Pages

Monday, 16 June 2014



क्योंकि नीरज 'उदास' हूं मैं





पनों के, ग़ैरों के क़र्ज़ तले दबा उदास हूँ मैं

कोई न पहने वह लिबास हूँ मैं
ज़िन्दगी की तमाम इम्तेहानों में न पास हूँ मैं
कुछ दर्द है, कुछ चुभन है , इसलिए हताश हूँ मैं
कोई मुझसे पूछे कैसे हो ?, बोलूं फर्स्ट क्लास हूँ मैं
पर सब जानते नीरज 'उदास' हूँ मैं।।।





ता-अबद ताबानियाँ देने वाला चाँद हो या ख़ुर्शीद,

ताख़िर-औ-शाम से निकले वो तलाश हूँ मैं 
इस तरह गौर से न देखो, खाली गिलास हूँ मैं
न जाने कितने काइद आये और गए ग़ली-ए-मुल्क़ में
अपने अपनों के लिए मुहब्बत-ए-ख़ास हूँ मैं
पर सब जानते ही हैं नीरज 'उदास' हूँ मैं।।।




शिक्षक की क्लास, हंसोड़ो के लिए अट्टाहास हूँ मैं

जिसको खाते नहीं चौपाये, वह घास हूँ मैं
वैसे कोई मुझसे पूछे कि, कैसे हो ?
तो मैं बोलूं कि फर्स्ट क्लास हूँ मैं
पर सभी जानते नीरज 'उदास' हूँ मैं।।




पनों के, ग़ैरों के क़र्ज़ तले दबा 'बकवास' हूँ मैं

फिर भी फ़र्ज़ाने कहते चुप न होने वाला अल्फ़ाज़ हूँ मैं
कितनी भी वस्फ़ करो यारों, मानूंगा नहीं,
क्योंकि ता-अबद नाख़ुश रहने वाला नीरज 'उदास' हूँ मैं।।


मस्कार, 

प देख रहे हैं भारत के चैनलों के मुख्य समाचार

आपको दिखाने वाले हैं ख़बरें असरदार
कहीं जाइएगा नहीं, मेरा मतलब दूसरे चैनल पर
क्योंकि बस कुछ ही देर में आने वाली हैं ख़बरें मसालेदार
हम ही हैं यहां के न्यायापालिका और सरकार।



आने वाली है होली, न कीजिए पानी की बौझार
जब आए दिवाली तो न खाइए खोया-मावा 
क्योंकि हम लगवाएंगे आपके लिए ''डेयरी मिल्क के गिफ्ट पैक'' का बाज़ार
हम अभी लौट कर आते हैं, बने रहिए हमारे साथ 
क्योंकि हम ही सबसे ज्‍यादा समझदार।

न्यायपालिका ने ज़रूर बंद किया
लेकिन आज भी हम लगाते ''निर्मल दरबार''
हम ही हैं भारत के सर्वे-सर्वा
तभी तो कराते चुनावों में चमत्कार
जिसको हराना है हरा देंगे, जिसको जिताना है जिता देंगे
क्योंकि पोल-सर्वे सब होता हमारे ही घर-द्वार
तभी तो लोकतंत्र में होता चमत्कार
जनता चाहे न चाहे, पर हम ही बनाते चुनावी हवा
फिर बनती मनमाफिक सरकार॥

ख़शी हो, पर्व हो या हो त्यौहार
हर टाइम मौज़ूद हैं नकारात्मक समाचार
सब कुछ बिकता यहां धन-दौलत से
यहां कोई नहीं तलबग़ार- मददग़ार
खुलेआम देखिए बेशर्मी, नंगई और व्यभिचार
हमसे उम्मीद न कीजिए अच्छे विचार।

एक बार फिर आपको नमस्कार
अपराध, क्रिकेट, राजनीति और बॉलीबुड पर टिका हमारा बाज़ार
यही से चलता सटोरियों का सट्टा और सेक्स का व्यापार
जान लीजिए यहीं से तैयार होते हमारे समाचार॥

गर हम अंदरख़ाने की बात करें तो 
हमारे जगत में ग्लैमर अपरंपार
निष्पक्षता, ईमानदारी, शुचिता जैसी बातें
हम बेच चुके कईयों बार,
मसाला, गॉशिप, सेक्सी ख़बरें देना ज़रूरी
क्योंकि ऐसे ही चलता हमारा ख़बरी संसार॥

देर रात देखिए हमारे समाचार
तो 'संधि-सुधा तेल' के साथ पाइए 'चायनीज़ बाज़ार'
आपकी सेहत बिगड़े या सुधरे
भई, अपना तो चोखा व्यापार
अगर ख़बरें कतिपय कारणों से कम हों तो
तैयार रहता हमेशा पेड न्यूज़ का बाज़ार
कोई हमको क्या सिखाए और हमसे क्या कहे
क्योंकि हम ही यहां के न्यायपालिका और सरकार॥



                                                                                 - नीरज (स्वतंत्र अभिव्यक्ति)

