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Friday, 19 December 2014

सलकनपुर : अलौकिक और आनंदमय अवस्थिति



नीरज चौधरी 
इसे संयोग कह लीजिए या मज़बूरी। जहां तक मुझे याद है कि, मैं उमर के बाइस बरस में अगर कहीं घूमने गया हूं तो वो जगह धर्मिक स्थल ही रही होगी। बीते मंगलवार की रात को ही मित्र अमरेन्द्र का संदेश आया कि, तुझे कल हमारे साथ सलकनपुर के देवी मंदिर चलना है, वो भी सुबह 7 बजे घर से निकलना है। अब बात संदेश कम आदेश ज़्यादा हुई, इसलिए भोपाल से 70 किमी दूर सलकनपुर में देवी मंदिर जाने का कार्यक्रम तय करना पड़ा। बुधवार सुबह 6 बजे ही मेरे बहुमुखी प्रतिभा के धनी दूरभाष ने मुझे जगाने के लिए कंपन्न करना और गाने गाना शुरू कर दिया, लेकिन रज़ाई की  गर्मागरम दुनिया से बाहर की सर्दीले संसार में क़दम रखने का भी मन नहीं कर रहा था। फिर भी मुझे इतना पता था कि जिन आठ जवानों को यात्रा पर जाना है, वे कदापि पौ फटने के पहले नहीं जाग सकते। उसके बावज़ूद भी मैं उठ ही गया। निकलते-निकलते हम आठों साथी चार मोटरसाइकिलों पर सवार होकर साढ़े नौ बजे मध्यप्रदेश की राजधानी से निकल सके..जैसा कि पहले से विदित था।  वो तो अच्छा हुआ कि सुबह सात बजे जाने का कार्यक्रम तैयार किया, अगर नौ बजे का किया होता तो शायद ही भोपाल से निकल पाते, क्योंकि तब तक शाम हो चुकी होती।

खै़र, लंबे समय पश्चात् उस युवा तरुणाई ने अपनी उमंगों के साथ-साथ् गाडि़यों को भी तेज़ रफ़्तार देना शुरू कर डालीं। चंद मिनिटों में दूसरे जि़ले रायसेन की सीमा के मंडीदीप में पहुंच गए और कुछ ही पल में सीहोर जिले की सीमा में प्रवेश कर गए। सूनी रोड, उस पर हवा से बातें करतीं चार माटरसाईकिलें और चौतरफा प्रकृति का सौंदर्य अपने आप में अनोखा था। नागिन की तरह काली और लहराती हुईं सडकें सवार और सवारियों के मन को मोहने में कोई क़सर नहीं छोड़ रही थी और उन सड़कों पर स्वागत की मुद्रा में झुके हुए पेड़। वाह !! 
मां बिजासेन देवी, सलकनुपर   फोटो-नीरज

सलकनपुर गांव की बात करें तो यह मध्यप्रदेश के सीहाेर जिले की बुधनी विधानसभा के अंतर्गत एक गांव हैं। बुधनी विधानसभा से ही प्रदेश के मुख्यमंत्री श‍िवराज सिंह चौहान विधायक हैं। सलकनपुर में 800 फीट ऊंची पहाड़ी पर एक मंदिर स्थ‍ित है, इस मंदिर में मां बिजासन देवी विराजमान हैं।सलकनपुर में विराजी सिद्धेश्वरी मां विजयासन की ये स्वयंभू प्रतिमा माता पार्वती की है जो वात्सल्य भाव से अपनी गोद में भगवान गणेश को लिए हुए बैठी हैं. इसी मंदिर में महालक्ष्मी, महासरस्वती और भगवान भैरव भी विराजमान हैं यानी इस एक मंदिर में कई देवी-देवताओं के आशीर्वाद का सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है.

पुराणों के अनुसार देवी विजयासन माता पार्वती का ही अवतार हैं, जिन्होंने देवताओं के आग्रह पर रक्तबीज नामक राक्षस का वध कर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की थी. देवी विजयासन को कई भक्त कुल देवी के रूप में पूजते हैं. मां जहां एक तरफ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे जीवनसाथी का आशीर्वाद देती हैं. वहीं संतान का वरदान देकर भक्तों की सूनी गोद भर देती हैं. तभी तो देवी के इस धाम का महत्व किसी शक्तिपीठ से कम नहीं हैं.मां के इस दरबार में भक्‍त की कोई पुकार कभी अनसुनी नहीं रहती, राजा हो या रंक, मां सभी पर एक समान कृपा बरसाती हैं. भक्तों के बढ़ते हुए कदम जैसे ही इस धाम की परिधि को छूते हैं पूरा शरीर मानो मां भगवती की शक्ति से भर उठता है, क्योंकि ये वो जगह है जहां मां विजयासन सुंदर पहाड़ पर अपने परम दिव्य रूप में आसिन हैं. जगत जननी का ये वो धाम है जो जगत भर में सलकनपुर वाली मां विजयासन के नाम से प्रसिद्ध है.


 यहां से नर्मदा मैया का घाट भी महज़ 12 किमी की दूरी पर है। मंदिर की 800 फीट की ऊंचाई  तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं। एक रास्ता 1400 सीढि़यों से और दूसरा 4 किमी की दूरी तय करके सड़क मार्ग से होकर मंजि़ल तक पहुंचाता है । हालांकि, भक्तों  के लिए रोप-वे भी प्रारंभ किया गया है।
मैं टॉवर से नीचे उतरते हुए    फोटा- रवि


बहरहाल, अपने मित्रों रवि, शैलेष, अमरेन्द्र, आकाश, विजेन्द्र, दुर्गेेश और राहुल के साथ जब रायसेन जिले की सीमा को पार करते हुए सीहोर जि़ले की सीमा में प्रवेश किया तो मोटरसाईकिलें चमचमाती सड़कों को देखकर तेज़ से भी तेज़ दौड़ने लगीं। बाइक तेज़ दौड़ाने का भी एक अपना  एक कारण था, क्योंकि  एक ट्रक हमें चैलेंजित कर रहा था। उस ट्रक पर पीछे लिखा था-''डिपर मत मार ज़ालिम, तमन्ना हम भी रखते हैं-तुम सत्तर चलते हो तो क्या, हम भी अस्सी चलते हैं।।'' फिर क्या...तेज़ गति से मेरी रामप्यारी (बाइक) भी दौड़ने लगी। लेकिन अचानक मैं देखता हूं कि, रास्ते में रेलवे क्रांसिग का फाटक बंद है। रेल के इंतज़ार में फाटक वाहनों को रोकने के लिए आड़ा आ गया था.. मैंने बाइक की रफ्तार धीमी की और एक लाेडिंग गाड़ी के पीछे रोक ली। लग रहा था जैसे बाइक भी रेल को धन्यवाद दे रही हो कि, बहन तेरे कारण मैं थोड़ा सांस भी ले पाई हूं, नहीं तो न जाने आज मेरा क्या हश्र करते ये कम्बखत, भोपाल से दौड़ाते ला रहे हैं। अचानक ही मेरी नज़र लोडिंग के पीछे लिखे अमर वचन पर पड़ गई। जिसे पढ़ने के बाद मैंने गंतव्य स्थल तक बहुत ही औसत गति से बाइक चलाई, क्योंकि उसके पीछे लिखा ही कुछ ऐसा था। वो अमर वचन थे-''धीरे चलोगे तो बार-बार मिलेंगे और तेज़ चलोगे तो हरिद्वार मिलेंगे।'' बस, फिर क्या धीरे चलने पर भी हम आठों रातापानी अभयारण्य के नज़दीक एक पहुंचे जहां एक ऊंचे टॉवर चढ़कर दुनिया को देखने की चेष्टा करने लगे। क़सम से  कोहरे से लिपटे सघन, आच्छादित, घने वनों को जब इतनी ऊंचाई से  निहारा तो नीचे उतरने का मन ही नहीं कर रहा था।



राजेन्द्र माहेश्वरी,      फोटो- नीरज

 इतने में राजेन्द्र माहेश्वरी नाम के सज्जन आए और कहने लगे कि आओ ! मेरे पीछे तुम्हें लंगूरों और बंदरों से मिलवाता हूं। जब हम उने साथ उस घने जंगल में पहंचे और देखते हैं कि, सैंकडों बंदर और लंगूर उस मानव से लिपटने को आतुर थे। इतना वात्सल्य, प्रेम, आत्मीयता शायद ही मनुष्य की मनुष्य के प्रति देखने को मिले, लेकिन उन जीवों का उस मानव के प्रति अटूट और अकूत स्नेह है। पूछने पर राजेन्द्र नाम के उस शख़्स ने बताया कि, ''मैं हर शनिवार को करीब 200 रोटियां इन बंदरों और लंगूरों को ख‍िलाता हूं। उन्होंने बताया कि, पिछले रविवार को मैं इन्हें रोटियां ख‍िलाने से चूक गया, क्योंकि इसी जगह (सड़क किनारे) दो बाघ आकर बैठ गए थे और यहां से बाघ का श‍िकार करके ले गए। इसलिए मैं दूर से देखता रहा।'' राजेन्द्र ने बताया कि, मैं पास में ही टाइगर रिसोर्ट में रहता हूं और आप मुझे फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो कर सकते हो घने जंगल में जंगली जीवों से प्यार करने वाला यह शख़्स संचार के साधनों से भी बाकायदा अद्यतन रहता है। यात्रा में करते समय हम पत्रकारिता के छात्रों को कुछ नया जानने की भी तीव्र लालसा थी। इसीलिए हमारी नज़र हर उस बात पर थी, जिससे कुछ नया सीखने और देखने को मिले।

