मई की भयंकर गर्मी में उनींदा सा, कुछ हैरान सा अविनाश रुमाल से माथा पोंछते हुए अपने घर के दरवाजे को खटखटाता है, तभी एकदम से पिताजी दरवाजा खोलते हुए, ‘कैसा रहा आज का पर्चा (परीक्षा)’ अविनाश से पूछते हैं। पेेपर पिताजी के हाथ में थमा आगे बढ़ता हुआ अविनाश फ्रिज खोलकर शीतल जल से भरी बोतल का एक घूंट गटकने के तुरंत बाद सधा हुआ जबाव देता है, ‘हां, अच्छा रहा।’ ‘वो तो रिजल्ट आने पर ही पता चलेगा’, पिताजी का भी दो टूक प्रत्युत्तर मिला। आखिर मिले भी क्यों न, हमेशा कम अंकों के साथ बोर्डर पर पास जो होता था दोस्तों का मस्तमौला, हरफनमौला अविनाश। पिताजी ने डपटते हुए पास बुलाया और ऐनक (स्पैक्स) आंखों पर चढ़ाते हुए हिंदी के पर्चे का पहला प्रश्न के बारे में अविनाश से पूछना शुरू किया तभी रसोई से मां की आवाज आती है, ‘बेटा! जल्दी हाथ-मुंह धो ले, खाना परोस दिया।’ मां भी भलीभांति परिचित थी कि पिताजी उसी पर्चे की दूसरी परीक्षा घर पर ले लेंगे और मूल्यांकन भी कर देंगे। आज का दिन जैसे-तैसे बीता लेकिन फिर वही दो दिन की अवकाश के बाद दूसरी परीक्षा देकर लौटा लेकिन उस दिन पिताजी नहीं थे तो हाल-फिलहाल सवाल-जवाबों से बच निकला। परन्तु रात को पिताजी आते हैं और सबसे पहला सवाल होता है,‘ अविनाश का कैसा पेपर रहा ?’ मां-‘अच्छा रहा’, पिताजी का मन नहीं माना और कम्प्यूटर पर चैटिंग करते अविनाश को डपटते हुए,‘ अभी और परीक्षा बाकी है, तुम्हारा मन नहीं भरेगा इससे। कुछ चैट-सैट गर्मियों के लिए छोड़ दो बदतमीज।’ फिर पूछते हैं,‘ आज कैसा रहा पर्चा।’ अविनाश का कडक़ जवाब -‘‘वो तो रिजल्ट आने पर ही पता चलेगा।’ उखड़ते हुए पिताजी, विद्यार्थी को अपना परिणाम परीक्षा हल कर करते समय ही पता चल जाता है, परीक्षा परिणाम की घोषणा तो महज सरकारी औपचारिकता है.... करो मन की.... यह कहकर चल दिए।
- नीरज चौधरी
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