Thursday, 12 June 2014

फुटबॉल का खेल


                                                                  - नीरज 


भारत में कितने लोगों को पता है कि फुटबॉल में कितने खिलाड़ी होते हैं ? कितने लोगों को पता है कि भारत टीम फीफा वर्ल्डकप में प्रतिनिधित्व कर रही है या नहीं ? ऐसे न जाने कितने सवाल पैदा होते हैं... लेकिन फिर भी देश के बड़े-बड़े अख़बार अपने 5-6 पेज इन ख़बरों में ख़पा रहे हैं और चैनलों के तो कहने ही क्या...। पहले मीडिया वह दिखती थी जिसे लोग देखना चाहते हैं लेकिन अब मीडिया जो दिखाती है उसे लोग देखते हैं। बमुश्किल सिविल सेवाओं व बैंक आदि की तैयारी करने वाले शिक्षार्थियों और खेल जगत से जुड़े लोगों को छोड़ दें तो शायद ही डेढ़ अरब की आबादी में से कुछ प्रतिशत लोग ही इस खेल के बारे में बता सकें। पत्रकारिता के विद्यार्थियों को बुलेट थ्योरी, फर्स्ट स्टेप, सेकेंड स्अेप जैसी थ्योरी समझाई जातीं हैं, जिनमें यही सब निहित है कि जबरदस्ती किसी बात को व्यूअर्स के दिमाग में कैसे पहुंचाएं, बस सब वही फंडा है। 
                                                                      



जब फीफा कप के मेजवान देश ब्राजील में खुद जनता इसके विरोध में सड़कों पर उतर आई है, जब भारतीय टीम इसमें प्रतिनिधित्व नहीं कर रही है, जब फीफा के आयोजनों व भ्रष्टाचार पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं तो फिर मीडिया रुपी पिस्टल से दर्शकों, पाठकों और श्रोताओं के भेजे में क्यों फीफा-फीफा ठूंसा जा रहा है ?? उरुग्वे के पत्रकार एडुआर्डाे गैलेएनो का कहना है कि, 'फीफा में नजर आने वोल और न नज़र आने वाले तानाशाह हैं। विश्व फटबॉल में सत्ता का ढांचा राजशाही जैसा है। यह दुनिया का सबसे गुप्त साम्राज्य है।'  एक तरफ भारत को दूरदर्शी प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम पटरी पर लाने को आतुर है, सरकार गरीब याानि दरिद्रनारायण की बात कर रही है वहीं, विलासिता के खेलों को जबरदस्ती बढ़ावा दिया जा रहा है। सालों पहले विज्ञापनों की भरमार से क्रिकेट को सर्वोपरि खेल बना दिया तो लगता है कि फुटबॉल का विश्वस्तरीय प्रचार-प्रसार करके उसी के समकक्ष खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। इतने तड़क-भड़क जोरशोर वाले प्रचार-प्रचार से एकबारगी तो ज़रूर लगता है कि फीफा के कर्ताधर्ताओं ने विश्व की सभी बड़ी पीआर(पब्लिक रिलेशन) एजेसियों को मुंहमांगा दाम देकर विश्व जगत की मीडिया के माध्यम से इसे अमीर-गरीब तक जबरदस्ती पहुंचाने का काम शुरू कर दिया है।  विकासशाील देशों के श्रेणी में खड़े भारत की हक़ीकत यह है कि फुटबाॅल के विश्व के सबसे पहले फीफा वर्ल्ड के दौरान भारतीय फुटबॉल टीम के पास विदेश जाने के लिए किराए के पैसे नहीं थे जबकि फीफा आयोजकों ने 70 प्रतिशत तक किराए की रकम चुकाने की बात कही थी लेकिन गरीबी इतनी कि आपको ताज्‍जुब होगा कि उनके पास खेल में प्रयुक्त हाेने वाले जूतों के लिए भी पैसे नहीं थे तो किराए की 30 प्रतिशत रकम भी कहां से लाते। अब अंदाजा लग जाता है कि हम किस स्थिति से निकल कर आए हैं।