मोबाइल चार्ज करने का सौर ऊर्जा चलित यंत्र   फोटो-नीरज

 इसी कड़ी में हमने सीहोर जि़ले के ही एक गांव केसलवाड़ा में एक झोपड़ी के बाहर सौर ऊर्जा से चलित एक चाइनीज़ यंत्र देखा, जो रात को उजाला भी देता है और मोबाइल भी चार्ज करता है। हम समझ चुके थे कि दुनिया बहुत आगे पहुंच चुकी है, इसलिए हम भी अब ज़्यादा समय बीच राह में व्यतीत न करते हुए आगे की ओर निकल पड़े। आख़िरकार, हम आठों मित्र अपने गंतव्य स्थल सलकनपुर पहुंच चुके थे। पार्किंग में अपनी मोटरसाईकिलें खड़ी करने के बाद एक मित्र ने दुकानदार से पूछा कि भैया, ऊपर चढ़ने के लिए कितनी सीढि़यां हैं।



अमरेन्द्र, राहुल, विजेन्द्र, आकाश, रवि, नीरज, दुर्गेश     फोटो- शैलैष


 दुकानदार,''भैया, चौदह सौ सी‍ढि़यां हैं।'' दुकानदार ने इतना कहा और सब दूसरे की तरफ देखने लगे। सोच रहे थे कि, कोई हिम्मत बंधाएगा या फिर चार किमी के सड़क वाले रास्ते से जाने का बोलेगा, लेकिन सब एक सुर में बोले - चलो, यार माता के मंदिर में तपस्या करके पहुंचेंगे तो मन्नत पूरी होगी। अब सीढि़यां चढ़ना शुरू हुए तो महज़ सौ सीढि़यों में ही सब जवानों की सांस फूल गई, लेकिन स्कूल-कॉलेज वाली प्रतियोगिता वाली भावना ऊपर खींचे जा रही थी। हर किसी में सबसे पहले ऊपर पहुंचने की जि़द। सीढि़यां भी टू-वे थीं। एक तरफ जाने और एक तरफ से आने की। एक-एक सीढ़ी चढ़ते वक्त़ अहसास हो रहा था कि जब इन पत्थर की सीढि़यों को चढ़ने में इतनी ताक़त, ज़ोर और दृढ़ता की ज़रूरत पड़ती है तो जि़दगी की सीढि़यां  चढ़ना कितना कठिन होगा। खै़र, तमाम मशक्कत के बाद हम 800 फीट ऊपर पहुंचे और देवीकेअलौकिक, अप्रतिम, अद्वितीय, अतिसुंदर स्थल देखते ही सारी हरारत-थकावट पल में मानो छू हो गई। मां के दर्शन के पश्चात् लंबी-चौड़ी पहाड़ी का मुआयना किया और पहाड़ी के पिछले हिस्से की तराई में हम आठों मित्र उतर गए, जहां भी एक शंकर जी कां मंदिर और सैंकडों लंगूरों की टोली आक्रमे मुद्रा में बैठी थी। वहां कुछ देर तस्वीरगिरी करने के बाद हम फिर उन्हीं सीढि़यों से नीचे उतरते हैं।


रोप-वे, सलकनपुर फोटो- नीरज           

रोप-वे, सलकनुपर       फोटो-  नीरज


 अब तो पैर लड़खड़ाने की मुद्रा में आ गए थे कि अचानक हमारे साथ नीचे उतर रहीं ऐ अनजान मोहतरमा रोप-वे को देखकर बोलतीं हैं कि- देखो ! लिफ्ट जा रही है।'' बस, फिर क्या सब लोग ज़ोर से ठहाका मार के हंसने लगे। रोप-वे नाम के शब्द से अनभ‍िज्ञ  मोहतरमा कुछ देर तक के लिए तो झेंप-सी गई पर बेफ्रिकी के अंदाज़ में अपने गति से नीचे उतरने लगी।

फोटो- राहुल 


 लोगों ने बताया कि, सीढि़यों से चढ़ने में करीब दो घंटे का समय लगता है, तो वहीं रोप-वे से पांच या आठ मिनिट में ऊपर-नीचे आ जाते हैं। भूख से व्याकुल तलाश सभी मित्रों को भोजन की तलाश रहती है। पहाड़ी के नीचे निशुल्क भंडारा लिखा हुआ ढाबेनुमा स्थान दिखता है। पूछने पर पता चलता है कि, यह भंडारा मंदिर के ट्रस्ट की ओर से ही दूर-दराज़ से आने वाले ग़रीब श्रद्धालुओं के लिए है। मंदिर को प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग ने भी पयर्टन स्थल घोषि‍त कर दिया है इसलिए इसका महत्व आप जान ही सकते हैं। निशुल्क भंडारे में आठों भूखे खाने बैठे तो वहां के रसोईयों ने बहुत प्रेमपूर्वक और सहृदयता के साथ भोजन परोसा। अब जैसे ही पेट में वज़न बढ़ा, वैसे ही सबने गाडि़याें को रफ़्तार देना शुरू किया और चंद घंटों में अपने भोपाल आ गए।।


कैसे पहुंचें सलकनपुर:-  भोपाल से सलकनपुर की दूरी क़रीब 70 किमी है। यहां से सड़क मार्ग से आसानी से   जा सकतेहैं।बताते हैं कि प्रसिद्ध बिजासेन देवी धाम सलकनपुर देश के 11 शक्त‍िपीठों में से एक पीठ है। यह सीहोर जिले के बुधनी विधानसभा के रेहटी तहसील के सलकनपुर गांव में स्थ्‍िात है। यहां से 35 किमी दूर होशंगाबाद है और करीब 12 किमी दूर आवली नर्मदा नदी का घाट है। 

सलकनपुर गांव में देवी मां विजयासेन की पहाड़ी का दृश्य 






Wednesday, 19 November 2014

‘किल-दिल’ ने नहीं किया दिल को किल


                                                                  नीरज चौधरी



फ़िल्म: किल दिल

निर्देशक: शाद अली

कलाकार: रणवीर सिंह, गोविंदा, अली ज़फ़र, परिणीति चोपड़ा

निर्माता :- यश राज फिल्मस्

                                                                       



सात दिनों पहले ही सिनेमा के पर्दे पर उतरी फिल्म ‘किल-दिल’ दर्शकों के दिल को किल नहीं सकी। ‘कोईमोई’ वेबसाइट के अनुसार, 55 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म ने बुधवार तक करीब 24 करोड़ रुपए का धीमा करोबार कर लिया है। फिल्म की कहानी भले ही कमजोर है, लेकिन फिल्म के नायक रणवीर सिंह (देव) ने अपने किरदार में जान डाली है, लेकिन अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा (दिशा)और अली जफर (टूटू)खासा प्रभाव नहीं छोड़ पाए। हालांकि गोविंदा (भाईजी)ने अपने पुराने किरदारों के विपरीत खलनायक का किरदार निभाया है, जिसमें उनकी एक्टिंग को दर्शक जगत पचा नहीं पाया। फिल्म दर्शकों को  फिल्म कहानी शुरूआत में दर्शकों काफी गुदगुदाते हुए आगे बढ़ती है। खलनायक भाईजी का वह डायलॉग जिसमें वे कहते हैं कि, ‘लौंडिया में नखरे और मुंगफली में छिलके न होते, तो जिंदगी बड़े आराम से कटती’, और देव (रणवीर सिंह)का एक संवाद जिसमें वे फिल्म के एक पात्र को धमकाते हुए कहता हैं कि ‘हम तब से गन चला रहे हैं.. जब से तू अपनी मां के अंदर नहीं, अपने बाप के अंदर था।’ दर्शकों को सीट से हंसी के मारे उछलने को मजबूर कर देता है। 

