फुटबॉल का खेल
- नीरज
भारत में कितने लोगों को पता है कि फुटबॉल में कितने खिलाड़ी होते हैं ? कितने लोगों को पता है कि भारत टीम फीफा वर्ल्डकप में प्रतिनिधित्व कर रही है या नहीं ? ऐसे न जाने कितने सवाल पैदा होते हैं... लेकिन फिर भी देश के बड़े-बड़े अख़बार अपने 5-6 पेज इन ख़बरों में ख़पा रहे हैं और चैनलों के तो कहने ही क्या...। पहले मीडिया वह दिखती थी जिसे लोग देखना चाहते हैं लेकिन अब मीडिया जो दिखाती है उसे लोग देखते हैं। बमुश्किल सिविल सेवाओं व बैंक आदि की तैयारी करने वाले शिक्षार्थियों और खेल जगत से जुड़े लोगों को छोड़ दें तो शायद ही डेढ़ अरब की आबादी में से कुछ प्रतिशत लोग ही इस खेल के बारे में बता सकें। पत्रकारिता के विद्यार्थियों को बुलेट थ्योरी, फर्स्ट स्टेप, सेकेंड स्अेप जैसी थ्योरी समझाई जातीं हैं, जिनमें यही सब निहित है कि जबरदस्ती किसी बात को व्यूअर्स के दिमाग में कैसे पहुंचाएं, बस सब वही फंडा है।
जब फीफा कप के मेजवान देश ब्राजील में खुद जनता इसके विरोध में सड़कों पर उतर आई है, जब भारतीय टीम इसमें प्रतिनिधित्व नहीं कर रही है, जब फीफा के आयोजनों व भ्रष्टाचार पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं तो फिर मीडिया रुपी पिस्टल से दर्शकों, पाठकों और श्रोताओं के भेजे में क्यों फीफा-फीफा ठूंसा जा रहा है ?? उरुग्वे के पत्रकार एडुआर्डाे गैलेएनो का कहना है कि, 'फीफा में नजर आने वोल और न नज़र आने वाले तानाशाह हैं। विश्व फटबॉल में सत्ता का ढांचा राजशाही जैसा है। यह दुनिया का सबसे गुप्त साम्राज्य है।' एक तरफ भारत को दूरदर्शी प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम पटरी पर लाने को आतुर है, सरकार गरीब याानि दरिद्रनारायण की बात कर रही है वहीं, विलासिता के खेलों को जबरदस्ती बढ़ावा दिया जा रहा है। सालों पहले विज्ञापनों की भरमार से क्रिकेट को सर्वोपरि खेल बना दिया तो लगता है कि फुटबॉल का विश्वस्तरीय प्रचार-प्रसार करके उसी के समकक्ष खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। इतने तड़क-भड़क जोरशोर वाले प्रचार-प्रचार से एकबारगी तो ज़रूर लगता है कि फीफा के कर्ताधर्ताओं ने विश्व की सभी बड़ी पीआर(पब्लिक रिलेशन) एजेसियों को मुंहमांगा दाम देकर विश्व जगत की मीडिया के माध्यम से इसे अमीर-गरीब तक जबरदस्ती पहुंचाने का काम शुरू कर दिया है। विकासशाील देशों के श्रेणी में खड़े भारत की हक़ीकत यह है कि फुटबाॅल के विश्व के सबसे पहले फीफा वर्ल्ड के दौरान भारतीय फुटबॉल टीम के पास विदेश जाने के लिए किराए के पैसे नहीं थे जबकि फीफा आयोजकों ने 70 प्रतिशत तक किराए की रकम चुकाने की बात कही थी लेकिन गरीबी इतनी कि आपको ताज्जुब होगा कि उनके पास खेल में प्रयुक्त हाेने वाले जूतों के लिए भी पैसे नहीं थे तो किराए की 30 प्रतिशत रकम भी कहां से लाते। अब अंदाजा लग जाता है कि हम किस स्थिति से निकल कर आए हैं।