                                      
अगर दूसरे चश्मे से फीफा वर्ल्ड पर नज़र डालें तो अच्छाईयां कम, बुराईयां -खामियां बेहद नज़र आतीं हैं। मेजवान ब्राजील फीफा-2014 के आयोजन पर करीब 11 अरब डॉलर खर्च करने वाला है। जिसका वहां निवासियों द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि इस पैसे से अस्पताल, भवन, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे तमाम जनोपयोगी कार्यों को अंजाम दिया जा सकता था लेकिन फीफा (फेडरेशन इंटरनेशनल डि फुटबॉल एसोसिएशन) के अध्यक्ष जोसेफ ब्लैटर का कहना है कि वे फुटबॉल के खेल को वे खेलों की दुनिया में ऊंचा दर्जा दिलवाएंगे और इन प्रदर्शनों से फीफा को कोई फर्क नहीं पड़ता। आज तक आईसीसी (इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल ) और बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) के कमाई राशि का पता नहीं चला कि इतना पैसा कहां जाता है ? और किस-किस जगह खर्च किया जाता है ? ठीक उसी तरह फुटबॉल की सबसे बड़ी संस्था फीफा भी मेजबान देश से खेलों की तैयारियों के लिए अधिक खर्चा कराकर उन्हें मामूली धनराशि देने में माहिर है। क्रिकेट की तरह फुटबाॅल मैच भी अब पूरी तरह सटोरियों की गिरफ्त में आ चुके हैं। अब समझना आसान होगा कि इन दिनों ब्राजील में बहुत ही तामझाम वाला, चकाचौंध वाला फुटबॉल कप आयोजित करने का क्या उद्देयश्‍ है और जिन देशों की फुटबॉल टीम नहीं हैं, उनमें भी गली-मोहल्लों तक प्रचार करवाने का क्या महत्व है..? तो इसके पीछे एक ही कारण है, - सट्टा बाज़ार। जिस प्रकार क्रिकेट में दिन-प्रतिदिन टूर्नामेंट व ट्रॉफियों की संख्या आईपीएल जैसे कार्यक्रमों के रूप में बढ़ती जा रही है, ठीक उसी तरह फुटबॉल की सर्वोच्च संस्था के पदाधिकारी भी खेलों को विश्वस्तरीय बनाने में जुटे हैं ताकि बेतहाशा कमाई बढ़ सके। 2006 में ब्रिटिश पत्रकार एंड्रय् जेनिग्स ने किताब लिखकर फीफा अध्यक्ष जोसेफ ब्लैटर पर अनियमितताएं करने का अरोप लगया था। 78 बसंत देख चुके ब्लैटर अब भी अध्यक्ष पद के पांचपे कार्यकाल के लिए तैयारी कर रहे हैं। वहीं, एक अख़बार के संपादकीय के मुताबिक फीफा ने कतर को 2022 के विश्वकप का आयोजन देने के लिए उससे 50लाख डॉलर की रिश्वत ली थी। इसकी आय का भारत के सूचना के अधिकार के अधिनियम से पता नहीं लगाया जा सकता इसलिए यह शक्तिशाली लोगों की संस्था बन गई है। मनमाने ढंग से अंजाम दिए जाने वाली कार्यप्रणालियां इसका शगल बन गई हैं। उरुग्वे के पत्रकार का कथन है कि यह दुनिया का सबसे गुप्त साम्राज्य है।

अंत में, जब एक बार पैसा अपनी चकाचौंध दिखा देता तो अच्छे-अच्छे दिव्य लोचन वाले भी अपनी रौशनी खो बैठते हैं और सवार हो जाते हैं जहन्नुम की ओर ले जाते हुए इस जुनून रूपी हवाई जहाज में, बस फिर क्या सारे विवाद, बुराईयां, खामियां, ग़लतियां दफना दी जातीं हैं। 

Thursday, 5 June 2014

केवल विरोध के लिए ही विरोध क्यों ?

(जनवरी २०१४ को आम आदमी पार्टी के कारिस्तानियेां पर मेरे द्वारा लिखा गया लेख )

दिल्ली वाली आम आदमी पार्टी के कानून मंत्री सोमनाथ भारती अपने कुछ समर्थकों के साथ 15 जनवरी की आधी रात एक घर पर छापा मारने से इनकार करने के बाद दिल्ली पुलिस के एसीपी से उनकी बहस हो गई। भारती का आरोप था कि उस इमारत से वेश्यावृत्ति और ड्रग्स की तस्करी का रैकेट चलता है। फिर तमाम बातें हुईं और कोर्ट ने भारती पर एफआईआर के आदेश दिए, लेकिन यहां बात उठाना लाज़मी होगा कि नाइजीरियाई और युगांडाई महिलाएं दिल्ली में इतने समय से क्या कर रहीं हैं ? उनके कमाई के स्त्रोत क्या हैं ? वे किस उद्देश्य से वहां रहतीं हैं ? भले ही उक्त महिलाओं के ड्रग्स सेवन की पुष्टि नहीं हुई हो पर इतनी संख्या में समर्थक और नेता ग़लती नहीं कर सकते, वे ज़रूर पुष्ट खुबर पर ही गए होंगे, हां उनकी ग़लती इतनी थी कि वे जबरन उनका चेकअप कराने एम्स ले गए और जिस ग़लती का हर्ज़ाना उन्हें चुकाना पड़ रहा है।

 जिस प्रकार विपक्षी पार्टियों द्वारा हाय-तौबा मचाई जा रही है वो ग़लत काम का विरोध है या केवल विरोध के लिए विरोध है । मैंने फेसबुक से ही पढ़ा था कि, दिल्ली के नेब सराय में बहुत से नाइजेरियन रहते हैं। इनके बारे में आस -पास के नागरिकों का मानना है कि वे 'धंधा ' करते हैं ---- जिस्म और ड्रग का धंधा। उनका यह भी मानना है कि वे अकेले में आदमी को मारकर खा जाते हैं। ऐसा खुद मुझे एक ऑटो वाले ने कहा था कि एक ऑटो वाले को वे अपने कमरे पर ले गए और वह कभी वापस नहीं लौटा। यह विचित्र धारणा बनती है उनके काले रंग और शारीरिक डील -डौल के कारण। यह धारणा बनती है बचपन से 'राक्षसों' के बारे में हमारे सामने बनाये गए इमेज से। गर ये सच है तो विपक्षी व समर्थन दे रही सरकार ने सर पर आसमां क्यों उठा लिया है ? अगर वेश्यावृत्ति या ड्रग सेवन की पुष्टि हो भी जाती तो विपक्षी शायद यही तर्क देते कि वे तो विदेशी है, महिलाएं है, हमारे मेहमान हैं, उनका जैसा देश, वैसा भेष वाला मामला है, कानून मंत्री कौन होते हैं विरोध करने वाले। फलां-फलां...........।