बंटी और बबली’ और ‘झूम बराबर झूम’ जैसी फिल्में दे चुके शाद अली के निर्देशन में बनी यह फिल्म उनकी पुरानी फिल्मों की तरह ही उत्तर भारत के माहौल को बयां कर रहीं हैं।  फिल्म की कहानी को देखें तो इसमें भईयाजी(गोविंदा) नाम के आदतन अपराधी को दो लावारिश बच्चे (रणवीर सिंह और अली जफर) कचरे के ढेर में मिलते हैं। जिनकी परवरिश खून-खराबे और गोली के शारे-शराबे के बीच की जाती है और उनकों नाम दिया जाता है - देव (रणवीर)और अली जफर (टूटू)। देव और टूटू को भईयाजी परिपक्व हिस्ट्रीशीटर बना देते हैं, जो भईयाजी के कारिंदे के रूप में भाड़े पर मर्डर और लूट जैसी वारदातों को अंजाम देते हैं। इनकी मुलाकात एक अमीर समाजसेविका दिशा(परिणीति चौपड़ा)से होती है, जिसको देव से प्यार हो जाता है । फिल्म के पात्र देव और दिशा में चुहलबाजी का दौर रहता चलता रहता है, लेकिन दिशा को देव के बैकग्राउंड के बारे में पता नहीं होता है। और उसके इस प्यार की भनक भईयाजी को लग जाती है, तो वे अपनी शातिर चाल से दिशा को देव के बैकग्राउंड प्रोफेशन के बारे में पता लगवा देते हैं क्योंकि भईयाजी देव को अपनी गैंग से दूर नहीं जाने देना चाहते थे। शाद अली पटकथा में आसान रास्ते चुनते हैं। रणवीर सिंह की स्वाभाविक ऊर्जा का सही इस्तेमाल नहीं हो पाया है।  पहली बार खलनायक का किरदार निभा रहे गोविंदा ने अपने किरदार को समझा और सही ढंग से पेश जरूर किया है, किन्तु दर्शक उनको इस पात्र में पचा नहीं पाए। अगर वे कम नाचते और गाते तो अधिक प्रभावशाली लगते। पाकिस्तान से आए कलाकार अली जफर रणवीर सिंह को बराबरी का साथ नहीं दे पाए हैं। किलर की भूमिका में वे कमजोर हैं। बॉडी लैंग्वेज और आवाज में रफनेस लाने की उन्होंने कोशिश जरूर की है, लेकिन बात बनी नहीं है। परिणीति चोपड़ा दिशा के किरदार में नहीं ढल सकी हैं। फिल्म के गानों की बात करें तो गाने ऑडियेंश के दिल को किल नहीं कर पाए, हालांकि फिल्म का एंडिग सोंग जरूर अपना स्वर व शब्दों का प्रभाव छोड़ता है।

                                                                                      


फिल्म का संदेश एक संवाद में नायक देव दे ही देते हैं, बकौल देव (रणवीर),-‘बच्चा पैदा कहीं भी हो, बनता वैसा ही है..जहां बड़ा होता है।’ इसी बात को भारतीय समाज में बताया जाता है कि मनुष्य के स्वभाव और सोच पर परवरिश और संगत का असर होता है। जन्म से कोई अच्छा-बुरा नहीं होता। शायद इसी धारणा को फिल्म रूपहले पर्दे पर व्यक्त करती नजर आती है।  एक वाक्य में समीक्षा की जाए तो, ‘किल-दिल’ फिल्म अंत तक दर्शकों को सीट पर बैठे रहने को मजबूर कर देती है।

Tuesday, 7 October 2014

अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे



भोर होते ही पंछियों का मधुर कलरव किसी लयबद्ध संगीत के सुरों सा वातावरण में मिठास घोल रहा था। शहर से सटे उस गंवई इलाके के एक छोटे से शांत मोहल्ले में राधेश्याम बाबू और उनकी पत्नी सुनीता रोजाना की तरह आज भी जल्दी उठकर अपने काम-काज निपटाने में लगे थे। सुनीता गाय-भैंस की सेवा व मेवा से छुटकारा पाते ही छुटकू को स्कूल के लिए जल्दी-पल्दी तैयार करने लगी क्योंकि स्कूल की बस वाला पांच मिनिट भी इंतजार नहीं करता। काम के बोझ से दबी सुनीता मशीन की तरह काम में लगी है.. और पतिदेव हैं कि चायपीते-पीते अख़बार के शाब्दिक सागर में डूबे हैं। पति राधेश्याम बाबू का ध्यान खींचते हुए सुनीता,-''सुनिए, छुटकू की बस निकल जाएगी...मैं इसे छोड़कर आती हूं। ऐसा करना दूध गरम करने रख दो और आज ज़रा आंगन में झाडू भी लगा देना ।'' राधेश्याम बाबू अपने ही जिले में कलेक्टर के निजी सचिव हैं, और गांव में ही रहते हैं। गांव में रहने का कारण है कि शहर से ही सटा हुआ है और कलेक्टर के पीए होने के नाते ग्रामीण उन्हें ही कलेक्टर मानते हैं। रुतबा ऐसा कि अच्छे-अच्छे पानी भरें। पत्नी सुनीता के ऊंचे आर्डर सुनते ही राधे बाबू-''बोलने से पहले सोच लिया कर, इतना भी काम नाय ..जितना तू दिखा रही। तू सोच ज़रा मुझे कोई झाडू लगाते देख लेवे न, तो मेरी तो धुल गई। हमसे न होय ऐसे जनाने काम।...छुटकू को छोड़ के आ..और जो करना है, सो कर।। '' इतना सुनते ही सुनीता बुरे से मन से साड़ी का पल्ला लेकर छुटकू को बस में बिठाने चल दी..वापस आकर काम-धाम निपटाने लगी क्योंकि पति देव को कार्यालय जो जाना था। पता ही नहीं चला कि दिन के 1 बज गए। छुटकू भी अन्य बच्चों के साथ फुदकता हुआ घर आ पहुंचा और बैग, कपड़े, जूते कमरे की चारों दिशाओं में उड़ाते हुए फेंक दिए। फिर क्या..रोज़ाना की तरह लग गया मां के सीने से। बड़ा ही लाड़-प्यार करते हुए मां उसको टीवी पर कार्टून दिखाने के बहाने बड़ी ही न-नुकुर के बाद खाना खिलाने लगी....कि एकाएक चैनल बदला..न्यूज़ लग गई और छुटकू एकदम से,-''मां...मां..देखो पापा...मां देखो पापा'' अपनी उंगली टीवी की तरफ देखकर कहने लगा, कुछ सोचने में व्यस्त सुनीता को लगा कि छुटकू की आदत है। टीवी में वो किसी भी मर्द को देखकर पापा..पापा कहने लगता है। लेकिन जब सुनीता ने भी देखा तो पाया कि राधेश्याम बाबू कलेक्टर महोदय के साथ-साथ ''सफाई अभियान'' के तहत खूब मुस्कुराते ही झाडू मारे जा रहे हैं..। यह देख बच्चे की मां सुनीता मंद-मंद मुस्काई जा रही है...और काम की मशीन का मन तो कर रहा है कि पतिदेव के घर आते ही उनके लत्ते-पत्ते ले लूं, लेकिन वो उस ना समझ नन्हें छुटकू से ही बातें कह-कहकर भड़ास निकाल रही है-''देख..बेटा, अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे।।'' पर छुटकू अपने पापा को नज़दीक देखकर बहुत ही उछल रहा है......।

पटना में भगदड़



पटना में भगदड़...चित्रकूट में भगदड़....इलाहाबाद में भगदड़...यहां भगदड़..वहां भगदड़। कौन कराता है ये भगदड़ ? कैसे होती है ये भगदड़ ? भगदड़ से हमारी सल्तनतें क्या सबक लेतीं हैं ? आज तक कितने भगदड़ कराने वालों..अफवाह फैलाने वालों काे हिरासत में लिया गया ? ..न जाने कितने ही सवाल इन ख़बरों को सुनने वाली आवाम के जेहन में उठते होंगे..लेकिन सियासतदां अपनी चतुर चालें चलकर मामले का ठंडा करने में माहिर जो है। पटना में घटी घटना के बाद चहुं ओर रुदन, क्रंदन, हाहाकार..सुनाई दे रहा है......।


बुरा करने के लिए लिए जगत में कुख्यात वो मनहूस रावण, आज अपने साथ न जाने कितनों को ले जा रहा है। अब रावण को ही दोष देना सही होगा, क्योंकि पटना में सरकार तो ठेके पर चल रही है। प्रशासन धोके पर चल रहा है। इस समय तो लग रहा है..वहां किसी का किसी पर कंट्रोल ही नहीं बचा। अब सुनिए न इन तमाम रविशंकर प्रसादों..पासवानों...समेत दिग्गज कहलाने वालों की। इसमें में भी ये माननीय थोड़ा-बहुत सियासत का तड़का लगाने से नहीं चूके।

