मोबाइल में जैसे ही शाम के छह बजे, वैसे ही उसने औजारों को समेटते हुए दुकान में जा पटके। मालिक ने उसे रोज के हिसाब से पैसे देने चाहे तो हलकू बोला,-'चच्चा, कल की मजदूरी एडवांस दे दो, घर पर ज़रूरत है।' चच्चा ने उसकी दयनीय शक़्ल देखते हुए दो दिन के 300 रुपए थमा दिए। रुपए मिलते ही हलकू ने झट से पर्स में बीबी की फोटो के नीचे दबा लिए और तेज़ गति से साइकिल के पैडल मारते हुए वह अपने साथी फैज़ल के साथ टिफिन को लटकाकर अपने गंतव्य की ओर चल दिया। 

जिज्ञासावश साथी फैज़ल ने पूछ ही लिया, -'यार, तुझे आज कैसी जरूरत आ पड़ी, जो एक दिन का एडवांस हिसाब ले लिया।' हलकू,-'साले, तू बहुत बड़ा मूर्ख है..तुझे भी ले लेने थे।' फैज़ल,-'क्यों ? ' हलकू,-''अबे, 15 अगस्त को ड्राय-डे रहेगा न, इसलिए पहले से ही हिसाब बना लिया ताकि अपना कंठ सूखा न रहे। घर की क्या टेंशन है, वहां तो मेरी लुगाई छह घरों में बर्तन मांजने की पग़ार पाती ही है ।'' 


मेरे मुंह से ''गोबर'' ही निकलता है

नीरज


हुत ही प्यारा नाम है उसका ''गौरव''! पर गली का ठुल्ले खां उसे ''गोबर'' नाम से बुलाता था। बचपन तो गुजर गया लेकिन जवानी में उससे सहा नहीं गया। आखिर अब दोस्तों के साथ मान-सम्मान की फिक़्र जो थी उसे। गौरव ने एक दिन गुस्से को तनिक भीतर व तनिक बाहर रखकर ठुल्ले खां से कह ही लिया,-'चच्चा, मेरा नाम गौरव है...गौरव, सही से बोलोगे तो बहुत प्यारे लगोगे।अब मैं बच्चा नहीं हूं।' पान की पीक साइड में थूकते हुए ठुल्ले खां,-'बेटा, तू तो बुरा मान रहा है। इसमें मैं क्या करूं ? शुरू से मेरे मुंह से ''गोबर'' ही निकलता है।  


क्या मतलब निकला 17 किताबें पढ़ने का...

 नीरज

म्र के क़रीब अस्सी बसंत देख चुके रामदयाल बाबा अपनी भैंसों की रखवाली के वक़्त तबेले के बाहर चारपाई डाल कर हुक्का गुड़गुड़ाने में लगे रहते थे। गौ-धुली की बेला के समय गांव वाले इधर- उधर से निकलते वक़्त बाबा को राम-राम, श्याम-श्याम करके ही निकलते थे। बहुत दिनों पश्चात़ दीपावली की छुटि्टयों में अपने घर पहुंचे गांव का सबसे अधिक प्रौढ़ युवा रवि घूमते हुए वहां जा पहुंचा। रवि ने पैर छूते हुए रामदयाल बाबा से नमस्कार-चमत्कार किया और बाबा ने भी उससे कुशलक्षेम पूछा। बातें शुरू हुईं और फिर ''बेटा, कितनी किताब पढ़ चुके हो ?'' बाबा ने रवि से पूछा। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) की डिग्री हासिल कर रहे रवि ने जबाव देते हुए कहा- ''बाबा, 17वीं किताब पढ़ रहा हूं।'' ये सुनते ही बाबा ने बड़ी ही ज़ोर से रवि की पीठ थपथपाई, और आर्शीवचन दिया कि, 'बेटा, तुझे बहुत ही ''खबरसूरत'' पत्नी मिले।' इतना सुनते ही गदगद रवि ने एक बार फिर बाबा के चरणों में अपना सिर रख दिया। तमाम बातें दोनों की बीच जारी थीं कि एकदम से बाबा की भैंसें पता नहीं कैसे तबेले में से कूदते हुए भागने लगीं....एकदम चारपाई से उठते हुए बाबा रवि से-'बेटा रोक...रोक...' काफी मशक्कत के बाद भी रवि उन्हें नहीं रोक पाया। लेकिन भैंसों का भागता देख गांव का नन्हे बड़ी ही चालाकी से उन्हें घेर लाया। विचलित बाबा से रहा नहीं गया और उन्होंने निंदा प्रस्ताव पारित करते हुए रवि से कह ही दिया- ''क्या मतलब निकला 17 किताबें पढ़ने का...कम्बख़त तू भैंसें भी न रोक पाया। अपना नन्हें देख पांचवी भी पास नहीं कर पाया और भैंसे ले आया। तेरी उम्र में वो दो बच्चों का बाप है...तू है कि.....।'' तारीफ़ सुनकर बगल में खड़ा नन्हें मंद-मंद मुस्काए जा रहा था। 


भगवान को समर्पित 'मुहब्बत बरसा देना तू'

नीरज


पास की झुग्गी बस्ती के नुक्कड़ पर शाम होते ही राजू, बंटी, गोलू, सोनू की मित्र मंडली ने फुल वॉल्यूम लाउडस्पीकर पर गणेश जी की आरती शुरू कर दी। आखिर चंदे से किराए पर लिया तो पैसे वसूल करना तो बनता है..। अब आरती कब ख़त्म हो, शायद ऐसे ही इंतज़ार में मित्र मंडली पूजा की थाली पकड़कर लगातार जल्दी-जल्दी घुमाए जा रही थी। शाम की आरती में शामिल होने आईं केवल अंगूरी और पुष्पा आंटी ही बड़े ही विधान से आरती गुनगुनाते हुए पूजा में मग्न थीं। आरती ख़त्म होते ही लड्डू बटे और मित्र मंडली पांडाल में रह गई....और फिर शुरू हुआ '' Mohabbat Barsa Dena Tu Sawan Aaya Hai, तेरे और मेरे मिलने का मौसम आया है।'' अपने बगल के रिटायर्ड बाबू लज्जाशंकर से नहीं रहा गया और वहां पहुंच कर बोले - ''अरे !!!! कम्बख़्तों, कम से कम यहां तो ऐसे गाने इतनी कर्कश आवाज़ में न बजाओ। भगवान सब देख रहा है।'' इतने में पांडाल में फिल्मी भजनों का आनंद ले रहे परम भक्त कल्लू गणेश् जी के चरणों में से उठकर आते हैं...और शोर के बीच पूछते हैं- ''बाबा, क्या...क्या..परेशानी है....??? तुम..तुम.. हर गाने को एक ही जगह क्यों ले जाते हो। पिक्चर में भले ही हीरो ने बिपासा के लिए ये गाना गाया हो....पर यहां हम सभी भक्त अपनी ओर से भगवान को डेडिकेट (समर्पित) कर रहे हैं....बाबा, सोच बदलो-देश बदलो।'' इतना कहकर परम भक्त जोर का अट्टाहास करने लगे। अब बाबा लज्जाशंकर भी क्या करते.... परम भक्तों की तपस्या में बाधा डालकर भला पाप के भागी क्यों बनें... उन्होंने वहां से घर को निकल आने में ही भलाई समझी।।