दिल्ली में आज जो महिलाओं, बेटियों पर फब्तियां कसने, छेड़खानी के जो हालात हैं वे इन्हीं सब कारणों से हैं। जब रोहिणी या अन्य पॉश इलाकों में रात के समय 'गे','वेश्याएं' एवं गंधर्व खड़े होते हैं तब कहीं से उनके आसपास कोई खानदानी औरत खड़ी हो जाए तो दरिंदे उसकी भी बोली लगा देते हैं, यहां तक कोई रात को अकेला निकल आएतो फब्तियां कसे बिना छोड़ते नहीं। और पुलिस तो हमेशा से ही मूक दर्शन बनी रही है, वो केवल सत्ता के इशारे पर कार्य करती है। जितना कहा जाता है बस उतना। पत्रकार पंकज गुप्ता बताते हैं कि, दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली तो कुख्यात व दरिंदों के लिए विख्यात जी.बी. ( गर्स्टीन बस्तन ) रोड पर वसूली से पता लगाई जा सकती है, जो रोड अजमेरी गेट से लहोरी गेट को जाता है। यहां पर दो तीन मंजिल की २०-२५ इमारतें हैं, जिनके ग्राउंड फ्लोर पर दुकानें हैं और ऊपर के फ्लोर्स पर सौ से ज्यादा कोठे बने हुये हैं। यह एक ऐसी जगह है जो हमारे देश की राजधानी दिल्ली में एक खास तथा दर्दनाक वजह से जानी जाती है । इस जगाह पर हज़ारो औरतें और बच्चे‍ देश के सभी भागों से जबरदस्ती या बहला फसला कर लाये जाते हैं और वेश्यावर्ती के दलदल में जबरदस्ती धकेल दिये जाते हैं। एक ऐसा दलदल जिसमे मासूम ज़िंदगिया बंद कोठरियों में सिसक- सिसक कर जीने पर मजबूर हैं। ये इलाका कमला मार्केट (अजमेरी गेट) थाने के अंदर आता है जिसमे एक SHO की नियुक्ति के लिये तीन से चार करोड़ रुपये ग्रह मंत्रालय को दिये जाते हैं, रिश्वत के रुप में।

अगर आलोचक 'आप' सरकार की कार्यप्रणाली की तुलना ''नायक'' फिल्म से कर रहे हैं तो उन्होंने नहीं देखा कि किस तरह से फिल्मी हीरो (मुख्यमंत्री) कॉलेज की लड़कियों के लिए गुंडों से लड़ता है, खुद पटक कर मारता है क्यों कि पुलिस वहां मंत्री,कार्यकर्ताओं के आगे बेबस थी और यहां पैसे व सिस्टम के आगे। अगर सिस्टम में सुधार लाना है तो खुद मैदान में आना होगा सियासतदांओं को। वरना खांटी सियासददां तो पुरानी स्टाईल में मलसों पर चिंता करके, चर्चा करके, चलता कर देने में ही भलाई समझते हैं।

पर क्या करें हमारे समाज ने मुख्यमंत्री, मंत्री उसी को देखा है जो केवल चकाचौंध में रहता है, जिसके कुर्ता-पज़ामा में हमेशा सिलवटें रहतीं हैं, जिसके बाजू में हमेशा 'बिसलरी' की बोतल होती है, लग्ज़री कार होती है, बड़ा बंगला होता है और लोगों से नहीं कार्यकर्ताओं से मिलता है। हमने इस तरह की व्यवस्था पहली बार देखी है इसलिए थोड़ा कन्फ्यूजया गए हैं। कोई बात नहीं जब टमाटर पहली बार विदेश से भारत आया था तो जनता बड़े कन्फ्यूजन में थी कि, कैसा होगा ? शायद मांस जैसा है ? फायदा करेगा या नुकसान ? जैसी तमाम बातें करती थी लेकिन आज टमाटर के बिना किसी भी घर में भोजन पूरा नहीं होता। ऐसे ही हाल नवोदित 'आप' पार्टी के हैं।......