प्रसाद कह रहे हैं-'' यह न केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण और अफसोसजनक घटना है बल्कि शर्मनाक भी है. हर साल गांधी मैदान में दशहरा समारोह का आयोजन किया जाता है. इसके बावजूद कोई उचित प्रबंध नहीं किए गए...हाल ही में वहां छठ पूजा के दौरान हादसा हुआ था. पिछले वर्ष अक्तूबर में नरेन्द्र मोदी की रैली के दौरान घटना हुई थी.’’ वहीं, केन्द्रीय मंत्री पासवान भी यही राग अलाप रहे हैं। ख़ैर ये तो इतना भी बोल रहे हैं लेकिन बिहार सरकार तो लगता है जु़र्म करके फरारी काटने चली गई है। वहां तो कोई कुछ बोल ही नहीं रहा। मंत्रियों के फोन बंद...कान बंद..। अब भला रात में भी क्या करेंगे वो आकर। जिन्हें जाना था.. वो चले गए..। जिन्हें मरने वालों की बिछड़न में रोना हैं..वे रो रहे हैं..। अब सब मामला सुबह ही देखा जाएगा..।
वो तो भला हो इस मुल्क़ के निज़ाम का, जिसने आधी रात को ही सूबे की सरकार से पहले काल के गाल में समा गए लोगो के परिवारों को मुआवज़ा रूपी मरहम लगा दी.. और करते भी तो क्या...उनका तो यही फर्ज़ बनता है।
अब फिर वहीं पुराना राग शुरू होगा..जो हर बार होता है..। सूबे से घटना की रिपोर्ट मांगी जाएगी...फिर किसी को बलि का बकरा बनाया जाएगा...फिर वोटों की गाेटियां बिठाई जाएंगी। सत्ता के साधकों के द्वारा इस मामले को फिर ''चर्चा करके, चिंता करके..चलता'' करने में देर नहीं की जाएगी। करें भी तो क्या ?? पुरानी आदत जो पड़ गई है।
आगे की कार्रवाही भी जान लीजिए..। जहां घटना हुई वहां का करोडा़ें का दौरा होगा..उड़नखटोले उतरेंगे..हैलीपैड बनेंगे...फोटोग्राफी होगी...ज़रा सी सियासत भी होगी। फिर आगे की सुनिए ...। एंबेसडर गाडि़यों के आगे-पीछे हमारे अफसरान दौड़ेंगे...गुफ्तगू होगी..एक-दूसरे निज़ामों को दोषी ठहराने की फाइलें तैयार होंगी.. और फिर तैयार हाेगा दुर्घटनास्थल की दुरूस्त व्यवस्था के लिए भारी -भरकम पैकेज...जिससे कभी उस जगह ऐसी घटना न घट सके। ..जिसमें सबका सार निहित है।.. फिर जैसा कि आप सब को पता है....

''चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग'' को हर वर्ग ने सराहा







लब्धप्रतिष्ठित पत्रकार व एबीपी न्यूज़ मध्यप्रदेश के ब्यूरो प्रमुख श्री ब्रजेश राजपूत की किताब (Chunav, rajneeti aur reporting) मीडिया के विद्यार्थियों, राजनीतिक विचारकों, विश्लेषकों के लिए यह पुस्तक एक उपयोगी दस्तावेज दस्तावेज़ बन गई है। बेहद सरल और सहज भाषा शैली में लिखी गई इस चर्चित ''चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग'' पुस्तक की समीक्षा को प्रदेश की नवोदित पत्रिका ''प्रदेश संवाददाता'' ने अपने सितंबर माह के अंक में जगह दी है।

ख़ास बात यह है कि जल्द ही इस पुस्तक का दूसरा संस्करण भी बाज़ार में आने वाला है। हर पाठक वर्ग में सराहे जाने वाली इस पुस्तक की समीक्षा इस नाचीज़ ने लिखी है।  

पांच रुपए का घी


नीरज

स दोपहर धूप में वो कड़कपन नहीं बचा था। पितृपक्षों का आखिरी दिन था। बाज़ार में चहल-पहल काफी थी। पकवानों की खुशबू उस कस्बाई इलाके के घरों से बिना पूछे नथुनों में समा रही थी। क़रीब 3 बजे का समय होगा, मैं उस कस्बाई इलाके की प्रसिद्ध किराना दुकान पर कुछ सामान लेने पहुंचा। सेठ जी नौकरों को हमेशा की तरह अपनी सेठगिरी दिखा रहे थे। मैंने सामान का पर्चा सेठजी के हाथ में थमाया कि, अचानक एक छोटी- सी बच्ची मटमैले से कपड़ों में फुदकती हुई वहां आ पहुंची, और तपाक से दुकानदार से बोली,-''अंकल, पांच रुपए का घी देना।'' सेठ अपने मोटापे के आधार पर पूरी ताक़त से साथ उस बच्ची को दुत्कारते हुए,-''तुम्हारे बाप ने खाया पांच रुपए घी, चल जा।'' धूप में तो कड़कपन नहीं था पर उस सेठ की बातों में ज़रूर था। रावण की तरह अट्टाहास करते हुए बोला-'' पांच रुपए में घी तो क्या घी की खुशबू भी न मिले ।'' सेठ के दुत्कारते ही उस बच्ची की न जाने कितनी उम्मीदें टूट चुकीं थी।

घर से फुदकते हुए पांच रुपए का घी लेने निकली उस भोली-सी सूरत वाली अभागी के सारे सपने मानों छन्न से टूट गए थे। दुकान की देहरी पर थम-सी गई थी। दुकान की तरफ पीठ करके मिर्ची के बारे के पास में खड़ी ढंग से रो भी नहीं पा रही थी। आंखों में आंसू ज़रूर भर लिए थे उसने। घर में न जाने क्या-क्या बोल कर आई होगी वो.. भाई-बहिनों को ''पांच रुपए के घी '' से बने न जाने क्या-क्या पकवान परोसने वाली होगी वो ..! पर कर भी क्या सकती थी..रुंआसी आंखों से ज़मीन की ओर देखती हुई रास्ते में पड़े कंकड़-पत्थरों को चप्पल से ठोकर मारती हुई चल दी अपने छोटे-से आशियाने की ओर.....। पता नहीं वहां तक पहुंची कि नहीं.....।



Wednesday, 10 September 2014

आसाधारण मैरी कॉम की अद्वितीय फिल्म


हम अगर किसी अपने के साथ नदी में नहाने जाएं और डुबकी लेते वक़्त वही हमारा सिर पकड़कर बड़ी ताक़त से बहुत देर तक पानी में डुबाए रखे, तो उस समय बाहर निकलने की जो तड़प होती है न, वही दुनिया की महान बॉक्सर बनने के लिए मैरी कॉम में उनकी बायोपिक फिल्म में देखने को मिली...। इसी तड़प, लगन, उत्साह, मेहनत का सुफल मैरी कॉम को एक जीवन आधरित बॉलीबुड फिल्म व उससे बड़ा कहें तो दनियाभर से मिले पुरस्कारों के रूप में मिला है। 

फिल्म का वो दृश्य जिसमें मैरी जब बॉक्सिंग सीखने के लिए प्रशिक्षक (सुनील थापा) के पास जाती है तो वह पूछता है कि पांच कारण बताओ कि तुम बॉक्सिंग क्यों सीखना चाहती हो? वह जबाव में चार बार ''आई लव बॉक्सिंग'' कहते हुए पूछती है,- पांचवां कारण भी बताना जरूरी है क्या ? कोच सर ने मैरी को रोज-रोज बुला-बुला कर उसकी तड़प का परीक्षण किया उसके बाद उसे ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं। मैरी कॉम फिल्म ने अब तक की अनेक महान नायक-नायिकाओं पर बनीं बायोपिक फिल्मों में ऊंचे स्थान पर जगह बना ली है। 

                                                    


भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले ओमंग कुमार के निर्देशन में बनी मैरी कॉम फिल्म अन्य फिल्मों की तरह व्यर्थ की मिर्च- मासाले भरी सामग्री से दूर एक सधी हुई फिल्म है। फिल्म में ख्यात बॉक्सर मैरी कॉम के पात्र को अदाकारा प्रियंका चोपड़ा ने बखूबी जिया है। प्रियंका द्वारा निभाए गए किरदारों से पता चलता है कि मैरी कॉम एक शरीर होते हुए वो बेटी भी है, मां भी है, बहू भी है, पत्नी भी है और एक सफल बॉक्सर भी है। शादी के पहले और शादी के बाद भी। इस चर्चित फिल्म में प्रियंका द्वारा की गई कुशल अदाकारी के लिए उन्हें आजीवन याद किया जाता रहेगा। धांसू स्क्रीनप्ले, संवाद अदायगी व उम्दा गीतों को देख-सुनकर दशकों में एक अज़ीब उत्साह, उमंग, जुनून पैदा किया। मैरी कॉम के पति ऑनलर के किरदार को ख्यात कलाकार दर्शन कुमार ने बेहतरीन ढंग से निभाया है। ऑनलर (दर्शन कुमार) ने एक अच्छे पति की परिभाषा इस चलचित्र के माध्यम से स्पष्ट की है कि किस तरह विषम परिस्थितियों में पति ने मैरी को आगे बढ़ने की ओर प्रोत्साहित किया।

