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Thursday, 5 June 2014

केवल विरोध के लिए ही विरोध क्यों ?

(जनवरी २०१४ को आम आदमी पार्टी के कारिस्तानियेां पर मेरे द्वारा लिखा गया लेख )

दिल्ली वाली आम आदमी पार्टी के कानून मंत्री सोमनाथ भारती अपने कुछ समर्थकों के साथ 15 जनवरी की आधी रात एक घर पर छापा मारने से इनकार करने के बाद दिल्ली पुलिस के एसीपी से उनकी बहस हो गई। भारती का आरोप था कि उस इमारत से वेश्यावृत्ति और ड्रग्स की तस्करी का रैकेट चलता है। फिर तमाम बातें हुईं और कोर्ट ने भारती पर एफआईआर के आदेश दिए, लेकिन यहां बात उठाना लाज़मी होगा कि नाइजीरियाई और युगांडाई महिलाएं दिल्ली में इतने समय से क्या कर रहीं हैं ? उनके कमाई के स्त्रोत क्या हैं ? वे किस उद्देश्य से वहां रहतीं हैं ? भले ही उक्त महिलाओं के ड्रग्स सेवन की पुष्टि नहीं हुई हो पर इतनी संख्या में समर्थक और नेता ग़लती नहीं कर सकते, वे ज़रूर पुष्ट खुबर पर ही गए होंगे, हां उनकी ग़लती इतनी थी कि वे जबरन उनका चेकअप कराने एम्स ले गए और जिस ग़लती का हर्ज़ाना उन्हें चुकाना पड़ रहा है।

 जिस प्रकार विपक्षी पार्टियों द्वारा हाय-तौबा मचाई जा रही है वो ग़लत काम का विरोध है या केवल विरोध के लिए विरोध है । मैंने फेसबुक से ही पढ़ा था कि, दिल्ली के नेब सराय में बहुत से नाइजेरियन रहते हैं। इनके बारे में आस -पास के नागरिकों का मानना है कि वे 'धंधा ' करते हैं ---- जिस्म और ड्रग का धंधा। उनका यह भी मानना है कि वे अकेले में आदमी को मारकर खा जाते हैं। ऐसा खुद मुझे एक ऑटो वाले ने कहा था कि एक ऑटो वाले को वे अपने कमरे पर ले गए और वह कभी वापस नहीं लौटा। यह विचित्र धारणा बनती है उनके काले रंग और शारीरिक डील -डौल के कारण। यह धारणा बनती है बचपन से 'राक्षसों' के बारे में हमारे सामने बनाये गए इमेज से। गर ये सच है तो विपक्षी व समर्थन दे रही सरकार ने सर पर आसमां क्यों उठा लिया है ? अगर वेश्यावृत्ति या ड्रग सेवन की पुष्टि हो भी जाती तो विपक्षी शायद यही तर्क देते कि वे तो विदेशी है, महिलाएं है, हमारे मेहमान हैं, उनका जैसा देश, वैसा भेष वाला मामला है, कानून मंत्री कौन होते हैं विरोध करने वाले। फलां-फलां...........।

दिल्ली में आज जो महिलाओं, बेटियों पर फब्तियां कसने, छेड़खानी के जो हालात हैं वे इन्हीं सब कारणों से हैं। जब रोहिणी या अन्य पॉश इलाकों में रात के समय 'गे','वेश्याएं' एवं गंधर्व खड़े होते हैं तब कहीं से उनके आसपास कोई खानदानी औरत खड़ी हो जाए तो दरिंदे उसकी भी बोली लगा देते हैं, यहां तक कोई रात को अकेला निकल आएतो फब्तियां कसे बिना छोड़ते नहीं। और पुलिस तो हमेशा से ही मूक दर्शन बनी रही है, वो केवल सत्ता के इशारे पर कार्य करती है। जितना कहा जाता है बस उतना। पत्रकार पंकज गुप्ता बताते हैं कि, दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली तो कुख्यात व दरिंदों के लिए विख्यात जी.बी. ( गर्स्टीन बस्तन ) रोड पर वसूली से पता लगाई जा सकती है, जो रोड अजमेरी गेट से लहोरी गेट को जाता है। यहां पर दो तीन मंजिल की २०-२५ इमारतें हैं, जिनके ग्राउंड फ्लोर पर दुकानें हैं और ऊपर के फ्लोर्स पर सौ से ज्यादा कोठे बने हुये हैं। यह एक ऐसी जगह है जो हमारे देश की राजधानी दिल्ली में एक खास तथा दर्दनाक वजह से जानी जाती है । इस जगाह पर हज़ारो औरतें और बच्चे‍ देश के सभी भागों से जबरदस्ती या बहला फसला कर लाये जाते हैं और वेश्यावर्ती के दलदल में जबरदस्ती धकेल दिये जाते हैं। एक ऐसा दलदल जिसमे मासूम ज़िंदगिया बंद कोठरियों में सिसक- सिसक कर जीने पर मजबूर हैं। ये इलाका कमला मार्केट (अजमेरी गेट) थाने के अंदर आता है जिसमे एक SHO की नियुक्ति के लिये तीन से चार करोड़ रुपये ग्रह मंत्रालय को दिये जाते हैं, रिश्वत के रुप में।

अगर आलोचक 'आप' सरकार की कार्यप्रणाली की तुलना ''नायक'' फिल्म से कर रहे हैं तो उन्होंने नहीं देखा कि किस तरह से फिल्मी हीरो (मुख्यमंत्री) कॉलेज की लड़कियों के लिए गुंडों से लड़ता है, खुद पटक कर मारता है क्यों कि पुलिस वहां मंत्री,कार्यकर्ताओं के आगे बेबस थी और यहां पैसे व सिस्टम के आगे। अगर सिस्टम में सुधार लाना है तो खुद मैदान में आना होगा सियासतदांओं को। वरना खांटी सियासददां तो पुरानी स्टाईल में मलसों पर चिंता करके, चर्चा करके, चलता कर देने में ही भलाई समझते हैं।

पर क्या करें हमारे समाज ने मुख्यमंत्री, मंत्री उसी को देखा है जो केवल चकाचौंध में रहता है, जिसके कुर्ता-पज़ामा में हमेशा सिलवटें रहतीं हैं, जिसके बाजू में हमेशा 'बिसलरी' की बोतल होती है, लग्ज़री कार होती है, बड़ा बंगला होता है और लोगों से नहीं कार्यकर्ताओं से मिलता है। हमने इस तरह की व्यवस्था पहली बार देखी है इसलिए थोड़ा कन्फ्यूजया गए हैं। कोई बात नहीं जब टमाटर पहली बार विदेश से भारत आया था तो जनता बड़े कन्फ्यूजन में थी कि, कैसा होगा ? शायद मांस जैसा है ? फायदा करेगा या नुकसान ? जैसी तमाम बातें करती थी लेकिन आज टमाटर के बिना किसी भी घर में भोजन पूरा नहीं होता। ऐसे ही हाल नवोदित 'आप' पार्टी के हैं।......




नोट:- इस पोस्ट से मुझे गैंग्स ऑफ केजरीवाल का मेंबर न समझें।
मेरी पुरानी पोस्ट देखकर ही मेरे बारे में धारणा बनाएं और जो मुझे पार्टी विशेष का समर्थक समझे, वो मेरे ''ठेंगे'' से.........। 

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