नोट:- इस पोस्ट से मुझे गैंग्स ऑफ केजरीवाल का मेंबर न समझें।
मेरी पुरानी पोस्ट देखकर ही मेरे बारे में धारणा बनाएं और जो मुझे पार्टी विशेष का समर्थक समझे, वो मेरे ''ठेंगे'' से.........। 

आज की राजनीतिज्ञों को लेकर घर-घर में परिजनों ने ताना मारना शुरू कर दिए हैं। मैं जिस बस में यात्रा कर रहा था उसमें एक सास अपनी बहू के साथ मेरी पास वाली सीट पर बैठी थी। मुझे तब हंसी आई जब सास ने बहू से डपटते हुए कहा कि, '' केजरीवाल से कुछ तो सीखो, कैसा भी हो, पर बगैर पल्लू लिए घर से नहीं निकलता, तुम हो कि लाज पर्दा नहीं कर पातीं।'' 


बस से उतरा ही था कि मंज़िल तक जाने के लिए पहले से बुक एक ऑटो का सहारा लेना पड़ा। ऑटो में पहले से मां-बेटी बैठीं थीं, शायद उन्हें भी मेरी मंज़िल तक ही जाना था....। ऑटो वाले ने डबल फायदा कमाने के उद्देश्य से मुझे भी बिठा लिया। अब सवारी हुईं तीन। चलती ऑटो में मां बेटी की बातचीत बदस्तूर ऑटो की स्पीड से तेज थी, फिर भी शोर तो ऑटो का ही ज्यादा था। एक बार फिर हंसे बिना नहीं रह सका क्योंकि मां ने बेटी से कहा ही कुछ ऐसा।

बेटी ने जब किसी बात को लेकर मुंह फुला लिया तो मां ने कहा,-''बात-बात पर आडवानी की तरह गुस्सा हो जाती हो। हम मोदी, गडकरी और सुषमा की तरह नहीं हैं जो तुम्हें बार-बार मनाएंगे।''

फिर भी लोग कहते हैं कि महिलाओं को राजनीति में कम रुचि होती है।


-नीरज(स्वतंत्र अभिव्यक्ति)

''कहावत है कि एक बार ‛बनारस' में हास्य प्रेमी भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने ढिढोरा पिटवा दिया कि अमुक वैज्ञानिक अमुक समय पर चंद्रमा और सूरज को धरती पर उतार कर दिखयेंगे। नियत समय पर लोगों की भीड़ इस अद्भुत करिश्मे को देखने जमा हो गई। घंटों लोग इंतज़ार में बैठे रहे परन्तु वहां कोई वैज्ञानिक नहीं दिखाई दिया उस दिन 1 अप्रैल था, लोग मूर्ख बन कर वापस आ गए। 



अब बनारस वाले भी समझ चुके हैं कि जैसे अप्रैल का महीना शुरू होगा, वैसे ही मूर्ख बनाने का सिलसिला भी बदस्तूर सियासतदाओं द्वारा चलाया जायेगा। देश के एक अद्भुत,विचित्र और धार्मिक राजधानी में चहुँ ओर गन्दगी का साम्राज्य और उससे पटी तंग गलियाँ जब इतने सालों बाद भी चमक नहीं पाई तो अब उम्मीद मूर्ख बनने की उम्मीद ही की जा सकती है।।''











 


मध्यप्रदेश की ख़बरें तब दिखतीं हैं :-
 ***************************
  1. जब भोपाल क्षेत्र में कोई राजनीतिज्ञ बयान देता है या कोई राष्ट्रीय नेता आता है।
  2. जब छिंदवाड़ा क्षेत्र में कमलनाथ तथाकथित विकास के बारे में बोलते हैं।
  3. जब मालवा इंदौर क्षेत्र में जब विजयवर्गीय विवादास्पद बयान देते हैं या बॉलीबुड प्रमोशन हेतु आता है।
  4. जब पन्ना क्षेत्र में जब नया शेर-बाघ आता है, मर जाता है या शिकार हो जाता है।
  5. जब चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में सिंधिया का दौरा होता है या कोई अपराध-फर्जीबड़ा होता है।
  6. जब बालाघाट क्षेत्र में नक्सली दो अंकों की संख्या में लोगों को मौत के घाट नहीं उतार देते।
  7. जब बैतूल में किसी आदिवासी के साथ जघन्य अपराध नहीं हो जाता।

(नीरज स्वतंत्र अभिव्यक्ति)

पेट की ड्यूटी ने नहीं करने दी देश की ड्यूटी... 


वो अल्हड़, मस्तानी, मुस्कानी, शैतानी अदाओं के साथ इठलाती हुयी जैसे ही नाव (boat) से बहार क़दम रखती है, तभी हाथ में माइक थामें कला और संस्कृति बीट की एक प्रतिष्ठित समाचार चैनल की महिला रिपोर्टर उस युवा छोरी से पूछती है,- ''आप वोटिंग करने गए थे ??'' तभी अपनी हाज़िरजवाबी के साथ जस्ट चिल वाले अंदाज़ में जवाब देती है,-'' व्हाट इज़ वोटिंग ?? आई हैव आलरेडी बोटिंग !'' (मैं नाव की सवारी कर के आई हूँ। ) रिपोर्टर तुरंत थैंक्स बोलते हुए अपनी ड्यूटी पूरी करते हुए माइक की केवल और आईडी समेटती है और अपने दूसरे टारगेट की ओर यह सोचते हुए बढ़ जाती है कि यही युवा पीढ़ी फेसबुक, ट्विटर पर आज की राजनीती का मोर्चा संभाले हुए है और वोटिंग (मतदान) के नाम पर बोटिंग (नाव) से झीलों की सैर कर रहे है.. और फिर रिपोर्टर भी मन ही मन मंद मंद मुस्काती है युवाओं की इन करतूतों पर. तभी उसका उम्र में थोड़ा बुजुर्ग ड्राइवर महिला पत्रकार की मनभावनाओ को समझता हुआ कह ही देता है,-''मैडम, हम दूसरों से वोट देने की पूछ रहे हैं लेकिन हमें भी इस कमबख्त पेट की ड्यूटी ने देश की ड्यूटी नहीं करने दी। ''