...और हां, फिल्म के शुरूआती क्षणों में हट्टे-कट्टे सौष्ठव शरीर वाले ''लाल'' सांड को देखकर गांव के उन नौजवान पहलवानों की याद आ जाती है जो ताक़त का प्रदर्शन करने के लिए पार्ट टाइम दंगलों में खूब लड़ा करते हैं व समय आने पर ग़लत कार्यों को भी अंज़ाम देते हैं लेकिन देश के लिए उनसे कभी नहीं लड़ा जाता।।
सही मायानों में कहा जाए तो मणिपुर राज्य के कांगथेई गांव की पगडंडियों की पथरीली व कटीली राहों का रास्ता तय करके सात समंदर पार से पांच दफा स्वर्ण मैडल वाली विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली Mangte Chungneijang Mary Kom (MC Mary Kom) के जीवन पर आधरित फिल्म देश-दुनिया के नवोदित बॉक्सरों - खिलाडियों व कुछ बनने की चाहत रखने वाले नागरिकों को एक संदेश देती है। .....शायद ही कोई ऐसा दर्शक हो जो फिल्म को छविगृह से अपने साथ दिलो-दिमाग में बसाकर घर तक न ले गया हो...हालाकि इस फिल्म में ''मुन्नी बदनाम'' नहीं हुई और ''शीला जवान'' नहीं हुई, इसीलिए हो सकता है कि मजनू संप्रदाय को ये फिल्म पसंद न आए....पर फिल्म पैसा वसूल है ।।


फिल्म का वो दृश्य जिसमें मैरी जब बॉक्सिंग सीखने के लिए प्रशिक्षक (सुनील थापा) के पास जाती है तो वह पूछता है कि पांच कारण बताओ कि तुम बॉक्सिंग क्यों सीखना चाहती हो? वह जबाव में चार बार ''आई लव बॉक्सिंग'' कहते हुए पूछती है,- पांचवां कारण भी बताना जरूरी है क्या ? कोच सर ने मैरी को रोज-रोज बुला-बुला कर उसकी तड़प का परीक्षण किया उसके बाद उसे ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं। मैरी कॉम फिल्म ने अब तक की अनेक महान नायक-नायिकाओं पर बनीं बायोपिक फिल्मों में ऊंचे स्थान पर जगह बना ली है।

भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले ओमंग कुमार के निर्देशन में बनी मैरी कॉम फिल्म अन्य फिल्मों की तरह व्यर्थ की मिर्च- मासाले भरी सामग्री से दूर एक सधी हुई फिल्म है। फिल्म में ख्यात बॉक्सर मैरी कॉम के पात्र को अदाकारा प्रियंका चोपड़ा ने बखूबी जिया है। प्रियंका द्वारा निभाए गए किरदारों से पता चलता है कि मैरी कॉम एक शरीर होते हुए वो बेटी भी है, मां भी है, बहू भी है, पत्नी भी है और एक सफल बॉक्सर भी है। शादी के पहले और शादी के बाद भी। इस चर्चित फिल्म में प्रियंका द्वारा की गई कुशल अदाकारी के लिए उन्हें आजीवन याद किया जाता रहेगा। धांसू स्क्रीनप्ले, संवाद अदायगी व उम्दा गीतों को देख-सुनकर दशकों में एक अज़ीब उत्साह, उमंग, जुनून पैदा किया। मैरी कॉम के पति ऑनलर के किरदार को ख्यात कलाकार दर्शन कुमार ने बेहतरीन ढंग से निभाया है।

...और हां, फिल्म के शुरूआती क्षणों में हट्टे-कट्टे सौष्ठव शरीर वाले ''लाल'' सांड को देखकर गांव के उन नौजवान पहलवानों की याद आ जाती है जो ताक़त का प्रदर्शन करने के लिए पार्ट टाइम दंगलों में खूब लड़ा करते हैं व समय आने पर ग़लत कार्यों को भी अंज़ाम देते हैं लेकिन देश के लिए उनसे कभी नहीं लड़ा जाता।।

सही मायानों में कहा जाए तो मणिपुर राज्य के कांगथेई गांव की पगडंडियों की पथरीली व कटीली राहों का रास्ता तय करके सात समंदर पार से पांच दफा स्वर्ण मैडल वाली विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली Mangte Chungneijang Mary Kom (MC Mary Kom) के जीवन पर आधरित फिल्म देश-दुनिया के नवोदित बॉक्सरों - खिलाडियों व कुछ बनने की चाहत रखने वाले नागरिकों को एक संदेश देती है। .....शायद ही कोई ऐसा दर्शक हो जो फिल्म को छविगृह से अपने साथ दिलो-दिमाग में बसाकर घर तक न ले गया हो...हालाकि इस फिल्म में ''मुन्नी बदनाम'' नहीं हुई और ''शीला जवान'' नहीं हुई, इसीलिए हो सकता है कि मजनू संप्रदाय को ये फिल्म पसंद न आए....पर फिल्म पैसा वसूल है ।।


- नीरज

फिल्म की स्टोरी


फिल्म की मुख्य किरदार मैरी कॉम भारत के उस हिस्से की रहने वाली है। जहां आजादी के वर्षों बाद भी लोगों को यह बताना पड़ता है कि वे भारतीय हैं। मैरी कॉम ने एक ऐसा खेल चुना है जिसमें पुरुषों का दबदबा है। भारत में बॉक्सिंग में महिला खिलाड़ी ढूंढे नहीं मिलती हैं। मैरी कॉम के परिवार की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि उन्हें तमाम सुविधाएं मिलती। मैरी के पिता इस खेल के खिलाफ थे। मैरी कॉम को अपने स्तर पर इस खेल में काफी संघर्ष करना पड़ा। फेडरेशन मुक्केबाजों को डाइट में एक केला और चाय दिया जाता है। मैरी अपनी पहली फाइट भूखे पेट लड़ती है। उनका कोच पूछता है कि क्या वह लड़ लेगी तो वह कहती है कि सर, खुशी से ही पेट भर गया। तमाम बाधाओं को पार करते हुए मैरी ने विश्व चैम्पियन का खिताब एक-दो बार नहीं बल्कि पूरे पांच बार अपने नाम किया।   


मैरी का संघर्ष दोहरा है। पहला तो वे तमाम बाधाओं को पार कर विश्व चैम्पियन बनती है। इसके बाद शादी करती है और दो बच्चों की मां बनती है। भारत में एक क्रिकेट खिलाड़ी आईपीएल के कुछ मैच खेल कर ही करोड़पति बन जाता है, लेकिन मैरी कॉम तीन बार विश्व विजेता बनने के बावजूद परिवार के बढ़ते खर्च को लेकर चिंतित हो जाती है। वह नौकरी करने का फैसला करती है तो सरकार उन्हें हवलदार की नौकरी देती है जिसे वे ठुकरा देती है। मैरी को कोई पहचानता नहीं है जिसका उन्हें बुरा लगता है। विश्व विजेता खिलाड़ी को फेडरेशन का अदना ऑफिसर ऑफिस के बाहर घंटों इंतजार करवाता है।

मैरी कॉम की वापसी को लेकर रूकावटें खड़ी की जाती हैं। उनसे माफीनामा मांगा जाता है। एक चैम्पियन खिलाड़ी के लिए यह सब अपमानजक है, लेकिन खेल के प्रति प्रेम के चलते मैरी कॉम यह सब सहन करती है और फिर बॉक्सिंग रिंग में उतरती है। और फिर विश्व चैम्पियन का खिताब अपने नाम करती हैं। फिल्म के क्लाइमैक्स में दिखाया गया है कि जब मैरी कॉम विश्व कप फाइनल का मैच खेल रही होती है तब उनके बच्चे के दिल का ऑपरेशन चल रहा होता है। पता नहीं यह हकीकत है या फसाना, लेकिन अगर यह सच है तो इससे बड़ा आश्चर्यजनक बात और नहीं हो सकती है कि वह इतने बड़े दर्द को दिल में बिठाकर मैच खेलती हैं और जीतती भी है। ये सारे प्रसंग दर्शक को बांधकर रखते हैं।



(: फिल्म की स्टोरी साभार)

Saturday, 6 September 2014

अपराधबोध से घिरा आकाश


नीरज


श्रेयांश.....यस सर। गौरव ......प्रजेंट सर। हेमेन्द्र ......जी सर। कॉलेज की कक्षा में प्रवेश करते ही प्रोफेसर गुरुदत्त राम सबसे पहले छात्र-छात्रओं की हाजि़री लगाते थे। रोज़ाना की तरह इस दिन भी हाजि़री लगा रहे प्रोफेसर ने रीना कुमारी का नाम बोला..लेकिन कोई जबाव नहीं आया। क़लम को रोकते हुए सिर को ऊपर उठाकर प्रोफेसर महोदय ने प्रथम बैंच पर बैठे नियमित रहने वाले आकाश की ओर देखकर पूछा, -'आज रीना नहीं आई।' 'वो तो सर हमेशा क्लास के लास्ट टाइम में आती है ताकि आपकी क्लास की अटेंडेंस भी हो जाए और शुरू होने वाली क्लास की भी', आकाश ने तपाक से जबाव दिया। इतना सुनते ही गुरूदत्त जी ने तत्काल प्रभाव से रीना कुमारी की अनुपस्थिति दर्शा दी। हाजि़री पूरी होते ही प्रोफेसर ने रजिस्टर को एक तरफ रख कल का शेष टॉपिक पढ़ाना शुरू कर दिया। सर भले ही पढ़ा रहे थे लेकिन आकाश का मन ही मन फूला नहीं समा रहा था क्योंकि आज उसने अप्रत्यक्ष रूप से रीना से बदला जो ले लिया। हमेशा रीना के चिढैल स्वभाव, अपमान और उसके विरुद्ध कुछ न कर पाने की बेबसी हमेशा कुंठित कर देती थी आकाश को। स्कूल लाइफ से कॉलेज तक उसको चाहता रहा पर संसकारवानों की अम्मा ने आज उसे भाव न दिया। .....