अगर दूसरे चश्मे से फीफा वर्ल्ड पर नज़र डालें तो अच्छाईयां कम, बुराईयां -खामियां बेहद नज़र आतीं हैं। मेजवान ब्राजील फीफा-2014 के आयोजन पर करीब 11 अरब डॉलर खर्च करने वाला है। जिसका वहां निवासियों द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि इस पैसे से अस्पताल, भवन, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे तमाम जनोपयोगी कार्यों को अंजाम दिया जा सकता था लेकिन फीफा (फेडरेशन इंटरनेशनल डि फुटबॉल एसोसिएशन) के अध्यक्ष जोसेफ ब्लैटर का कहना है कि वे फुटबॉल के खेल को वे खेलों की दुनिया में ऊंचा दर्जा दिलवाएंगे और इन प्रदर्शनों से फीफा को कोई फर्क नहीं पड़ता। आज तक आईसीसी (इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल ) और बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) के कमाई राशि का पता नहीं चला कि इतना पैसा कहां जाता है ? और किस-किस जगह खर्च किया जाता है ? ठीक उसी तरह फुटबॉल की सबसे बड़ी संस्था फीफा भी मेजबान देश से खेलों की तैयारियों के लिए अधिक खर्चा कराकर उन्हें मामूली धनराशि देने में माहिर है। क्रिकेट की तरह फुटबाॅल मैच भी अब पूरी तरह सटोरियों की गिरफ्त में आ चुके हैं। अब समझना आसान होगा कि इन दिनों ब्राजील में बहुत ही तामझाम वाला, चकाचौंध वाला फुटबॉल कप आयोजित करने का क्या उद्देयश् है और जिन देशों की फुटबॉल टीम नहीं हैं, उनमें भी गली-मोहल्लों तक प्रचार करवाने का क्या महत्व है..? तो इसके पीछे एक ही कारण है, - सट्टा बाज़ार। जिस प्रकार क्रिकेट में दिन-प्रतिदिन टूर्नामेंट व ट्रॉफियों की संख्या आईपीएल जैसे कार्यक्रमों के रूप में बढ़ती जा रही है, ठीक उसी तरह फुटबॉल की सर्वोच्च संस्था के पदाधिकारी भी खेलों को विश्वस्तरीय बनाने में जुटे हैं ताकि बेतहाशा कमाई बढ़ सके। 2006 में ब्रिटिश पत्रकार एंड्रय् जेनिग्स ने किताब लिखकर फीफा अध्यक्ष जोसेफ ब्लैटर पर अनियमितताएं करने का अरोप लगया था। 78 बसंत देख चुके ब्लैटर अब भी अध्यक्ष पद के पांचपे कार्यकाल के लिए तैयारी कर रहे हैं। वहीं, एक अख़बार के संपादकीय के मुताबिक फीफा ने कतर को 2022 के विश्वकप का आयोजन देने के लिए उससे 50लाख डॉलर की रिश्वत ली थी। इसकी आय का भारत के सूचना के अधिकार के अधिनियम से पता नहीं लगाया जा सकता इसलिए यह शक्तिशाली लोगों की संस्था बन गई है। मनमाने ढंग से अंजाम दिए जाने वाली कार्यप्रणालियां इसका शगल बन गई हैं। उरुग्वे के पत्रकार का कथन है कि यह दुनिया का सबसे गुप्त साम्राज्य है।
अंत में, जब एक बार पैसा अपनी चकाचौंध दिखा देता तो अच्छे-अच्छे दिव्य लोचन वाले भी अपनी रौशनी खो बैठते हैं और सवार हो जाते हैं जहन्नुम की ओर ले जाते हुए इस जुनून रूपी हवाई जहाज में, बस फिर क्या सारे विवाद, बुराईयां, खामियां, ग़लतियां दफना दी जातीं हैं।