- नीरज
 किरण वेदी होंगी दिल्ली की सीएम, गिरेंगी कई राज्यों की सरकारें 
 
पुष्ट सुत्रों से मिली ख़बर के मुताबिक पीएम पद पर नरेंद्र मोदी का राजतिलक होते ही दिल्ली की मुख्यमंत्री किरण वेदी को बनाया जायेगा. सूत्रों की मानें तो आरएसएस ने भी इसके लिए सहमति दे दी है, एवं उत्तराखंड, बिहार व जिन राज्यों में अल्पमत में सरकारें हैं उन पर भी भाजपा की नज़र है 

बताया जाता है कि उत्तरप्रदेश की सरकार को भी बर्खास्त करने का क़दम उठाया जा सकता है . इसकी पुष्टि भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अमित शाह खुद कर चुके हैं. भाजपा की अंदरुनी प्लानिंग के मुताबिक अगर कई राज्यों में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री होंगे तो केंद्र की बात मानेंगे और एक नया मॉडल देश के सामने केंद्र और राज्य मिलकर पेश करेंगे. जिसके चलते देख के उन तमाम हिस्सों व राज्यों में भी भाजपा अपना वज़ूद खड़ा कर सकेगी जहां अभी उसका नामोनिशान नहीं है. उत्तराखंड में जहां सतपाल महाराज को साथ लेकर बीजेपी कांग्रेस कि सरकार गिराने में और अपनी सरकार बनाने में सक्षम है वहीँ बिहार में भी अल्पमत का सामना कर रही नितीश सकरकर को भी साम, दाम, दंड, भेद कि राजनीति के जरिये गिराया जा सकता है .


- नीरज



                       बुलेट राजा' //परिणय/ /'रिवाल्वर रानी'

'बुलेट राजा' और 'रिवाल्वर रानी' के 'विवाह' में 'गुंडे', 'शैतान', और 'कमीने' 'तमंचे पे डिस्को' कर रहे थे, तभी वहां पहुंचे 'बदमाशों की 'कंपनी' में 'बेशर्म', फिर क्या था सैयां धांय...धांय..धांय..की 'धुन' पर 'नागिन डांस' की 'धूम' मचने लगी। 'बारात' में पहुंचे ''आर(रास्कल)....राजकुमार'' की 'मत मारी' कि 'हीरोपंती' देने लगा 'कमीने व शैतान' के सामने, 'बट पप्पू(रास्कल) कान्ट डांस साला'। 'विवाह' के दौरान दूल्हा बने 'बुलेट राजा' जहां कह रहे थे कि, 'आएंगे तो गर्मी बढ़ाएंगे' तो 'रिवाल्वर रानी' ने भी कह दिया कि, ' अब मर्द को दर्द होगा।' 'शादी के साइड इफेक्ट' तो यहीं दिखने लगे क्योंकि 'गली के सारे बांके' 'रिवाल्वर रानी को तांकने लग,' पर 'रानी' के 'तेवर' बुलंद थे। .............जारी है

नोट- फिल्मों के फूहड़ नाम व गानों से इसे जोड़कर न देखें॥

         
                                                             

                                                            yo yo मतलब '‛आपका अपना''


बॉलीवुड के शहंशाह शाहरुख जिसके एटिट्यूड के दीवाने हैं, दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला जिसके गानों पर ठुमका लगा चुकी हैं, हिन्दूवादी-समाजवादी तमाम वादी जिस रोमांसवादी से चुनावी माहौल में समर्थन के बोल चाहते हैं, किशोरवय लडके- लड़कियों की ज़िदगी की सोच उनके गीतों के बोल होते हैं, जिनके गीत-संगीत का बेशब्री से किशोरवय उम्र को इंतज़ार रहता है, जिनके 'ब्लू आइज़' गाने को रिकार्ड साढ़े 3 करोड़ लोग फॉलो कर चुके हैं, शायद ही कोई उस गबरू जवान पंजाबी मुंडे 'यो यो हनी सिंह' नामक शख्‍स से अनभिज्ञ हो। हां, हो सकता है कि यो यो का असली नाम 'हिरदेश सिंह' शायद ही कोई जानता हो॥

yours your's के लघुरूप से yo yo बना है, जिसका हिन्दी मतलब है-'आपका अपना।' लंदन हो या अमेरिका, वहां इन लफ्ज़ों का प्रचलन है, जिन्हें इस युवा ने अपने नाम के आगे जगह दी है। लंदन में शिक्षित पंजाब के युवा सिंगर व नवोदित एक्टर ने अपने नाम के आगे जब से yo yo जोड़ा है तब से बचपना हो या पचपना, हर उम्र वर्ग का दर्शक उन्हें यो यो नाम से पुकारते हैं। yo yo हनी सिंह का कहना है कि, 'उक्त संबोधन से मुझे एक अलग एनर्जी महसूस होती है।' 