इतने में हुआ वही, अचानक से क्लास के अंत में इक्कीस वर्षीय रीना कॉपी-किताबें दिल से चिपकाएं हौले-हौले से संकोची स्वभाव का आभामंडल बनाए डरावने अंदाज़ में कक्षा के दरवाजे पर ''मे आई कम इन सर...'' बोलती है,... रीना की ओर देखते हुए प्रोफेसर साहब, ''अब आकर क्या करोगी...., रजिस्टर में तुम्हारी अनुपस्थिति दर्शा चुका हूं। रोज-रोज क्यों देर से आती हो ??'' सीने से किताब चिपकाए खड़ी रीना नीचे फर्श की ओर देखते हुए रुंआसे स्वर में बोली, -''सर, मम्मी को पैरालिसिस है, पापा सुबह-शाम एक प्राइवेट कंपनी में ओवरटाइम नौकरी के चलते बाहर ही रहते हैं जिससे दो छोटी बहिनों के स्कूल का टिफिन तैयार करने में देरी हो जाती है .....और..और...'' बस इतनी बात निकलते ही उस अभागी रीना के चक्षुओं से आंसुओं की धार निकल पड़ी। अपनी इस प्यार वाली रंजिश के चलते रीना को कक्षा में ग़ैर हाजि़र कराने वाला आकाश न मानो कैसे ख़ुद को रोने से रोक पाया। अपराधबोध से घिरे आकाश को मन ही मन ख़ुद से इतनी ग्लानि हो रही थी कि, एक बारगी रीना उसमें ज़ोर से दो-चार थप्पड़ भी मार दे तो वे भी कम हों।।

बच्चा, अगर हम पढ़ा-लिखा होता तो सन्यासी क्यों बनता

नीरज


झीलों के शहर भोपाल में हॉकर्स की ख्याति व व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए नगर निगम द्वारा तालाब के किनारे सुहाने मौसम में चौपाटी का विशेष आयोजन किया गया। तमाम लज़ीज, चटपटे, स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ ठेले वाले गंदगी के साम्राज्य से दूर स्वच्छ वातावरण में ख्याति के चक्कर में बेहतरीन ढंग से चाइनीज़, साउथ इंडियन डिश, उत्तर भारतीय व्यंजन ग्राहकों को परोसे जा रहे थे। तभी कर-कमलों में कमंडल थामे जटाधारी गेरुआ वस्त्रों से लिपटा फक्कड़ सन्यासी चाइनीज़ ठेले पर पहुंचता है और कोथे-मंचूरिअन की ओर इशारा करके खाने के लिए मांगता है। दिल से सच्चा ठेले वाला जब सन्यासी को कोथे की प्लेट देने वाला होता है तभी पास में खड़ा बैजू मसखरा बोला, -'बाबा, इसको मत खाना, ये मांसाहारी है।' बाबा खाने की मना कर देता है। तो कोथे की प्लेट पकड़कर खड़ा ठेले वाला बोलता है कि बाबा, बैजू मज़ाक कर रहा है, आप खा लीजिए। क्या आप पढ़े-लिखे नहीं हो, इतना सुनते ही बाबा तपाक से बोला, -'बच्चा, अगर हम पढ़ा-लिखा होता तो सन्यासी क्यों बनता।।'

यहां तो चतुरों की कमी नहीं


नीरज


नुमानगंज थाने के दरोगा ठा. रामसजग सिंह के सेलफोन की गुनगुनाती हुई घंटी बजती है। गहरी नींद में सोए पिता को न जगाते हुए देर रात को अध्ययन कर रही बेटी फोन रिसीव करती है, तभी दूसरी ओर से आवाज़ आती है, 'हेलाे ! सीएसपी मीणा बोल रहा हूं, तुम कहां हो ??' सकपकाती हुई बेटी अपने पिता को जगाते हुए, -'पापा..पापा..सीएसपी सर का कॉल आया है !' एकदम हड़बड़ी में मोबाइल पकड़ते हुए एनर्जेटिक आवाज़ में ठा. रामसजग, 'जी...जी..सर, चौकी पर हूं ?' ज़रा अकड़ते हुए सीएसपी, 'कौन सी चौकी पर ?' 'साबजी, काली छावनी चौकी पर', दरोगा रामसजग ने भयंकर आत्मविश्वास वाली आवाज़ में उत्तर दिया, आवाज़ में बिल्कुल अलसापन सीएसपी साब को महसूस नहीं होने दिया । सीएसपी, -' बातें मत बनाओ ! मैं खुद काली छावनी चौकी पर खड़ा हूं, मिनिटों में यहां पहुंचो।। अब तो मानों शामत आ गई। हड़बड़ी में वर्दी को शरीर पर ओड़ कड़ाके की सर्दी में उठाकर अपनी मोटरसाइकिल चंद सेकेंडों में जब ठा. रामसजग सजगता के साथ रात के 3 बजे चौकी पर पहुंचता है तो देखता है कि सन्नाटा पसरा हुआ है। हाड़ गला देने वाली ठंड में पास की दुकान के बाहर सो रहे चौकीदार से पूछता है-, - 'ओए !!, यहां कोई बत्ती वाली गाड़ी से आया था क्या ?? 'जी, नहीं साहेब, हम तो पूरी रात जगता है, कोई गाड़ी नहीं आई।, चौकीदार ने जवाब दिया। दरोगा रामसजग पूरा माज़रा समझ गया और भयंकर ठंड में चौकी की कुर्सी पर बैठते हुए रामसजग मन ही मन हल्की-सी चेहरे गुस्से वाली मुस्कान लिए सोचता है, मेरी टीआई साब झूठी तरीफ करते हैं कि थाने में तुम सबसे चतुर, चपल और चालाक हो। कम्बख्त, यहां तो चतुरों की कमी नहीं।।

मेरी पोती रैम्प पर कैटवॉक करते हुए फर्स्ट आई है


- नीरज

मी हुई बरसात की काली घटा के नीचे बैठे गिरीश बाबू अपने हमउम्र पड़ोसी रामदयाल जी के घर के बगीचे में गर्मा-गरम चाय की चुस्कियां ले रहे थे। गिरीश बाबू शिक्षा विभाग से रिटायर्ड थे और रामदयाल जी वन विभाग से। रोजा़ना की चाय पे चर्चा में राजनैतिक-सामाजिक बातें छिड़ा करतीं थी। वही आज हुआ, मेज पर अख़बार रखते हुए एकदम उखड़े स्वभाव में गिरीश बाबू बोलते हैं, -'सत्यानाश हो गया देश का, रामदयाल जी ये देखो कितने नग्नता पसर गई है समाज में।' रामदयाल जी ने जैसे ही अख़बार पर नज़र डाली तो वाटरपार्क में हमउम्र युवक-युवतियों के साथ नहाते व गलबहियां करते हुए चित्र छपे थे। रामदयाल जी भी अख़बार रखते हुए हल्की-सी मुस्कुराहट लिए बोले, क्या करें इस नई पीढ़ी का ?, ज़माना ही ऐसा है।' गिरीश बाबू,-'घर वालों की छूट है, उन्होंने संस्कार दिए ही नहीं।' दूसरे दिन की देर रात रामदयाल जी के घर की घंटी बजती है, दरवाज़ा खोला कि बाहर गिरीश बाबू हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए खड़े हैं। गिरीश बाबू,-'लो, रामदयाल मिठाई खाओ...' रामदयाल जी,-'किस बात की ख़शी मन रही है गिरीश बाबू ? ' गिरीश बाबू बोला,-'' मूनसिटी में आयोजित फैशन शो मे मेरी पोती रैम्प पर कैटवॉक करते हुए फर्स्ट आई है। मैंने सोचा कॉलोनी में मिठाई बांट दूं क्योंकि उसके मां-बाप तो इस खुशी में वहीं पार्टी कर रहे हैं।'' रामदयाल जी सुनकर गिरीश बाबू की ओर मंद-मंद मुस्काने लगे और मन में सोचने लगे शायद इनके संस्कार अलग हैं।