23 एल्बम्स में अपनी आवाज़ देने वाले, 25 गीत ख़ुद व 26 गीत साथियों के साथ गा चुके हनी सिंह अब पहली हिन्दी फिल्म 'The Xpose' में बतौर अभिनेता पदार्पण करेंगे। इससे पहले वे 'Mirza - The Untold Story', T'u Mera 22 Main Tera 22' पंजाबी फिल्मों में कलाकार की भूमिका निभा चुके हैं।

यंगस्टर्स के लिए ये वही 'आपके अपने' yo yo Honey singh हैं जाे अपने गीत-संगीत कला में 'लोनली-लोनली' रहकर 'बॉस' व थलाईवा के साथ ''पार्टी ऑल नाइट' व 'पार्टी विद भूतनाथ' में 'चार बोतल वोदका' पीकर लुंगी डांस' कर चुके हैं। 


- नीरज चौधरी

भय बिनु होत न प्रीति !
----------------
मोदी के भारतीय सत्ता में आने की आहट से पाकिस्तान किस प्रकार खौफज़दा है कि लाहौर, इस्लामाबाद, कराची और पेशावर समेत पाकिस्तानी शहरों के कई ज़िम्मेदार व गणमान्य लोग भारतीय शुभचिंतकों से पूछ रहे हैं कि वाकई मोदी प्रधानमंत्री बने तो क्या पाकिस्तान पर हमला बोल देंगे ? 
भारतीय विदेश नीति परिषद् के अध्यक्ष व वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक से जब यह सवाल वहां की आवाम ने दागे तो वैदिक जी ने जवाब दिया कि, ‛चुनावी माहौल में वोट वटोरने की ख़ातिर सभी उम्मीदवार उत्तेजक और आकर्षक बातें करते हैं। उन बातों को ज़रा चबा-चबाकर निगलना चाहिए। जहाँ तक आक्रमण का सवाल है तो मोदी ने अभी तक इस बारे में कोई बयान नहीं दिया है। लेकिन अब क्योंकि मोदी का भय अपने आप फैल रहा है, तो उम्मीद की जाती है कि पाकिस्तान के उग्रवादी तबकों पर लगाम लगेगी। इससे वहाँ की लोकतान्त्रिक सरकार भी मज़बूत होगी और भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध भी सुधरेंगे।'

एक सामाजिक कार्यकर्ता ने एक विस्थापित व्यक्ति से पूछा :- तुम ज़रूरत पड़ने पर हमसे मदद मांगने आते हो, लेकिन चुनावों में उन्हीं राजनेताओं को वोट क्यों देते हो ?
उसने जो जवाब दिया, वह दिलचस्प है। उसने कहा :- ‛जब मामला ज़िन्दगी और मौत का हो जाता है, तभी हम तुम्हारे पास आते हैं। यह वोट देने से अलग मामला है। वोट देने का मतलब है, अपने लिए रोजगार, राशन, बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करने के लिए किसी प्रतिनिधि को चुनना और यह काम राजनेता सही ढंग से कर सकते हैं। 
उसने कहा :-एक सामाजिक कार्यकता का आदर्शवाद केवल रोजमर्रा की समस्याएं सुलझाने में बाधक साबित होता है। इसके लिए हमें आदर्शवादियों की ज़रूरत नहीं, व्यावहारिक लोगों की ज़रूरत होती है। सामाजिक सुधारों में काम लगता है, जबकि राजनय तुरत-फुरत में काम करना जानते हैं।
–----------------------------
अंत में, अब सामाजिक कार्यकर्ताओं से सत्ता सँभालने की उम्मीद कैसे करें ? वे बहुत ही आदर्शवादी,न्यायवादी और ईमानदार होते हैं, जो सत्ता के लिए सही नहीं।

सरकार गेंदा फूल

--------------------
जब तपती दोपहर में जब लालू प्रसाद यादव की चुनावी सभा में छुटभैए नेता दूसरों को कोसने में व गरीबों को सब्जबाद दिखा रहे थे, तब वहां देश के ख्यातिलब्ध पत्रकार रवीश कुमार दूर खड़ी महिलाओं से समस्याएं जान रहे थे। ‘इ का गोबर लगाया है, एक महिला का हाथ देखकर रवीश कुमार ने पूछा।’ महिला का कहना था, ‘नाही गेंदा है..गेंदा फूल का लेप है।’ काहे..क्या हुआ ?, रवीश ने पूछा।’ महिला -‘घाव हुआ है।’


आजादी के कई दशकों के बाद भी देश के कई हस्सों की ऐसी ही हालत है। ये तो बस एक उदाहरण है.. मजमून है..उस तंग, भ्रष्ट व्यव्स्था का। अरबों -खरबों रुपए चुनावी रैलियों में फूंकने वाले..सरकार बनाने के बाद खबरों रुपए का स्वास्थ्य बजट बनाने वाले...सियासतदांओं को जब छींक भी आत है तो वे विदेश चले जाते हैं लेकिन उस तंगहाल गरीब के हाथ में क्या ..।

आखिर वोट ही देता है... और देता क्या है..। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हो जिला अस्पताल ..सबके मुखिया ऊपर तक कमाई करके देते हैं दवाईयों से...तो बस, अब चुनाव आएंगे तो उसी कमाई से एक झटके में मुर्गा-दारू से वोट कबाड़ लिए जाएंगे..आखिरकार मीडिया तो है अच्छी-बुरी छवि बनाने के लिए..।..रही बात आवाम के स्वास्थ्य की.. अगर वो ही मजे में रहेंगी तो सियासतदाओं और गरीब में क्या फर्क रहेगा..। निकम्मे, निठल्ले तथाकथित ऐसे सत्ता प्रमियों व उनकी सत्ता पर फिल्म ‘दिल्ली-6’ का गाना ससुराल गेंदा फूल की जगह ‘आवाम गाली देवे , मीडिया वाले समझा लेवें, सरकार गेंदा फूल’ सटीक बैठता है।
आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले
---------------------------------------------------
वरिष्‍ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने अपने एक लेख में लिखा है कि मोदी ने 282 सीटें दिलाकर भाजपा की एेतिहासिक विजय का तो इतिहास रचा ही है, साथ में कांग्रेस को 44 के अंक पर पहुंचाकर हार को भी ऐतिहासिक बना दिया है. कहा भी गया है कि 'आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले' 
यह मत्ला आख़री मुगल बादशाह बहादुर शाह’ज़फ़र’ के ज़माने के शायर मिर्ज़ा मुहम्मद अली "फ़िदवी’ का है जो मिर्ज़ा "हज्व’ के नाम से भी मशहूर थे .पूरा शेर यूँ है

''चल साथ कि हसरत दिल-ए-महरूम से निकले
आशिक़ का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले''


मई की भयंकर गर्मी में उनींदा सा, कुछ हैरान सा अविनाश रुमाल से माथा पोंछते हुए अपने घर के दरवाजे को खटखटाता है, तभी एकदम से पिताजी दरवाजा खोलते हुए, ‘कैसा रहा आज का पर्चा (परीक्षा)’ अविनाश से पूछते हैं। पेेपर पिताजी के हाथ में थमा आगे बढ़ता हुआ अविनाश फ्रिज खोलकर शीतल जल से भरी बोतल का एक घूंट गटकने के तुरंत बाद सधा हुआ जबाव देता है, ‘हां, अच्छा रहा।’ ‘वो तो रिजल्ट आने पर ही पता चलेगा’, पिताजी का भी दो टूक प्रत्युत्तर मिला। आखिर मिले भी क्यों न, हमेशा कम अंकों के साथ बोर्डर पर पास जो होता था दोस्तों का मस्तमौला, हरफनमौला अविनाश। पिताजी ने डपटते हुए पास बुलाया और ऐनक (स्पैक्स) आंखों पर चढ़ाते हुए हिंदी के पर्चे का पहला प्रश्न के बारे में अविनाश से पूछना शुरू किया तभी रसोई से मां की आवाज आती है, ‘बेटा! जल्दी हाथ-मुंह धो ले, खाना परोस दिया।’ मां भी भलीभांति परिचित थी कि पिताजी उसी पर्चे की दूसरी परीक्षा घर पर ले लेंगे और मूल्यांकन भी कर देंगे। आज का दिन जैसे-तैसे बीता लेकिन फिर वही दो दिन की अवकाश के बाद दूसरी परीक्षा देकर लौटा लेकिन उस दिन पिताजी नहीं थे तो हाल-फिलहाल सवाल-जवाबों से बच निकला। परन्तु रात को पिताजी आते हैं और सबसे पहला सवाल होता है,‘ अविनाश का कैसा पेपर रहा ?’ मां-‘अच्छा रहा’, पिताजी का मन नहीं माना और कम्प्यूटर पर चैटिंग करते अविनाश को डपटते हुए,‘ अभी और परीक्षा बाकी है, तुम्हारा मन नहीं भरेगा इससे। कुछ चैट-सैट गर्मियों के लिए छोड़ दो बदतमीज।’ फिर पूछते हैं,‘ आज कैसा रहा पर्चा।’ अविनाश का कडक़ जवाब -‘‘वो तो रिजल्ट आने पर ही पता चलेगा।’ उखड़ते हुए पिताजी, विद्यार्थी को अपना परिणाम परीक्षा हल कर करते समय ही पता चल जाता है, परीक्षा परिणाम की घोषणा तो महज सरकारी औपचारिकता है.... करो मन की.... यह कहकर चल दिए।

- नीरज चौधरी