मेक्को न तेरी बातें भाषण लगतीं हैं


नीरज


नाेयडा के एक ख्यात मीडिया संस्थान ने इंटर्न करके लौटी सहपाठी मोहतरमा से यूं ही अनौपचारिक मुलाक़ात हुई। पहले से ही उसकी ख़ैर-मक़दम में लगे दो और शुभचिंतकों के बीच में भी पहुंच गया। तमाम हाय-हैलो के बाद उसने अपने अनुभव सुनाए। इस सब के बीच अचानक मैंने अपने जिज्ञासू और ज्ञान पिपासू स्वभाव के चलते उससे पूछ दिया कि, यार, NOIDA की फुल फार्म क्या है ? बस, फिर क्या..ऐसा लगा कि जैसे शहद की तलाश में गए शख़्स ने ग़लती से छत्ते में हाथ मार दिया हो। एकदम उखड़कर डंकशब्दों से प्रहार करते हुए बोली,-''मेक्को न तेरी बातें भाषण लगतीं हैं, तू ध्यान रखा कर इन फालतू बातों का। चल तू बता दे BHOPAL की फुल फोर्म...बात करता है । तू उन लोगों में से है जो बीए पास व हेट स्टोरी जैसी फिल्मों में मैसेज ढ़ूंढ़ते हैं।'' गर्दन समेत समस्त मुखमंडल को आगे कर और दोनों हाथों को पीछे की ओर खी़चते हुए धाराप्रवाह बोली ही जा रही थी एवं पास खड़े दोनों प्राणी हैरान थे। माेहतरमा तेज़ गति से आगे बढ़ गई और कुछ दूर से मुड़कर बोलतीं हैं,-'तुम फुल फोर्म याद करते रहना आेके, बट आई बिकेम बी ए गुड एण्ड बिग एंकर। और हां मुझे भोपाल का पूरा नाम भी बताना।'

अबे, 15 अगस्त को ड्राय-डे रहेगा न


नीरज

बदन में अंदर तक असर करने वाली उस मद्धम बरसात में गुमटीनुमा दुकान के बाहर गाडि़यां सुधारने वाला मैकेनिक हलकू काम को जल्दी-जल्दी निपटाने में लगा था। उम्र के करीब बीस-बाईस बसंत देख चुके हलकू का ढांचानुमा शरीर पसीने और पानी की मिलावट से लथपथ था। मोबाइल में जैसे ही शाम के छह बजे, वैसे ही उसने औजारों को समेटते हुए दुकान में जा पटके। मालिक ने उसे रोज के हिसाब से पैसे देने चाहे तो हलकू बोला,-'चच्चा, कल की मजदूरी एडवांस दे दो, घर पर ज़रूरत है।' चच्चा ने उसकी दयनीय शक़्ल देखते हुए दो दिन के 300 रुपए थमा दिए। रुपए मिलते ही हलकू ने झट से पर्स में बीबी की फोटो के नीचे दबा लिए और तेज़ गति से साइकिल के पैडल मारते हुए वह अपने साथी फैज़ल के साथ टिफिन को लटकाकर अपने गंतव्य की ओर चल दिया। 

जिज्ञासावश साथी फैज़ल ने पूछ ही लिया, -'यार, तुझे आज कैसी जरूरत आ पड़ी, जो एक दिन का एडवांस हिसाब ले लिया।' हलकू,-'साले, तू बहुत बड़ा मूर्ख है..तुझे भी ले लेने थे।' फैज़ल,-'क्यों ? ' हलकू,-''अबे, 15 अगस्त को ड्राय-डे रहेगा न, इसलिए पहले से ही हिसाब बना लिया ताकि अपना कंठ सूखा न रहे। घर की क्या टेंशन है, वहां तो मेरी लुगाई छह घरों में बर्तन मांजने की पग़ार पाती ही है ।'' 


मेरे मुंह से ''गोबर'' ही निकलता है

नीरज


हुत ही प्यारा नाम है उसका ''गौरव''! पर गली का ठुल्ले खां उसे ''गोबर'' नाम से बुलाता था। बचपन तो गुजर गया लेकिन जवानी में उससे सहा नहीं गया। आखिर अब दोस्तों के साथ मान-सम्मान की फिक़्र जो थी उसे। गौरव ने एक दिन गुस्से को तनिक भीतर व तनिक बाहर रखकर ठुल्ले खां से कह ही लिया,-'चच्चा, मेरा नाम गौरव है...गौरव, सही से बोलोगे तो बहुत प्यारे लगोगे।अब मैं बच्चा नहीं हूं।' पान की पीक साइड में थूकते हुए ठुल्ले खां,-'बेटा, तू तो बुरा मान रहा है। इसमें मैं क्या करूं ? शुरू से मेरे मुंह से ''गोबर'' ही निकलता है।  


क्या मतलब निकला 17 किताबें पढ़ने का...

 नीरज

म्र के क़रीब अस्सी बसंत देख चुके रामदयाल बाबा अपनी भैंसों की रखवाली के वक़्त तबेले के बाहर चारपाई डाल कर हुक्का गुड़गुड़ाने में लगे रहते थे। गौ-धुली की बेला के समय गांव वाले इधर- उधर से निकलते वक़्त बाबा को राम-राम, श्याम-श्याम करके ही निकलते थे। बहुत दिनों पश्चात़ दीपावली की छुटि्टयों में अपने घर पहुंचे गांव का सबसे अधिक प्रौढ़ युवा रवि घूमते हुए वहां जा पहुंचा। रवि ने पैर छूते हुए रामदयाल बाबा से नमस्कार-चमत्कार किया और बाबा ने भी उससे कुशलक्षेम पूछा। बातें शुरू हुईं और फिर ''बेटा, कितनी किताब पढ़ चुके हो ?'' बाबा ने रवि से पूछा। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) की डिग्री हासिल कर रहे रवि ने जबाव देते हुए कहा- ''बाबा, 17वीं किताब पढ़ रहा हूं।'' ये सुनते ही बाबा ने बड़ी ही ज़ोर से रवि की पीठ थपथपाई, और आर्शीवचन दिया कि, 'बेटा, तुझे बहुत ही ''खबरसूरत'' पत्नी मिले।' इतना सुनते ही गदगद रवि ने एक बार फिर बाबा के चरणों में अपना सिर रख दिया। तमाम बातें दोनों की बीच जारी थीं कि एकदम से बाबा की भैंसें पता नहीं कैसे तबेले में से कूदते हुए भागने लगीं....एकदम चारपाई से उठते हुए बाबा रवि से-'बेटा रोक...रोक...' काफी मशक्कत के बाद भी रवि उन्हें नहीं रोक पाया। लेकिन भैंसों का भागता देख गांव का नन्हे बड़ी ही चालाकी से उन्हें घेर लाया। विचलित बाबा से रहा नहीं गया और उन्होंने निंदा प्रस्ताव पारित करते हुए रवि से कह ही दिया- ''क्या मतलब निकला 17 किताबें पढ़ने का...कम्बख़त तू भैंसें भी न रोक पाया। अपना नन्हें देख पांचवी भी पास नहीं कर पाया और भैंसे ले आया। तेरी उम्र में वो दो बच्चों का बाप है...तू है कि.....।'' तारीफ़ सुनकर बगल में खड़ा नन्हें मंद-मंद मुस्काए जा रहा था। 


भगवान को समर्पित 'मुहब्बत बरसा देना तू'

नीरज


पास की झुग्गी बस्ती के नुक्कड़ पर शाम होते ही राजू, बंटी, गोलू, सोनू की मित्र मंडली ने फुल वॉल्यूम लाउडस्पीकर पर गणेश जी की आरती शुरू कर दी। आखिर चंदे से किराए पर लिया तो पैसे वसूल करना तो बनता है..। अब आरती कब ख़त्म हो, शायद ऐसे ही इंतज़ार में मित्र मंडली पूजा की थाली पकड़कर लगातार जल्दी-जल्दी घुमाए जा रही थी। शाम की आरती में शामिल होने आईं केवल अंगूरी और पुष्पा आंटी ही बड़े ही विधान से आरती गुनगुनाते हुए पूजा में मग्न थीं। आरती ख़त्म होते ही लड्डू बटे और मित्र मंडली पांडाल में रह गई....और फिर शुरू हुआ '' Mohabbat Barsa Dena Tu Sawan Aaya Hai, तेरे और मेरे मिलने का मौसम आया है।'' अपने बगल के रिटायर्ड बाबू लज्जाशंकर से नहीं रहा गया और वहां पहुंच कर बोले - ''अरे !!!! कम्बख़्तों, कम से कम यहां तो ऐसे गाने इतनी कर्कश आवाज़ में न बजाओ। भगवान सब देख रहा है।'' इतने में पांडाल में फिल्मी भजनों का आनंद ले रहे परम भक्त कल्लू गणेश् जी के चरणों में से उठकर आते हैं...और शोर के बीच पूछते हैं- ''बाबा, क्या...क्या..परेशानी है....??? तुम..तुम.. हर गाने को एक ही जगह क्यों ले जाते हो। पिक्चर में भले ही हीरो ने बिपासा के लिए ये गाना गाया हो....पर यहां हम सभी भक्त अपनी ओर से भगवान को डेडिकेट (समर्पित) कर रहे हैं....बाबा, सोच बदलो-देश बदलो।'' इतना कहकर परम भक्त जोर का अट्टाहास करने लगे। अब बाबा लज्जाशंकर भी क्या करते.... परम भक्तों की तपस्या में बाधा डालकर भला पाप के भागी क्यों बनें... उन्होंने वहां से घर को निकल आने में ही भलाई समझी।।

Thursday, 24 July 2014

राजनीति की गांठें खोलती 'देश कठपुतलियों के हाथ में'



हां एक ओर दौड़-भाग भरी जिंदगी और तमाम इच्छाओं की त्वरित पूर्ति के लिए दिन-रात खपती युवा पीढ़ी के लिए साहित्य, समाज, देश और राजनीति के विषय में सोचना, लिखना, पढ़ना जैसे दूर की कौड़ी हो गया है। वहीं, ग्वालियर-चंबल की धरती पर जन्मे लोकेन्द्र सिंह राष्ट्र प्रेम की लौ अपने हृदय में शैशवकाल से जलाए आ रहे हैं, इसी की तड़प है कि वे कम उम्र में ही आज देश के प्रख्यात-ख्यातिलब्ध साहित्यकारों, पत्रकारों, ब्लॉगर्स की कतार में खड़े हो गए हैं।
    
पत्रकारिता की पाठशाला दैनिक स्वदेश, ग्वालियर से पत्रकारिता का क, ख, ग सीखने वाले लोकेन्द्र सिंह ने नईदुनिया, पत्रिका और  दैनिक भास्कर जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में लम्बे समय तक अपनी सेवाएं देकर पहचान बनाई। उनके समसामायिक विषयों पर आलेख, कविता, कहानी और यात्रा वृतांत देशभर के पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशित होते रहते हैं। इस युवा पत्रकार और साहित्यकार ने लेखन जगत में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी किताब 'देश कठपुतलियों के हाथ में' अभी हाल ही में प्रकाशित हुयी है।
    
सामाजिक, सांस्कृतिक, मीडिया और राजनैतिक मसलों पर लिखने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, चिंतक, विचारक और ख्यातिलब्ध पत्रकार लोकेन्द्र सिंह की यह प्रथम कृति पठनीय साबित हो रही है। 'देश कठपुतलियों के हाथ में' लेखक के चुनिंदा आलेखों का संग्रह है। लोकसभा निर्वाचन- 2014 के पूर्व की सामाजिक, राजनैतिक परिस्थियों की यथार्थता पर बेबाक टिप्पणियों से भरे-पूरे छयालीस आलेखों का संकलन स्वागत योग्य प्रयत्न है। लेखक ने वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य को बेहद सुंदर और भावपूर्ण अर्थ में समझाते हुए 'अपनी बात' में लिखा है कि ''राजनीति कोई स्वर्णरेखा नाला जैसी है'' (ग्वालियर शहर के बीचों-बीच से निकला हुआ सबसे बड़ा नाला, जो कभी स्वर्णरेखा नदी हुआ करता था।) नाम अच्छा लेकिन चरित्र खराब। ऐसा इसलिए क्योंकि समाज के खास तबके द्वारा राजनीति को गन्दा बताया जाता है।'
    
लेखक की कथा एवं भाषा शैली विचारोत्तेजक, प्रभावपूर्ण और आंदोलित करने वाली है। मुख्यत: आतंकवाद, भ्रष्टाचार, मौजूदा सियासत को आधार बनाकर रचित इस संग्रहणीय कृति में पाठक के मानस को झकझोरने वाली बातों का समावेश किया गया है। तमाम तथ्यों और तर्कों के आधार पर लिखी गईं प्रभावशाली बातें लेखक की विश्वसनीयता और उच्च बौद्धिकता की परिचायक हैं।
    
लेखक की चिंतन शैली इस कदर जबरदस्त है कि उन्होंने अपने एक लेख में पहले ही पूर्वानुमान लगा लिया था कि अगर भाजपा नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करती है तो संभावना है कि मोदी के प्रधानमंत्री पद की घोषणा होते ही नीतीश कुमार राजग (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) से नाता तोड़ लेंगे। उक्त बात महज़ कुछ दिनों के बाद अक्षरश: सत्य सिद्ध हुई। लेखक की वैचारिक गहराई और राष्ट्र प्रेम की जो तड़प हृदय से उपजी है, उसे लेखक ने अपने शब्दों के रूप में इस सारगर्भित कृति में उड़ेल दिया है।
    
      अमूमन देखने को आता है कि समसामयिक विषयों पर लिखे गए लेखों की उन्हीं दिवसों के लिए प्रांसगिकता होती है किन्तु 'देश कुठपु‍तलियों के हाथ में' पुस्तक को पढ़कर समझ में आता है कि इसमें संकलित लेख भविष्य के लिए ही लिखे गए हों। लेखक ने शायद इन्हें भारत के भविष्य के पाठकों के लिए ही लिखा हो। गोयाकि लेखक ने राजनीति के 'मोदी, मोदी और मोदी', 'इमेज सेट करने का खालिस षड्यंत्र', 'दामिनी कह गई-अब सोना नहीं', 'कुछ सवाल केजरीवाल से', 'तुष्टीकरण पर सुप्रीम कोर्ट की चोट', 'कांग्रेस को लगी मिर्ची' जैसे छयालीस लेखों में राजनीति के लगभग सभी पहलुओं को छुआ है, जिसमें सर्वप्रथम राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद की झलक स्पष्टत: परिलक्षित होती प्रतीत होती है किन्तु लेखक ने 'भाजपा के सेक्स लीडर' जैसे विचारोत्तेजक लेख लिखकर पुस्तक को किसी दल या विचारधारा विशेष का अभिनन्दन ग्रन्थ होने से बचा लिया है।
    
      तत्कालीन चर्चित विषयों पर लेखक ने अपने तरीके से विचार कर उसे तीखी अभिव्यक्ति प्रदान की है उनकी शैली में आकर्षण है। शीर्षकों में दृश्यात्मकता, सकारात्मकता, विश्लेषणात्मकता और काव्यात्मकता झलकती है। उनके शीर्षक पाठकों को पूरा लेख पढने को आमंत्रित करते हैं, यह भी कहा जा सकता है कि वे पढने को मजबूर करते हैं। चतुर्दिक जो परिदृश्य है, वो हताशा और निराशा को बढ़ाने वाले हैं। इनमें बदलाव आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। बात जब तथ्यों के आधार पर पूरे विश्लेषण के साथ रखी जाती है तो उसमें वजन होता है। इन लेखों की यही विशेषता है। राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्थाओं पर लेखक ने जमकर चोटें भी हैं। तटस्थ समीक्षक की दृष्टि से लेखन में राष्ट्रवाद की झलक दिखलाई पड़ती है। विषयों के चयन में विशेष दृष्टि रही है। जो विषयों की मौलिकता ला पाई है। वहीं, इसकी आवरण सज्जा ही मौन रूप से बहुत कुछ संदेश देती हुई प्रतीत होती है। तथ्यात्मक सधी हुई भावुकता जो तर्क संगत एवं वैचारिक विरलता लिए हुए है, पाठकों पर पर्याप्त प्रभाव डाल रही है।
    
अंत में, पथ भ्रष्ट राजनीति को पटरी पर लाने के लिए समाज की चेतना को जागृत कर उसे बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए चेताना ही साहित्यकार और पत्रकार का सर्वोपरि संकल्प होता है। इस दृष्टि से पुस्तक के सभी आलेख उम्दा सिद्ध हो रहे हैं। उम्मीद ही वरन् यकीन है कि पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' पाठकों के मानस पटल पर गहरा प्रभाव डालेगी, राजनीति को नजदीक से समझाने और उसके गंदे वातावरण से सचेत करने की दृष्टि से बेहद उपयोगी सिद्ध होगी। लेखक लोकेन्द्र सिंह को बधाईयां ! इस समय चर्चा का विषय बन चुकी पुस्तक के पाठकों के बीच पहुंचने के बाद उनकी भविष्य में आने वाली कृति और रचना की प्रतीक्षा रहेगी।

- नीरज चौधरी (समीक्षक युवा पत्रकार और लेखक हैं।


पुस्तक : देश कठपुतलियों के हाथ में
लेखक : लाकेन्द्र  सिंह
संपर्क : lokendra777@gmail.com
मूल्य : 150 रुपये
प्रकाशक : स्पंदन 
ई-31, 45 बंगले, भोपाल (मध्यप्रदेश)
-462003
दूरभाष : 0755-2765472
फोन : 09893072930
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